World War-2 के बाद जो दुनिया बनी, उसमें ये जरूरत महसूस की गई कि ऐसी बैंकिंग या वित्तीय संस्थाएं हों जो युद्ध की विभीषिका झेल रहे देशों की मदद कर सकें, उनके लिए फंडिंग का इंतजाम कर सकें. और फिर 1944 में बनाई गई World Bank और International Monetary Fund (IMF) जैसी डेवलपमेंट बैंकिंग संस्थाएं. वर्ल्ड वॉर के आफ्टरमैथ में यूरोप को फिर से बिल्ड करने की जरूरत थी, और आज 80 सालों बाद भी ये संस्थाएं एग्जिस्ट करती हैं, क्योंकि हम एक को-ऑपरेटिव अर्थव्यवस्थाओं वाली दुनिया हैं, और क्योंकि आज भी ऐसे बहुत से देश हैं, जो सस्टेन करने के लिए पूरी तरह फंडिंग पर डिपेंड करते हैं.

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Video देखें: MDBs क्या होती हैं और कैसे काम करती हैं?

G20 में पेश किया गया प्रस्ताव

लेकिन हम ये बातें क्यों कर रहे हैं? दरअसल, दिल्ली में हुए G20 Summit में जो एजेंडे पेश किए गए, उनमें एक खास टॉपिक शामिल था- मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक (MDBs). बदलते वक्त और बदलती दुनिया के साथ एक इन बड़ी वित्तीय संस्थाओं में एक ओवरहॉल की जरूरत महसूस की जा रही है. हम क्लाइमेट चेंज और सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में कहीं पीछे चल रहे हैं. आने वाले सालों में जो बदलाव होंगे, भारत उसमें अहम भूमिका निभा सकता है. G20 Summit में मल्टी लेटरल डेवलपमेंट बैंकों के रिफॉर्म के लिए एक रोडमैप पेश किया गया है. 

 MDBs हैं क्या और क्यों इंपॉर्टेंट हैं?

मल्टी लेटरल बैंक इंटरनेशनल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन होते हैं, जिन्हें एक साथ दो या दो से अधिक देश गवर्न करते हैं. ये बैंक गरीब देशों में आर्थिक विकास को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसमें जो मेंबर देश होते हैं, उन्हें जरूरतमंद देशों में इंफ्रा, वेलनेस, हेल्थकेयर जैसे प्रोजेक्ट चलाने के लिए लोन या ग्रांट दिया जाता है. ये संस्थाएं प्रॉफिट कमाने के मॉटो के साथ नहीं बल्कि डेवलपमेंट गोल्स पूरे करने के लिए काम करती हैं. गरीबी और किसी भी तरह की असमानता हटाने, एनर्जी, इंफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन, एन्वायर्नमेंट, सस्टेनेबिलिटी वगैरह जैसे एरियाज़ में काम करती हैं. ये कम या तो जीरो ब्याज पर लोन देती हैं.

पिछले कुछ टाइम में क्लाइमेट चेंज या नेट जीरो कार्बन एनर्जी जैसे लक्ष्यों पर बात बनती नहीं दिख रही और हम अब भी अपने टारगेट से बहुत दूर हैं, ऐसे में ये बैंक ज्यादा एफिशिएंट होकर काम करें, इसके लिए इस बार के समिट में रिफॉर्म प्रपोज़ किए गए हैं.

किन पक्षों पर काम किया जाना है?

भारत की प्रेसिडेंसी में जो लक्ष्य पेश किया गया है, उनके मुताबिक, तीन पक्षों पर काम किया जाना है-

1. ये संस्थाएं जितना लोन देती रही हैं, उससे तीन गुना ज्यादा लोन दे सकें, इसके लिए उन्हें रिसोर्स देना.

2. दूसरा, अत्यधिक गरीबी को खत्म करने और ऐसे ही ग्लोबल पब्लिक गुड्स पर काम करने के लिए उनका मैंडेट बढ़ाना,

3. और तीसरा प्राइवेट कैपिटल के इस्तेमाल को शामिल किया जाना है.

G20 Independent Expert Group (IEG) में भारत के NK Singh शामिल हैं, जोकि फाइनेंस कमीशन ऑफ इंडिया के फॉर्मर चेयरमैन रह चुके हैं. इसके अलावा, Indian Council for Research on International Economic Relations भी इसमें को-कन्वीनर है. G20 में ये इस इंटेशन के साथ ये एजेंडा पेश किया गया है कि इस साल इस डायरेक्शन में अहम गति देखने को मिले और प्रभावशाली MDBs बनाएं जाएं. अभी अक्टूबर में Morocco के Marrakesh में World Bank-IMF meetings में रिपोर्ट का अगला वॉल्यूम पेश किया जाना है. ऐसे में आगे भी देखना होगा कि हम एक इंपैक्टफुल और ज्यादा एफिशिएंट संस्थाएं बनाने की दिशा में कबतक आगे बढ़ पाते हैं.