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गणेश चतुर्थी पर गणपति की स्थापना का शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय (Zee News)
गणपति के आगमन की तैयारियां सभी जगह लगभग पूरी हो गई हैं. 31 अगस्त को गणेश चतुर्थी के दिन गणपति घर-घर में विराजेंगे. इस बीच बप्पा के भक्त उनका विशेष पूजन और सत्कार करेंगे और 5, 7 या 10 दिन बाद उनका विधि विधान के साथ विसर्जन करेंगे. गणेश जी को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है. ज्योतिषीय मान्यता है कि गणेश जी जब घर से विदा होते हैं, तो परिवार के सारे विघ्न और संकट को अपने साथ ले जाते हैं. अगर आप भी इस बार गणपति को अपने घर लाने की तैयारी कर रहे हैं, तो ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र से यहां जानिए गणपति की स्थापना के शुभ मुहूर्त से लेकर राहुकाल तक की सारी जानकारी.
ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र की मानें तो इस बार की गणेश चतुर्थी बेहद खास है. इस साल करीब-करीब वो सारे योग-संयोग बन रहे हैं, जो गणेश जी के जन्म पर बने थे. गणपति का आगमन चित्रा नक्षत्र, रवि योग और शुक्ल योग में होगा. गणेश चतुर्थी पर दोपहर के समय चित्रा नक्षत्र में ही पार्वती जी ने मिट्टी के गणेश बनाए थे और उसमें प्राण डाले थे. रवि योग और शुक्ल योग दोनों को काफी शुभ माना गया है.
ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र की मानें तो सुबह 07 बजकर 13 मिनट से 09:27 मिनट तक सम स्थापना के लिए शुभ है. इसके अलावा दोपहर में 01:30 से 04:10 मिनट तक समय भी शुभ रहेगा. लेकिन दोपहर 12:00 बजे से 01:30 बजे तक राहुकाल रहेगा. कोशिश करें कि इस बीच आप गणपति की स्थापना न करें.
कहा जाता है कि गणेशोत्सव के दौरान गणपति की श्रद्धा के साथ पूजा की जाए तो आपकी हर मनोकामना पूरी होती है. इस बार गणेश चतुर्थी पर शुक्ल योग भी है, जो पूरे दिन रहेगा. शुक्ल योग की स्वामिनी माता पार्वती हैं. ज्योतिषाचार्य का कहना है कि जिन लोगों की संतान की कामना है, उन्हें इस दिन एक उपाय जरूर करना चाहिए. इस बार चतुर्थी के दिन गणपति की स्थापना के बाद किसी भी समय 'संतान गणपति स्तोत्र' का पाठ करें. इसके बाद रोजाना इस पाठ को निश्चित समय पर करें. इससे आपको गणपति के साथ माता पार्वती का भी विशेष आशीष मिलेगा और आपकी संतान प्राप्ति की कामना जल्द पूरी हो सकती है.
धार्मिक मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन ही गणपति जी का जन्म हुआ था. इस दिन माता पार्वती ने मिट्टी का पुतला बनाकर उनमें प्राण डाले थे. ये गणेश उत्सव 10 दिनों तक चलता है. 10 दिनों तक उत्सव चलने को लेकर मान्यता है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन ही वेद व्यास जी के साथ गणपति ने महाभारत को लिपिबद्ध करने का कार्य शुरू किया था. ये काम दस दिनों तक चला था. लगातार काम करते हुए उनके शरीर पर धूल, मिट्टी की परत जमा हो गई थी. 11वें दिन उन्होंने नजदीक में मौजूद सरस्वती नदी में स्नान किया था. तब से ये त्योहार दस दिनों तक मनाया जाने लगा. चतुर्थी के दिन गणपति को लाया जाता है और 11वें दिन उनका विसर्जन किया जाता है.