Editor's Take: ग्लोबल बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. मौजूदा समय में कच्चे तेल के लेवल की बात करें तो इस दौरान कच्चा तेल यानी कि क्रूड (Crude) 91.77 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर ट्रेड कर रहा है. मौजूदा समय में कच्चा तेल 7 महीने के निचले स्तर पर है. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध (Russia-Ukraine War) की शुरुआत के बाद से कच्चे तेल के दामों में उछाल देखा गया और एक समय ये भी था कि कच्चा तेल ने 100 डॉलर का लेवल तोड़ दिया था. लेकिन अब फिर क्रूड में दबाव देखने को मिल रहा है और मौजूदा समय में ये करीब-करीब 92 डॉलर के लेवल पर ट्रेड कर रहा है. हालांकि इस पर ज़ी बिजनेस के मैनेजिंग एडिटर का कहना है कि ये एक बड़ी राहत है. अनिल सिंघवी का कहना है कि ये कच्चे तेल की दिशा को तय करने में बड़ी राहत है.

OPEC के प्रोडक्शन कट के बाद भी घटे दाम

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अनिल सिंघवी का कहना है कि ये कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के लिए गोल्डन समय था. उन्होंने कहा कि कच्चा तेल ओपेक के प्रोडक्शन के बाद भी बढ़ा नहीं बल्कि घटा है. अगर चीन, अमेरिका और यूरोप में आर्थिक धीमापन (Economin Recession) आता है तो डिमांड पर जाहिर तौर पर असर पड़ेगा. 

अनिल सिंघवी (Anil Singhvi) ने मार्केट का उदाहरण देते हुए कहा कि कच्चे तेल के साथ भी वही हो रहा है, जैसा बाजार में होता है. मार्कट गैप से खुल रहा है और कोई खराब खबर है तो उस स्टॉक को खरीद लिया जाता है, दूसरा वहीं, अगर कोई अच्छी खबर हो तो बेचने पर फोकस रहता है. 

कच्चे तेल की चाल बिगड़ेगी - सिंघवी

अनिल सिंघवी ने कहा कि कच्चे तेल में अच्छी खबर के साथ बिकवाली आ रही है तो कच्चे तेल की चाल बिगड़ सकती है. अनिल सिंघवी का कहना है कि अगर किसी निगेटिव खबर जैसे, किसी जियोपॉलिटिकल टेंशन, के बाद भी कच्चा तेल के दामों में बढ़त नहीं है तो कच्चे तेल के लिए नीचे की यात्रा शुरू हो जाएगी. यानी कि इसके बाद कच्चा तेल गिरने लगेगा. 

70-75 डॉलर का लेवल रहेगा अच्छा

अनिल सिंघवी ने कहा कि अगर 70-75 डॉलर बैरल के लेवल के पास कच्चा तेल आ जाए, तो भारतीय इकोनॉमी के लिए ये सबसे बड़ी राहत होगी. इस दौरान डॉलर के मुकाबले जो पैसे बचेंगे वो आगे चलकर बड़े काम आ सकते हैं. भारत के लिए जरूरी है कि जितना जल्दी कच्चा तेल नीचे आएगा, उतना जल्दी बिल घटेगा और जब बिल घटेगा तो उसी से पैसे बचेंगे. अनिल सिंघवी ने कहा कि एक बार कच्चे तेल का दाम 90 डॉलर के नीचे आएगा तो मनोवैज्ञानिक तौर पर भरोसा बढ़ जाएगा.