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भारतीय विमानन कंपनी के इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब भारत और उत्तरी अमेरिका को जोड़ने के लिए हवाई जहाज पोलर रूट यानी ध्रुवीय इलाके के ऊपर उड़ान भरेंगे.
देश की सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया की बुलंदियों में एक और चैप्टर जुड़ने जा रहा है. एयर एंडिया अब जल्द ही नॉर्थ अमेरिका के लिए बर्फ की चट्टानों (ध्रुवीय क्षेत्र) के ऊपर से उड़ान भरेगी. इस उड़ान के साथ प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और ध्रुवीय क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरने वाली एयर इंडिया दुनिया की पहली विमानन कंपनी होगी.
भारतीय विमानन कंपनी के इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब भारत और उत्तरी अमेरिका को जोड़ने के लिए हवाई जहाज पोलर रूट यानी ध्रुवीय इलाके के ऊपर उड़ान भरेंगे. एयर इंडिया अब भारत और उत्तरी अमेरिका के बीच नॉन-स्टॉप सर्विस शुरू करने जा रही है.
भारत-उत्तरी अमेरिका के रूट के लिए एयर इंडिया पोलर रूट का इस्तेमाल करेगी. कंपनी का कहना है कि पोलर रूट से दोनों देशों के बीच लगने वाले समय में कमी आएगी. इस रूट पर समय के साथ ईंधन की भी बचत होगी और इससे प्रदूषण में कमी आएगी.
एयर इंडिया अभी तक उत्तरी अमेरिका के लिए अटलांटिक और प्रशांत महासागर के रूट का इस्तेमाल करती है. दोनों देशों के बीच अब पोलर रूट का इस्तेमाल किया जाएगा.
15 अगस्त को शुरू होगी उड़ान
पोलर रूट पर पहली उड़ान की जिम्मेदारी कैप्टन रजनीश शर्मा और कैप्टन दिग्विजय सिंह को सौंपी गई है. दोनों पायलट स्वतंत्रता दिवस, 15 अगस्त के मौके पर बोइंग-777 लेकर नई दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को के लिए उड़ान भरेंगे.
एयर इंडिया के अधिकारियों का कहना है कि पोलर रूट पर सर्विस शुरू करना एक शानदार मौका है, लेकिन यह उतना ही चुनौतियों ने भरा हुआ भी है. अधिकारियों का कहना है कि फ्लाइट सर्विस के ध्रुवीय रूट का इस्तेमाल निश्चित ही फायदेमंद साबित होगा.
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खास बात यह है कि एयर इंडिया ने साल 2007 में ही पोलर रूट पर उड़ान भरने में कामयाबी हासिल कर ली थी, जब कैप्टन अमिताभ सिंह ने बोइंग 777 से ध्रुवीय क्षेत्र में उड़ान भरी थी. बोइंग 777 की डिलीवरी लेने के बाद कैप्टन अमिताभ सिंह ने सिएटल से नई दिल्ली के लिए उत्तरी ध्रुव पर विमान को उड़ाया था और ऐसा करने वाले वह भारतीय पायलट बने थे.
क्या हैं चुनौतियां-
- इस रूट पर एयरपोर्ट बहुत कम हैं.
- पोलर रूट चुंबकीय (मैग्नेटिक फील्ड) इलाका कहलाता है. इस इलाके से होकर उड़ान भरना खतरनाक होता है.
- मैग्नेटिक फील्ड की रेंज में आने से एक्सीडेंट होने का खतरा रहता है.
- इस रूट पर इमरजेंसी के समय डायवर्सन के लिए ज्यादा ऑप्शन नहीं हैं.
- बहुत ज्यादा ठंडा इलाका होने से यहां ईंधन के जमने का खतरा बना रहता है.
- यह इलाकासोलर रेडिएशन से भरा हुआ है. सोलर रेडिएशन के दायरे में आने से शरीर में जलन होती है.
क्या हैं फायदे-
- पोलर रीजन का इस्तेमाल करने से फ्यूल की बचत होगी.
- इस रूट पर 2000 से 7000 किलोग्राम फ्यूल की बचत होने का अनुमान है.
- इस रूट पर एक उड़ान में 6000 से 21000 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी.
सुरक्षा के उपाय
पोलर रीजन पर उड़ान भरने के लिए सुरक्षा के खास इंतजाम किए जाएंगे. इस रूट के लिए DGCA और FAA से मंजूरी ली गई है. ध्रुवीय रीजन पर उड़ान भरने वाले पायलट को विशेष ट्रेनिंग दी गई है. मौसम पर नजर रखने के लिए विमान में खास मशीन लगाई गई हैं. इमरजेंसी में रूट डायवर्जन होने पर एयर इंडिया ने एक बड़ी डायवर्जन सपोर्ट एजेंसी को तैनात किया है.