वेनेजुएला पर अमेरिकी कब्जे से दो खेमों में बंटी दुनिया.. जानें रूस-चीन से भारत तक.. कौन किसके पाले में खड़ा है!

वेनेजुएला में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने पूरी दुनिया को दो गुटों में बांट दिया है. रूस, चीन और उत्तर कोरिया जैसे देश इसे 'अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन' बता रहे हैं, जबकि इजरायल और ब्रिटेन जैसे देश इसे तानाशाही के खिलाफ जरूरी कदम मान रहे हैं. भारत ने इस मामले में बीच का रास्ता अपनाते हुए शांति और बातचीत की अपील की है. इटली और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने लोकतंत्र का समर्थन तो किया है, लेकिन बाहरी सैन्य दखल पर चिंता भी जताई है.
वेनेजुएला पर अमेरिकी कब्जे से दो खेमों में बंटी दुनिया.. जानें रूस-चीन से भारत तक.. कौन किसके पाले में खड़ा है!

साल 2026 की शुरुआत एक ऐसी घटना से हुई है जिसने शीत युद्ध (Cold War) की यादें ताजा कर दी हैं. वेनेजुएला में अमेरिका की अचानक सैन्य कार्रवाई और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिए जाने के फैसले ने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है. यह सिर्फ दो देशों का झगड़ा नहीं रह गया है, बल्कि अब यह दुनिया की महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है. एक तरफ वो देश हैं जो इसे 'लोकतंत्र की रक्षा' और 'नशीली दवाओं के तस्करों' के खिलाफ कार्रवाई मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ वो देश हैं जो इसे किसी संप्रभु राष्ट्र की आजादी पर हमला बता रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे ने कि "अब वेनेजुएला अमेरिका के नियंत्रण में है", आग में घी डालने का काम किया है. जहां एक ओर वॉशिंगटन के करीबी सहयोगी इस कदम को सही ठहरा रहे हैं, वहीं मास्को और बीजिंग ने इसे सीधे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाना करार दिया है. भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति बहुत नाजुक है, क्योंकि उसे अपने कूटनीतिक रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाना है. आइए विस्तार से समझते हैं कि इस वैश्विक तनाव में कौन सा देश किस तरफ खड़ा है और उनके तर्क क्या हैं.

विरोध का खेमा: अमेरिका की कार्रवाई को बताया 'अवैध'

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दुनिया के एक बड़े हिस्से ने अमेरिका की इस कार्रवाई को 'गुंडागर्दी' और 'अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन' बताया है. इन देशों का मानना है कि किसी भी देश के राष्ट्रपति को इस तरह गिरफ्तार करना और उस पर कब्जा करना गलत है.

रूस और चीन: इन दोनों महाशक्तियों ने सबसे कड़ा विरोध दर्ज कराया है. चीन ने इसे 'साम्राज्यवादी सोच' बताया है, जबकि रूस ने चेतावनी दी है कि वह अपने सहयोगी वेनेजुएला के साथ खड़ा है.

लैटिन अमेरिकी पड़ोसी: ब्राजील, मेक्सिको, कोलंबिया और चिली जैसे पड़ोसी देशों ने भी इस सैन्य दखल की आलोचना की है. उनका मानना है कि इससे पूरे इलाके की शांति भंग होगी.

अन्य विरोधी देश: ईरान, क्यूबा, उत्तर कोरिया, बेलारूस, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों ने भी इस कार्रवाई की निंदा की है. इन देशों का कहना है कि वेनेजुएला का भविष्य वहां के लोगों को तय करना चाहिए, न कि अमेरिका को.

समर्थन का खेमा: 'तानाशाही के अंत' का स्वागत

कुछ देशों ने अमेरिका के इस कदम का खुलकर समर्थन किया है. उनका तर्क है कि मादुरो सरकार न केवल दमनकारी थी, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराधों को बढ़ावा दे रही थी.

इजरायल और ब्रिटेन: इन देशों ने अमेरिका के फैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि यह नार्को-टेररिज्म (नशीली दवाओं से जुड़ा आतंकवाद) के खिलाफ एक जरूरी प्रहार है.

क्षेत्रीय सहयोगी: अर्जेंटीना, पेरू, अल साल्वाडोर और इक्वाडोर जैसे देशों ने माना है कि मादुरो के शासन में लोकतंत्र खत्म हो गया था और अब वहां नई शुरुआत की उम्मीद है.

