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भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने तीन बीयर बनाने वाली कंपनियों के साथ-साथ उनके व्यापार संघ ऑल इंडिया ब्रूअर्स एसोसिएशन (AIBA) पर कार्टेलाइज़ेशन यानी गुटबंदी को लेकर तकरीबन 900 करोड़ का जुर्माना लगाया है. आयोग के एंटीट्रस्ट बॉडी ने एक प्रेस रिलीज के जरिए शुक्रवार को जानकारी देते हुए बताया कि SABMiller इंडिया (फोस्टर बीयर के निर्माता), यूनाइटेड ब्रेवरीज (किंगफिशर बीयर के निर्माता) और कार्ल्सबर्ग इंडिया ने देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गुटबाजी कर 2009 से लेकर अक्टूबर 2018 के दौरान बीयर की बिक्री और आपूर्ति करने में शामिल थे.
सीसीआई ने जहां यूनाइटेड ब्रेवरीज और कार्ल्सबर्ग इंडिया को क्रमश: 750 करोड़ रुपये और 120 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का निर्देश दिया है, वहीं जांच में सहयोग करने पर सबमिलर इंडिया को जुर्माने में 100 फीसदी कमी करने का ऑफर दिया है. बता दें कि SABMiller India को अब Anheuser Busch InBev India के नाम से जाना जाता है.
सीसीआई ने अपने बयान में कहा कि ये तीनों कंपनियां आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और पुडुचेरी में में प्राइस को-ऑर्डिनेशन में लगी हुई थीं. साथ ही तीनों कंपनियां सामूहिक रूप से महाराष्ट्र, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को बीयर की आपूर्ति नहीं कर रही थीं और बेंगलुरु में प्रीमियम संस्थानों के लिए बीयर की आपूर्ति के संबंध में भी समन्वय कर रही थीं.
सीसीआई ने यूनाइटेड ब्रुअरीज और अनहेसर बुश इनबेव इंडिया को पुरानी बोतलों की खरीद के लिए भी तालमेल करते पाया. लिहाजा इस मामले में, यूनाइटेड ब्रुअरीज के चार व्यक्तियों, अनहेसर बुश इनबेव इंडिया के चार व्यक्तियों, कार्ल्सबर्ग इंडिया के छह व्यक्तियों और AIBA के महानिदेशक को सीसीआई द्वारा उनकी संबंधित कंपनियों और एसोसिएशन के प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण के लिए दोषि पाया गया था.
2018 में CCI ने तीन शराब बनाने वालों के कार्यालयों पर छापा मारा और एक जांच शुरू की. भारत में इन कंपनियों की 88% बियर मार्केट है जो तकरीबन $ 7 बिलियन है.
कार्यकारी अधिकारियों की बातचीत, व्हाट्सऐप संदेशों और ई-मेल के जरिए जांच एजेंसी ने पता लगाया कि कैसे ये कंपनियां नियमित और सामूहिक रूप से "कई राज्यों" में दाम बढ़ाने कर फायदा कमाने के लिए सोची समझी रणनीतिक के तहत राज्यों के साथ मोलभाव करती थीं. इसके लिए कंपनियों ने AIBA का सहारा लेकर साझा तौर पर कीमतों को तय कराया. इसके बाद लोकल ग्रुप कंपनियों की ओर से दाम बढ़ाने के लिए पैरवी करते थे.