&format=webp&quality=medium)
जनवरी की कड़ाके की ठंड, तापमान माइनस में, चारों तरफ बर्फ की मोटी चादर. और इसी सन्नाटे में एक शहर अचानक दुनिया का सेंटर बन जाता है. नाम है- दावोस. स्विट्ज़रलैंड का यह छोटा-सा पहाड़ी शहर, जहां आम दिनों में शांति रहती है, जनवरी आते ही ग्लोबल पावर का अड्डा बन जाता है. यहां दुनिया के सबसे ताकतवर लोग जुटते हैं- राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, बड़े उद्योगपति, टेक दिग्गज, बैंकर्स और पॉलिसी मेकर्स.यहां न कोई चुनाव होता है. न संसद चलती है. न कोई कानून पास किया जाता है. फिर भी… दुनिया की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाएगी, युद्ध और शांति के सुर कैसे बदलेंगे, टेक्नोलॉजी इंसान की जिंदगी को कैसे प्रभावित करेगी, और क्लाइमेट चेंज से निपटने का रोडमैप क्या होगा, इन सब पर सबसे गहरी बातचीत यहीं होती है.
यही वजह है कि दावोस में होने वाली इस बैठक को सिर्फ एक कॉन्फ्रेंस नहीं, बल्कि दुनिया के भविष्य की सबसे बड़ी गोलमेज बातचीत कहा जाता है. इस मंच का नाम है- वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) यानी WEF.
अब सवाल ये है-
1. WEF आखिर है क्या?
2. कब शुरू हुआ?
3. किसने शुरू किया?
4. दावोस ही क्यों चुना गया?
5. और क्यों हर साल पूरी दुनिया की नजरें इसी एक हफ्ते पर टिक जाती हैं?
चलिए, WEF की पूरी कहानी समझते हैं…
WEF कोई सरकार नहीं है. कोई संयुक्त राष्ट्र जैसा संगठन भी नहीं. WEF एक गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी संगठन (NGO) है, जो दुनिया के बड़े मुद्दों पर बातचीत का मंच देता है. यह मंच जोड़ता है-
मकसद एक ही- दुनिया की बड़ी समस्याओं पर एक साथ सोचना और समाधान की दिशा तय करना.

WEF की नींव 1971 में पड़ी थी. इसके फाउंडर हैं Klaus Schwab- एक जर्मन अर्थशास्त्री और प्रोफेसर.
क्लाउस श्वाब चाहते थे कि यूरोप की कंपनियां, अमेरिकी मैनेजमेंट मॉडल से सीखें और बिजनेस को सिर्फ मुनाफे तक सीमित न रखें. धीरे-धीरे यह मंच बिजनेस से आगे बढ़कर ग्लोबल पॉलिसी डिस्कशन प्लेटफॉर्म बन गया.

WEF का एक मशहूर वाक्य है- “Committed to improving the state of the world.”
सरल भाषा में- आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, युद्ध और जियोपॉलिटिक्स, AI और टेक्नोलॉजी, रोजगार और स्किल, हेल्थ और एजुकेशन, इन सब पर ओपन डिस्कशन + कोलैबोरेशन.
WEF फैसले नहीं करता, लेकिन फैसलों की सोच यहीं बनती है.

Davos स्विट्ज़रलैंड का एक छोटा सा स्की रिज़ॉर्ट टाउन है.
दावोस ही क्यों?
1. न्यूट्रल देश
2. छोटा और सुरक्षित शहर
3. परंपरा बन गई
4. साइड मीटिंग्स का फायदा
बर्फीले मौसम में लोग बाहर कम जाते हैं, तो होटल, मीटिंग रूम और कॉरिडोर में ही असली डील्स और बातचीत होती है.


यह जानकर ज्यादातर लोग चौंक जाते हैं.
WEF Membership Fees:

हां, और खूब होती है.
क्या आलोचनाएं होती हैं?
आलोचनाओं पर WEF का जवाब:
“हम बातचीत का मंच हैं, सरकार नहीं.”
दावोस में भारत की मौजूदगी ग्लोबल भरोसे का संकेत मानी जाती है.

दावोस 2026 की थीम 'A Spirit of Dialogue' है. मतलब है बातचीत की भावना. इस साल AI और नई तकनीक का सही इस्तेमाल कैसे हो, नौकरियां, स्किल को कैसे बढ़ाया जाए. इस बात को लेकर चर्चा हो रही है. 2026 में दावोस की सालाना बैठक 19 से 23 जनवरी 2026 तक होगी. साल में 2026 के भारतीय पवेलियन में देश के तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री हिस्सा ले रहे हैं. इसमें अश्विनी वैष्णव, प्रह्लाद जोशी, राममोहन नायडू शामिल हो रहें हैं.

WEF कोई संसद नहीं है. कोई अदालत नहीं है. लेकिन यह वह जगह है, जहां दुनिया के ताकतवर लोग एक ही टेबल पर बैठकर भविष्य की दिशा पर सोचते हैं. दावोस में जो कहा जाता है, वह आज न सही, लेकिन आने वाले सालों में नीतियों में दिखने लगता है.
Q1. क्या WEF सरकार चलाती है?
A. नहीं, यह सिर्फ चर्चा का मंच है.
Q2. क्या आम आदमी WEF में जा सकता है?
A. नहीं, केवल आमंत्रण और सदस्यता से.
Q3. WEF का पैसा कहां से आता है?
A. कॉरपोरेट सदस्यता और पार्टनरशिप से.
Q4. क्या WEF के फैसले बाध्यकारी होते हैं?
A. नहीं, ये सुझाव और विचार होते हैं.
Q5. WEF हर साल दावोस में ही क्यों?
A. परंपरा, न्यूट्रल लोकेशन और ब्रांड वैल्यू के कारण.