फ्रांस और अल्बानिया: इन यूरोपीय देशों ने भी अमेरिकी कार्रवाई को सुरक्षा के नजरिए से सही माना है.

भारत का रुख: शांति और बातचीत की अपील

भारत ने हमेशा की तरह इस मामले में भी 'गुटनिरपेक्ष' और संतुलित रुख अपनाया है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की प्राथमिकता वहां रहने वाले भारतीय समुदाय की सुरक्षा और वेनेजुएला के लोगों की भलाई है.

गहरी चिंता: भारत ने वेनेजुएला के हालात पर 'गहरी चिंता' जताई है.

कूटनीतिक समाधान: भारत का कहना है कि हिंसा या कब्जे के बजाय दोनों पक्षों को मेज पर बैठकर बातचीत करनी चाहिए.

मदद के लिए तैयार: काराकास (वेनेजुएला की राजधानी) में भारतीय दूतावास पूरी तरह अलर्ट पर है ताकि वहां फंसे भारतीयों को हर संभव मदद दी जा सके.

इटली और ऑस्ट्रेलिया: लोकतंत्र के साथ, लेकिन सैन्य दखल पर संशय

इन दो देशों की प्रतिक्रिया काफी दिलचस्प रही है. इन्होंने सीधे तौर पर न तो समर्थन किया और न ही पूरी तरह विरोध, बल्कि अपनी प्राथमिकताएं साफ कीं.

इटली (जॉर्जिया मेलोनी): मेलोनी ने कहा कि इटली ने कभी मादुरो की जीत को मान्यता नहीं दी. हालांकि, वे मानती हैं कि बाहरी सैन्य हमला तानाशाही खत्म करने का 'सही रास्ता नहीं' है. लेकिन, अगर कोई सरकार नशीली दवाओं की तस्करी करके दूसरे देशों की सुरक्षा को खतरा पहुंचाती है, तो उस पर कार्रवाई को वे 'बचाव' (Hybrid Defense) मानती हैं.

ऑस्ट्रेलिया (एंथनी अल्बनीज): ऑस्ट्रेलिया ने किसी का पक्ष लेने के बजाय 'डिप्लोमेसी' और 'इंटरनेशनल लॉ' पर जोर दिया है. उन्होंने अपने नागरिकों के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं और तनाव कम करने की अपील की है.

Conclusion

वेनेजुएला में जो कुछ भी हो रहा है, उसने यह साफ कर दिया है कि 2026 में वैश्विक व्यवस्था बेहद नाजुक मोड़ पर है. अमेरिका का 'एकतरफा' फैसला दुनिया के आधे देशों को रास नहीं आ रहा है. जहाँ कुछ इसे एक तानाशाह के अंत की शुरुआत देख रहे हैं, वहीं अन्य इसे एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत मान रहे हैं. भारत जैसे देशों के लिए चुनौती यह है कि वे अपनी ऊर्जा सुरक्षा (तेल) और कूटनीतिक संतुलन को कैसे बचाए रखते हैं. आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि दुनिया शांति की ओर बढ़ेगी या फिर एक और बड़े विनाशकारी संघर्ष की ओर.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1- रूस और चीन वेनेजुएला का समर्थन क्यों कर रहे हैं?

रूस और चीन ने वेनेजुएला में अरबों डॉलर का निवेश किया है और वे अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं.

2- क्या भारत को वेनेजुएला से तेल मिलता है?

हां, भारत अपनी जरूरत का काफी तेल वेनेजुएला से आयात करता रहा है, इसलिए वहां की अस्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय है.

3- डोनाल्ड ट्रंप ने कब्जा करने की बात क्यों कही?

ट्रंप का तर्क है कि मादुरो सरकार अवैध थी और अमेरिका वहां शांति व स्थिरता बहाल करने के लिए शासन चलाएगा.

4- क्या संयुक्त राष्ट्र (UN) ने इस पर कोई फैसला लिया है?

UN में इस पर तीखी बहस जारी है, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों (रूस, चीन बनाम अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस) के बीच मतभेद के कारण कोई ठोस कार्रवाई मुश्किल है.

5- वेनेजुएला में रहने वाले भारतीयों का क्या होगा?

भारत सरकार अपने दूतावास के जरिए उनके संपर्क में है और जरूरत पड़ने पर उन्हें एयरलिफ्ट (Rescue) करने की योजना भी बना सकती है.

(आईएएनएस से इनपुट के साथ)

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