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वैश्विक व्यापार की दुनिया में इस वक्त एक बड़ी 'कानूनी जंग' चल रही है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के उस मुख्य हथियार- IEEPA (इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट)- पर रोक लगा दी है, जिसका इस्तेमाल करके पूरी दुनिया पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाए गए थे.
लेकिन अगर आपको लग रहा है कि अब विदेशी सामान अमेरिका में सस्ता हो जाएगा, तो थोड़ा ठहरिए. ट्रंप प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि वह "प्लान-बी" के साथ तैयार हैं. एम्बेसडर जेमिसन ग्रीर और ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के बयानों से स्पष्ट है कि अमेरिका अपनी 'टैरिफ नीति' से पीछे हटने वाला नहीं है.
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अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) एम्बेसडर जेमिसन ग्रीर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति साफ कर दी है. उनके बयान के मुख्य बिंदु ये हैं:
कानूनी टूल में बदलाव: ग्रीर ने कहा कि नीति (Policy) में कोई बदलाव नहीं हुआ है. सुप्रीम कोर्ट ने केवल IEEPA के इस्तेमाल को सीमित किया है, लेकिन राष्ट्रपति के पास अन्य वैधानिक शक्तियां (जैसे सेक्शन 122, 301 आदि) हैं.
निरंतरता (Continuity): प्रशासन का लक्ष्य 15% के मौजूदा टैरिफ स्तर को बनाए रखना है ताकि अमेरिकी राजस्व पर कोई बुरा असर न पड़े.
अटल इरादा: उन्होंने जोर देकर कहा कि भले ही कोर्ट का फैसला खिलाफ आया हो, लेकिन ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी और टैरिफ एजेंडा जारी रहेगा.
चूंकि अब IEEPA का रास्ता बंद हो गया है, प्रशासन कांग्रेस द्वारा दी गई अन्य शक्तियों का उपयोग करेगा:
सेक्शन 122 (Section 122): यह कानून राष्ट्रपति को भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की समस्याओं को दूर करने के लिए 150 दिनों तक 15% तक का 'अस्थायी आयात अधिभार' (Temporary Import Surcharge) लगाने की अनुमति देता है.
सेक्शन 301 (Section 301): इसका उपयोग 'अनुचित व्यापार प्रथाओं' (जैसे बौद्धिक संपदा की चोरी) के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के रूप में किया जाता है.
सेक्शन 232 (Section 232): राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लगाए गए टैरिफ (जैसे स्टील और एल्युमीनियम पर) कोर्ट के इस फैसले से प्रभावित नहीं हुए हैं और वे लागू रहेंगे.
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने व्यापारिक भागीदारों को आश्वस्त किया है कि अमेरिका के साथ किए गए समझौते अभी भी प्रभावी हैं.
वैश्विक भागीदारों से संपर्क: बेसेंट ने कहा कि वे विदेशी व्यापारिक भागीदारों के संपर्क में हैं. अधिकांश देश उन समझौतों को बरकरार रखना चाहते हैं जो पहले तय किए जा चुके हैं.
राजस्व पर असर: ट्रेजरी विभाग का अनुमान है कि वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने से 2026 में टैरिफ से मिलने वाला राजस्व "लगभग अपरिवर्तित" (Virtually Unchanged) रहेगा.
सीधा संदेश: बेसेंट ने साफ किया है कि भले ही रास्ता थोड़ा 'घुमावदार' हो गया हो, लेकिन हम उसी टैरिफ स्तर पर वापस आ जाएंगे.
अमेरिकी प्रशासन ने यह दिखा दिया है कि वह अपनी व्यापारिक सुरक्षा (Trade Protectionism) की नीति पर अडिग है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक 'स्पीड ब्रेकर' जैसा साबित हुआ है, 'स्टॉप सिग्नल' जैसा नहीं. अब गेंद विदेशी व्यापारिक भागीदारों के पाले में है- वे या तो नए कानूनी ढांचे के तहत समझौतों को मानेंगे या फिर 'सेक्शन 301' जैसी सख्त जांचों का सामना करेंगे.
1- अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ पर क्या फैसला दिया है?
कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति IEEPA कानून का उपयोग करके अनिश्चित काल के लिए व्यापक टैरिफ नहीं लगा सकते.
2- क्या अब अमेरिका में आयात सस्ता होगा?
नहीं, क्योंकि प्रशासन ने तुरंत 'सेक्शन 122' के तहत 10% से 15% का नया वैश्विक अधिभार लगाने की घोषणा कर दी है.
3- सेक्शन 122 क्या है?
यह 1974 के व्यापार अधिनियम का एक प्रावधान है जो व्यापार घाटे को कम करने के लिए राष्ट्रपति को अस्थायी रूप से 15% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देता है.
4- एम्बेसडर ग्रीर ने 'निरंतरता' (Continuity) के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य पुरानी नीति के समान ही टैरिफ स्तर बनाए रखना है, बस उसे लागू करने का कानूनी आधार बदल जाएगा.
5- क्या भारत के साथ हुए व्यापारिक समझौते रद्द हो जाएंगे?
ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट के अनुसार, अमेरिका उम्मीद करता है कि सभी भागीदार अपने समझौतों का सम्मान करेंगे और वे प्रभावी बने रहेंगे.
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