ग्लोबल करेंसी रिजर्व में डॉलर का दबदबा तेजी से घट रहा है. इसके उलट भारतीय रुपए और चाइनीज युआन का रुतबा बढ़ रहा है. डॉलर ने वास्तव में वैश्विक व्यापार और विनिमय के लिए मुद्रा के रूप में अपना दर्जा खो दिया है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अप्रैल में कहा था कि वैश्विक विदेशी मुद्रा में इसकी हिस्सेदारी 58 फीसदी गिर गई है, जो 1995 के बाद सबसे कम है. एक्सपर्ट्स ने इसपर अपनी राय दी है.

क्रूड का आयात ज्यादातर डॉलर में

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शेयर बाजार के नजरिए से इस डी-डॉलराइजेशन का कोई अल्पकालिक प्रभाव नहीं होगा. हालांकि, शॉर्ट-टर्म में इसका बाजारों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. भारत का सबसे बड़ा आयात कच्चा तेल और खाद्य तेल है और इन वस्तुओं का अधिकांश व्यापार पारंपरिक रूप से यूएस डॉलर में होता है.

बांग्लादेश रुपए का कर रहा बड़ा इस्तेमाल

बांग्लादेश विदेशी मुद्रा का भूखा है और अपने विदेशी मुद्रा भंडार से जूझ रहा है. रुपए में भारत के साथ व्यापार ने देश को एक नई जीवन रेखा दी है और वे अब अपने व्यापार और अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करने में सक्षम हैं. छोटे व्यापारी और व्यवसायी एक बार फिर व्यापार करने में सक्षम हैं और भारत से उन वस्तुओं का आयात कर रहे हैं जो पहले एक अड़चन बन गई थीं.

भारतीय रुपए में कारोबार पर जोर

भारत जिस व्यापार समझौते पर देशों के साथ हस्ताक्षर कर रहा है और स्थानीय मुद्रा में व्यापार की अवधारणा को पेश कर रहा है, वह गति प्राप्त कर रहा है. जिस क्षण हम अपने कच्चे तेल और खाद्य तेल के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रुपए या गैर-डॉलर के व्यापार में बांधने में सक्षम हो जाते हैं, भारत आ चुका होता.

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