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तेल से होने वाला मुनाफा सीधे रूस की सेना के काम आ रहा है. (प्रतीकात्मक फोटो: AI)
दुनिया इस समय तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है. खाड़ी देशों में अमेरिका और ईरान के बीच मिसाइलें गरज रही हैं और होर्मुज जलसंधि (Strait of Hormuz) बंद होने के डर ने ग्लोबल मार्केट में हाहाकार मचा दिया है. लेकिन इस संघर्ष और तनाव के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए जैसे 'लॉटरी' लग गई है. जैसे-जैसे कच्चा तेल (Crude Oil) महंगा हो रहा है, रूस की तिजोरी उतनी ही तेजी से भर रही है. भारत का 'सदाबहार दोस्त' कहा जाने वाला रूस अब मौके की नजाकत को भांपते हुए न केवल तेल की कीमतें बढ़ा रहा है, बल्कि भारत को मिलने वाले 'मैत्री डिस्काउंट' को भी धीरे-धीरे खत्म कर रहा है. आइए, डिकोड करते हैं कि कैसे दुनिया की तबाही पुतिन के लिए मुनाफे का सबसे बड़ा सौदा बन गई है.
ग्लोबल एनर्जी ट्रैकर्स (जैसे Kpler और Vortexa) के डेटा और मार्केट एक्सपर्ट्स के विश्लेषण के आधार पर रूस की 'ऑयल लॉटरी' कुछ इस तरह दिख रही है:
| पैरामीटर | अमेरिका-ईरान तनाव से पहले | पिछले 10 दिनों की स्थिति (तनाव के दौरान) | असर |
| यूराल क्रूड (रूस) की कीमत | $65 - $68 प्रति बैरल | $78-$82 प्रति बैरल | 20% की सीधी बढ़त |
| भारत को डिस्काउंट | $8 - $10 प्रति बैरल | $2-$4 प्रति बैरल | डिस्काउंट में भारी कटौती |
| दैनिक सप्लाई (एक्सपोर्ट) | 32 लाख बैरल प्रतिदिन | 35 लाख बैरल प्रतिदिन | डिमांड में 10% का इजाफा |
| कुल कमाई (10 दिन) | ~$16 - $18 Billion | $22-$25 Billion (₹1.8 लाख Cr) | करीब $6-7 Billion का शुद्ध लाभ |
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जब भी मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, तो बाजार में तेल की सप्लाई कम होने का डर बैठ जाता है. ईरान दुनिया का एक बड़ा तेल उत्पादक है और होर्मुज जलसंधि पर उसका नियंत्रण है. अगर यह रास्ता बंद होता है, तो दुनिया को तेल के लिए रूस की तरफ भागना पड़ेगा. सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा होने से तेल की कीमतें बढ़ती हैं, जिसका सीधा फायदा रूस के राजस्व (Revenue) को होता है.
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत को बहुत सस्ते दाम पर तेल बेचा था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें 90-100 के पार जाते ही रूस ने डिस्काउंट कम करना शुरू कर दिया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि रूस अब भारत से 'बेंचमार्क' कीमतों के करीब पैसा वसूल रहा है, जिससे भारत की 'बचत' पर भी धीरे-धीरे असर हो रहा है.
रूस पर पश्चिमी देशों ने कई प्रतिबंध लगाए हैं और $60 की 'प्राइस कैप' भी लगाई है. इससे बचने के लिए रूस ने पुराने जहाजों का एक विशाल बेड़ा (Shadow Fleet) तैयार किया है, जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. रूस इन्हीं जहाजों के जरिए भारत और चीन को जी-7 देशों की नजरों से बचकर महंगा तेल बेच रहा है.
ओपेक प्लस (OPEC+) देशों के साथ मिलकर रूस पहले ही तेल उत्पादन को कंट्रोल कर रहा है. अब अमेरिका-ईरान संकट ने उसे और भी ज्यादा 'लेवरेज' (बढ़त) दे दी है. पुतिन जानते हैं कि दुनिया की इकोनॉमी तेल पर चलती है और जब तक खाड़ी में आग लगी है, रूस का तेल सोने के भाव बिकेगा.
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| विवरण | 2023 की स्थिति | 2026 (मौजूदा स्थिति) |
| रूस से मिला डिस्काउंट | 10-15 प्रति बैरल | 2-4 प्रति बैरल (अनुमानित) |
| ग्लोबल ब्रेंट क्रूड | $75 - $80 | $90-$100 (तनाव के बीच) |
| रूस का मार्केट शेयर (भारत में) | 35% | 40% (निर्भरता बढ़ी) |
सीधा सा जवाब है- मौके का फायदा (Opportunism). रूस पर यूक्रेन युद्ध की वजह से भारी आर्थिक बोझ है. जब तक बाज़ार में विकल्प मौजूद थे, रूस को सस्ता बेचना पड़ा. लेकिन अब जब खाड़ी का रास्ता बंद होने के कगार पर है, रूस को पता है कि भारत के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं. इराक और सऊदी अरब का तेल भी होर्मुज से होकर आता है, इसलिए रूस अब अपनी 'डिलीवरी' के लिए प्रीमियम वसूल रहा है.
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Q1. क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर सकता है?
नहीं, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर बहुत ज्यादा निर्भर हो चुका है. अचानक किसी और सप्लायर की तलाश करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है.
Q2. क्या अमेरिका रूस पर और सख्त प्रतिबंध लगाएगा?
अमेरिका कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे डर है कि अगर रूस का तेल बाज़ार से पूरी तरह गायब हुआ, तो तेल की कीमतें $150 पार कर जाएंगी, जो खुद अमेरिका की इकोनॉमी के लिए तबाही होगी.
Q3. क्या पुतिन और ट्रंप की 'दोस्ती' से तेल सस्ता होगा?
अगर ट्रंप और पुतिन के बीच कोई समझौता होता है, तो रूस पर से प्रतिबंध हट सकते हैं, जिससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमतें नीचे आ सकती हैं. (लेकिन यह भविष्य की बात है).
Q4. रूस का तेल भारत तक कैसे आता है?
ज्यादातर तेल समुद्र के रास्ते आता है, जो 'शैडो फ्लीट' और अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों के रडार से बाहर के जहाजों द्वारा लाया जाता है.
Q5. क्या ईरान भी अपना तेल भारत को बेचेगा?
ईरान पर अभी कड़े अमेरिकी प्रतिबंध हैं. यदि भारत ईरान से सीधे तेल खरीदता है, तो उसे अमेरिकी नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है.