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वैश्विक राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो (NATO) देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ट्रंप का गुस्सा इस बात पर है कि जिन देशों की सुरक्षा का जिम्मा अमेरिका उठाता है, वही देश अब ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी सैन्य अभियान में साथ खड़े होने से कतरा रहे हैं.
व्हाइट हाउस से दिए गए अपने तीखे बयान में ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि अब 'मुफ्त की सुरक्षा' का दौर खत्म होने वाला है. आइए, इस पूरी घटना और ट्रंप के दावों का विस्तार से समझते हैं.
डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो को एक 'वन-वे स्ट्रीट' कहा है. उनका तर्क है कि अमेरिका ने यूक्रेन संकट से लेकर यूरोप की सुरक्षा तक अरबों डॉलर खर्च किए और हजारों मील दूर जाकर मदद की, लेकिन जब आज अमेरिका को ईरान द्वारा 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को बंद किए जाने के खिलाफ मदद चाहिए, तो यूरोपीय देश केवल चिंता जता रहे हैं, सैन्य मदद नहीं दे रहे.
ट्रंप की चेतावनी: "अगर नाटो देशों का जवाब नकारात्मक रहा, तो यह इस गठबंधन के भविष्य के लिए बहुत बुरा होगा."
सहमति पर सवाल: नाटो देशों ने अमेरिका की चिंताओं (जैसे ईरान का परमाणु कार्यक्रम) पर तो सहमति जताई, लेकिन युद्ध में सीधे शामिल होने से इनकार कर दिया है.
ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी और इजरायली सेना ने मिलकर ईरान की सैन्य क्षमता को 'पूरी तरह से मिटा' (Obliterated) दिया है. उनके मुख्य दावे इस प्रकार हैं:
7000 ठिकानों पर हमला: ट्रंप के अनुसार, अब तक ईरान के 7000 से अधिक सैन्य और कमर्शियल ठिकानों को निशाना बनाया जा चुका है.
नौसेना और वायुसेना तबाह: ट्रंप का कहना है कि ईरान की नेवी और एयरफोर्स अब अस्तित्व में नहीं हैं. रडार और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है.
नेतृत्व का अंत: ट्रंप ने दावा किया कि ईरान का शीर्ष नेतृत्व (Leadership) हर स्तर पर खत्म हो चुका है. खबरों के मुताबिक, ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में ही सुप्रीम लीडर को निशाना बनाया गया था.
मिसाइल क्षमता में गिरावट: ट्रंप ने कहा कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता में 90% और ड्रोन हमलों में 95% की कमी आई है.
ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि अमेरिका को अब किसी की मदद की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा, "हम सबसे ताकतवर देश हैं और हम खुद ही काफी हैं." हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो देश 'हॉर्मुज' के रास्ते तेल मंगाते हैं (जैसे चीन और यूरोपीय देश), उन्हें उस रास्ते की सुरक्षा के लिए अपनी सेना भेजनी चाहिए, वर्ना अमेरिका अकेले यह 'पुलिसिंग' नहीं करेगा.
ईरान ने ट्रंप के दावों को 'एआई-जनरेटेड प्रोपेगेंडा' और 'बड़े झूठ' करार दिया है. तेहरान का कहना है कि वे लंबी जंग के लिए तैयार हैं. वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र ने नागरिक ठिकानों पर हो रहे हमलों और बढ़ती मौतों पर गंभीर चिंता जताई है.
डोनाल्ड ट्रंप का यह रुख नाटो के भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है. एक तरफ जहां वे ईरान को घुटनों पर लाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वे पुराने सहयोगियों से नाता तोड़ने की धमकी भी दे रहे हैं. यह 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का अब तक का सबसे आक्रामक रूप है.
1- 'वन-वे स्ट्रीट' कमेंट का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि अमेरिका गठबंधन को सब कुछ दे रहा है, लेकिन बदले में उसे सहयोगियों से कुछ नहीं मिल रहा.
2- क्या ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म हो गया है?
ट्रंप का दावा है कि उन्होंने ईरान के परमाणु और मिसाइल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को पूरी तरह नष्ट कर दिया है.
3- क्या नाटो देश इस युद्ध में शामिल होंगे?
नाटो प्रमुख मार्क रुटे ने कहा है कि गठबंधन इस ऑपरेशन में शामिल नहीं है, हालांकि वे तुर्की जैसे सदस्य देशों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं.
4- ट्रंप ने खार्ग द्वीप (Kharg Island) को क्यों छोड़ा?
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने केवल सैन्य ठिकानों को तबाह किया है, तेल पाइपलाइनों को इसलिए छोड़ा ताकि भविष्य में ईरान के पुनर्निर्माण में काम आ सकें.
5- क्या ट्रंप चीन से भी मदद मांग रहे हैं?
हां, ट्रंप ने कहा कि चीन को भी अपनी सेना भेजनी चाहिए क्योंकि उनके तेल का 90% हिस्सा इसी रास्ते से आता है.
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