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25 और 26 अक्टूबर को कुआलालंपुर में चीन के वाइस प्रीमियर हे लीफेंग (Vice Premier He Lifeng) और अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट (US Treasury Secretary Scott Bessent) और यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर (USTR Jamieson Greer) के बीच हाई-लेवल बातचीत हुई.
यह मीटिंग दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की इस साल हुई फोन बातचीत में तय हुई सहमतियों (Consensus) को आगे बढ़ाने के लिए आयोजित की गई थी. दोनों पक्षों ने माना कि व्यापारिक संबंधों में स्थिरता बनाए रखना न केवल उनके लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी ज़रूरी है.
इस दो दिवसीय मीटिंग में कई जटिल और लंबे समय से अटके हुए मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई. दोनों पक्षों ने जिन बिंदुओं पर बातचीत की, उनमें शामिल हैं-
परस्पर टैरिफ रोकने की अवधि बढ़ाना (Suspension of Reciprocal Tariffs)- दोनों देशों ने फिलहाल एक-दूसरे पर टैरिफ रोकने की अवधि बढ़ाने पर भी सहमति जताई.
चीन के वाइस प्रीमियर हे लीफेंग ने कहा कि चीन और अमेरिका दोनों को “आपसी सम्मान (Mutual Respect), शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Coexistence) और विन-विन कोऑपरेशन (Win-Win Cooperation)” के सिद्धांतों पर काम करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि व्यापारिक मतभेदों को बातचीत और समानता के आधार पर सुलझाना सबसे बेहतर रास्ता है. दोनों देशों को एक-दूसरे की चिंताओं को समझते हुए समाधान निकालने की जरूरत है.
चीन की ओर से कहा गया कि इस बातचीत में जो उपलब्धियां हासिल हुई हैं, उन्हें बनाए रखने के लिए दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका भी उसी दिशा में सहयोग करेगा और दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच हुई सहमतियों को लागू करने में सक्रिय रहेगा. इसके अलावा दोनों देशों के बीच इस साल हुई व्यापारिक वार्ताओं के नतीजों को आगे बढ़ाने की बात भी कही गई.
अमेरिकी प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि यूएस-चाइना ट्रेड रिलेशन (US-China Trade Relations) वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) की रीढ़ है. दोनों देशों के बीच स्थिर व्यापार से दुनिया भर के निवेशकों को विश्वास मिलेगा. उन्होंने कहा कि "संवाद जारी रखना ही दोनों के लिए सबसे बेहतर रास्ता है." इस मीटिंग को अमेरिका ने “कैंडिड, इन-डेप्थ और कंस्ट्रक्टिव” बताया, यानी खुली, गहरी और रचनात्मक बातचीत.
दोनों देशों ने इस पर सहमति जताई कि उनके बीच व्यापारिक रिश्तों का स्वस्थ, स्थिर और टिकाऊ विकास (Healthy, Stable, and Sustainable Development) दोनों की जनता के लिए फायदेमंद होगा. साथ ही, इसका फायदा पूरी दुनिया को मिलेगा क्योंकि चीन और अमेरिका वैश्विक व्यापार के दो सबसे बड़े केंद्र हैं.
हां, बैठक के अंत में दोनों पक्षों ने कुछ बुनियादी सहमतियां (Basic Consensus) बनाई हैं. अब दोनों देश अपने-अपने घरेलू अप्रूवल प्रोसेस (Domestic Approval Process) से गुजरेंगे और उसके बाद तय की गई व्यवस्थाओं को लागू करेंगे. इसमें टैरिफ विस्तार, निर्यात नियमों में लचीलापन और फेंटानिल से जुड़ी नीतियों पर साझा कार्रवाई शामिल है.
बीते कुछ सालों में चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर (Trade War) ने दुनिया के कई देशों की सप्लाई चेन (Supply Chain) पर असर डाला था. दोनों देशों की नीतियां अब जब धीरे-धीरे सहयोग की दिशा में बढ़ रही हैं, तो इसका सीधा फायदा भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) को भी मिल सकता है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर चीन और अमेरिका के बीच यह नई समझौता नीति लागू होती है, तो वैश्विक निवेश (Global Investment) और व्यापार (Global Trade) में स्थिरता आ सकती है. यह 2025 की पहली छमाही में दुनिया की जीडीपी (Global GDP) को 0.3% तक बढ़ा सकती है.
भारत इस समय चीन और अमेरिका दोनों के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ते बना रहा है. अगर दोनों दिग्गज देशों के बीच तनाव कम होता है, तो भारत को सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन (Supply Chain Diversification) का बड़ा फायदा मिल सकता है. विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और कृषि सेक्टर में भारत की स्थिति मजबूत हो सकती है.
कुआलालंपुर में हुई चीन-अमेरिका मीटिंग सिर्फ एक बातचीत नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक नई उम्मीद है. दोनों देशों ने यह साबित किया कि संवाद और सहयोग से ही मतभेद सुलझाए जा सकते हैं. अगर ये सहमतियां आगे बढ़ती हैं, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था (World Economy) एक बार फिर रफ्तार पकड़ सकती है. इस मीटिंग से संदेश साफ है- “प्रतिस्पर्धा जारी रहे, लेकिन सहयोग भी साथ चले.”
मलेशिया के कुआलालंपुर में.
चीन के वाइस प्रीमियर हे लीफेंग और अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने.
दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों को स्थिर बनाना.
टैरिफ, फेंटानिल ट्रेड, कृषि और एक्सपोर्ट कंट्रोल जैसे विषयों पर.
हां, कई बुनियादी समझौते तय किए गए.
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