पश्चिम में युद्ध और पूर्व एशिया में किम जोंग उन का जश्न; नॉर्थ कोरिया इलेक्शन में सुप्रीम लीडर को मिले 99.93% वोट, जीती सभी 687 सीटें

नॉर्थ कोरिया में किम जोंग उन की यह जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि एक बार फिर उनके अटूट नियंत्रण और सत्ता के केंद्रीकरण का प्रदर्शन है. 99.93% वोट और 687 की 687 सीटें- ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि देश के भीतर उनकी पकड़ कितनी मजबूत है और राजनीतिक व्यवस्था किस तरह एक ही नेतृत्व के इर्द-गिर्द संचालित होती है. इस जीत के साथ प्योंगयांग में जश्न का माहौल है- जहां इसे जनता के समर्थन और स्थिरता के प्रतीक के तौर पर पेश किया जा रहा है.
पश्चिम में युद्ध और पूर्व एशिया में किम जोंग उन का जश्न; नॉर्थ कोरिया इलेक्शन में सुप्रीम लीडर को मिले 99.93% वोट, जीती सभी 687 सीटें

नॉर्थ कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन जश्न मना रहा है. जश्न अपनी सबसे बड़ी जीत का. (प्रतीकात्मक फोटो: AI)

जब एशिया का पश्चिमी हिस्सा युद्ध की आग में जल रहा है- मिसाइलें दागी जा रही हैं, गठबंधन बन और टूट रहे हैं, उसी वक्त पूर्व एशिया में एक अलग ही तस्वीर उभरती है. यहां न गोलियों की आवाज है, न विरोध के नारे… बल्कि सत्ता के गलियारों में सन्नाटा है, जो सिर्फ एक ही नाम से भरा है- किम जोंग उन.

यह वही नॉर्थ कोरिया है, जिसे दुनिया “सबसे बंद देश” कहती है. जहां इंटरनेट सीमित है, मीडिया नियंत्रित है और सत्ता एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है. बाहर की दुनिया के लिए यह देश हमेशा एक रहस्य रहा है- कभी परमाणु मिसाइलों के कारण, तो कभी अपने सख्त नियमों के कारण.

और अब इसी रहस्यमयी देश से एक और खबर आई है- किम जोंग उन जश्न में डूबे हैं. किम जोंग उन को ससंदीय चुनाव में 99.93% वोट मिले हैं. 687 की 687 सीटों पर उनकी जीत हुई है.

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किसी भी नेता के लिए ऐतिहासिक जीत

नॉर्थ कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन जश्न मना रहा है. जश्न अपनी सबसे बड़ी जीत का. जश्न अपने विजय तिलक का.

नॉर्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन ने संसदीय चुनाव में 99.93% वोट हासिल कर लिए. इतना ही नहीं, उनकी पार्टी ने संसद की सभी 687 सीटों पर जीत दर्ज की.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मतदान प्रतिशत भी 99.99% रहा. यह किसी भी नेता के लिए ऐतिहासिक जीत है.

नॉर्थ कोरिया का चुनाव: कैसे होता है पूरा सिस्टम?

नॉर्थ कोरिया में चुनाव का तरीका दुनिया के बाकी देशों से बिल्कुल अलग है.

यहां चुनाव में आमतौर पर:

  • हर सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार होता है
  • वह उम्मीदवार सरकार या सत्ताधारी पार्टी द्वारा तय किया जाता है
  • मतदाता के पास विकल्प लगभग नहीं होता

मतदान के दौरान लोगों को बैलेट पेपर पर “हां” या “ना” का विकल्प दिया जाता है, लेकिन “ना” कहना practically संभव नहीं होता.

इसी वजह से यहां चुनाव के नतीजे अक्सर 99% या उससे ज्यादा वोट शेयर के साथ आते हैं.

15वीं सुप्रीम पीपुल्स असेंबली: क्या है इसका महत्व?

यह चुनाव 15वीं Supreme People’s Assembly के लिए हुआ है, जो नॉर्थ कोरिया की संसद है.

यह संसद:

  • देश के शीर्ष पदों को औपचारिक मंजूरी देती है
  • नीतिगत फैसलों पर मुहर लगाती है
  • संविधान में बदलाव पर चर्चा करती है

हालांकि, असली सत्ता संसद में नहीं, बल्कि किम जोंग उन और वर्कर्स पार्टी के हाथ में होती है.

किम जोंग उन: कौन हैं और कैसे बने ताकत का केंद्र?

