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भगवान गणेश की मूर्ति खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी (zee news)
हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेशोत्सव की शुरुआत होती है. 10 दिनों तक चलने वाला गणेशोत्सव की लोकप्रियता पहले महाराष्ट्र में हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ ये मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि तमाम राज्यों में भी मनाया जाने लगा है. 31 अगस्त को गणेश चतुर्थी के दिन से गणेश फेस्टिवल शुरू होने जा रहा है. इस दिन बप्पा के भक्त धूमधाम से गणेश भगवान की मूर्ति को अपने घर लेकर आते हैं और 10 दिनों के लिए स्थापित करते हैं. अगर आप भी इस साल गणपति को घर में लाने की तैयारी कर रहे हैं, तो मूर्ति का चुनाव करते समय कुछ बातों का विशेष रूप से ध्यान रखें.
किसी भी त्योहार से किसी को नुकसान न पहुंचे, तभी वो शुभ माना जाता है. इस बार गणपति की मूर्ति लाते समय भी आप इस बात का खयाल रखें और पीओपी की बजाय मिट्टी की मूर्ति को ही घर में लेकर आएं. ताकि वो विसर्जन के समय पानी में आसानी से घुल सके और इससे पर्यावरण को भी कोई नुकसान न पहुंचे.
ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र की मानें तो गणपति की मूर्ति में उनकी सूंड के भी बड़े मायने हैं. सूंड के कारण ही उन्हें वक्रतुंड कहा जाता है. पारिवारिक खुशहाली और शुभता लाने के लिए बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाले गणपति ही लेकर आएं. इस मूर्ति को वाममुखी कहा जाता है. दाहिनी ओर मुड़ी सूंड दक्षिणमुखी कहलाती है, जो काफी शक्तिशाली मानी जाती है. इस मूर्ति की पूजा के नियम काफी कठिन होते हैं. इसलिए वाममुखी मूर्ति लाना ही श्रेयस्कर है.
सफेद और सिंदूरी रंग की गणेश प्रतिमा को शुभ माना गया है. सिंदूरी रंग की मूर्ति परिवार में नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है. शुभता और खुशहाली लेकर आती है. वहीं सफेद रंग की मूर्ति को शांति का प्रतीक माना जाता है.
गणपति की प्रतिमा खरीदते समय उनकी मुद्रा पर भी ध्यान जरूर दें. बैठी हुई मूर्ति को घर लाना सबसे शुभ माना जाता है. इसके अलावा वर्कप्लेस पर आप गणपति की खड़ी मूर्ति भी ला सकते हैं. लेकिन गणपति के दोनों पैर जमीन को छूते हुए होने चाहिए.
गणपति का वाहन मूषक है और उन्हें अत्यंत प्रिय है. इसलिए जो भी मूर्ति खरीदें, उसमें उनके साथ उनका मूषक जरूर होना चाहिए. बगैर मूषक के गणपति की मूर्ति अधूरी मानी जाती है.