किम जोंग उन नॉर्थ कोरिया के तीसरी पीढ़ी के शासक हैं. उनके दादा किम इल-सुंग ने 1948 में नॉर्थ कोरिया की स्थापना की थी. उनके पिता किम जोंग इल ने लंबे समय तक देश पर शासन किया.

2011 में पिता की मौत के बाद किम जोंग उन सत्ता में आए. तब उन्हें युवा और अनुभवहीन माना जा रहा था, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे सेना, पार्टी और प्रशासन पर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया.

आज वे नॉर्थ कोरिया के

  • Supreme Leader
  • सेना के प्रमुख
  • और सबसे शक्तिशाली राजनीतिक चेहरा हैं.

दुनिया उन्हें तानाशाह क्यों कहती है?

किम जोंग उन की छवि दुनिया में एक सख्त और विवादित नेता की है.

इसके पीछे कई कारण हैं:

  • विपक्ष या विरोध की कोई जगह नहीं
  • मीडिया पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में
  • सख्त कानून और सीमित नागरिक स्वतंत्रता
  • आलोचना पर कड़ी कार्रवाई

यही वजह है कि नॉर्थ कोरिया को अक्सर दुनिया का सबसे बंद (Closed) देश कहा जाता है.

0.07% वोट का विरोध: क्या मायने हैं?

इस चुनाव में सिर्फ 0.07% वोट विरोध में पड़े.

यह आंकड़ा छोटा जरूर है, लेकिन यह बताता है कि सिस्टम पूरी तरह नियंत्रित है.

विशेषज्ञों का मानना है कि:

यह विरोध वास्तविक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक हो सकता है. या फिर यह दिखाने के लिए रखा जाता है कि “लोकतंत्र मौजूद है”.

वैश्विक संदर्भ: युद्ध, लोकतंत्र और नियंत्रण

जब पश्चिम एशिया में युद्ध चल रहा है और कई देशों में लोकतंत्र पर बहस हो रही है, तब नॉर्थ कोरिया का यह चुनाव एक अलग तस्वीर पेश करता है.

  • यहां स्थिरता है, लेकिन आजादी सीमित
  • यहां विरोध नहीं, लेकिन विकल्प भी नहीं

यही कारण है कि नॉर्थ कोरिया का मॉडल दुनिया के लोकतांत्रिक देशों से बिल्कुल अलग माना जाता है.

क्या यह चुनाव सिर्फ औपचारिकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार नॉर्थ कोरिया में चुनाव:

सत्ता बदलने का माध्यम नहीं बल्कि सत्ता को वैधता (legitimacy) देने का तरीका है.

यानी:

  • चुनाव होते हैं
  • लेकिन परिणाम पहले से तय होते हैं

आगे क्या?

अब नई संसद प्योंगयांग में बैठक करेगी, जहां शीर्ष पदों की औपचारिक पुष्टि होगी. नीतिगत दिशा तय की जाएगी. संभवतः कुछ संवैधानिक बदलावों पर चर्चा होगी.

लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि असली फैसले किम जोंग उन ही लेंगे.

जश्न में डूबा प्योंगयांग

नॉर्थ कोरिया में किम जोंग उन की यह जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि एक बार फिर उनके अटूट नियंत्रण और सत्ता के केंद्रीकरण का प्रदर्शन है.

% वोट और 687 की 687 सीटें- ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि देश के भीतर उनकी पकड़ कितनी मजबूत है और राजनीतिक व्यवस्था किस तरह एक ही नेतृत्व के इर्द-गिर्द संचालित होती है.

इस जीत के साथ प्योंगयांग में जश्न का माहौल है- जहां इसे जनता के समर्थन और स्थिरता के प्रतीक के तौर पर पेश किया जा रहा है.

FAQs

Q. किम जोंग उन को कितने वोट मिले?
A. उन्हें 99.93% वोट मिले.

Q. नॉर्थ कोरिया में कितनी सीटें हैं?
A. सुप्रीम पीपुल्स असेंबली में 687 सीटें हैं.

Q. क्या नॉर्थ कोरिया में मल्टीपार्टी सिस्टम है?
A. नहीं, वहां सत्ता पूरी तरह नियंत्रित है.

Q. क्या यह लोकतांत्रिक चुनाव है?
A. तकनीकी रूप से हां, लेकिन व्यवहार में यह पूरी तरह नियंत्रित प्रक्रिया है.

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