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फरवरी 2026 की यह तारीख वैश्विक इतिहास के सबसे अशांत पलों में दर्ज हो गई है. इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमला कर दिया है, जिसके साथ ही पूरे मध्य-पूर्व में युद्ध का बिगुल बज चुका है. यह हमला महज एक सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि उस 'अदृश्य घेराबंदी' का परिणाम है जिसकी आहट पिछले 26 दिनों से महसूस की जा रही थी.
चीन का ईरान से अपने नागरिकों को रातों-रात निकालना इस महायुद्ध का सबसे बड़ा 'अलार्म' साबित हुआ, जिसने दुनिया को बता दिया था कि ईरान अब सुरक्षित नहीं रहा. आज, इजरायल के लड़ाकू विमानों की गर्जना और ईरान के भीतर घोषित इमरजेंसी ने इस डर को सच कर दिया है.
युद्ध की आहट हमेशा कूटनीति के गलियारों में पहले गूंजती है. जब पिछले दिनों चीन ने अपने नागरिकों को ईरान से तत्काल बाहर निकालने का आदेश दिया, तो दुनिया भर के विश्लेषक चकित रह गए थे. चीन, जो दशकों से ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार, उसका आर्थिक सहारा और संयुक्त राष्ट्र में उसका 'डिप्लोमैटिक शील्ड' रहा है, उसने अचानक अपने कदम क्यों पीछे खींच लिए?
इसका जवाब केवल एक है- इंटेलिजेंस. बीजिंग का ईरान के भीतर सबसे गहरा खुफिया नेटवर्क है. चीन की यह 'इवैकुएशन' कोई सामान्य चेतावनी नहीं थी, बल्कि एक स्पष्ट संकेत था कि ईरान की जमीन पर अब सैन्य कार्रवाई का ज्वालामुखी फटने वाला है. चीन का भागना ही वह 'अलार्म' था, जिसने जर्मनी, भारत, ब्राजील और कनाडा जैसे 15 देशों को एक साथ अपने नागरिकों को निकालने के लिए मजबूर कर दिया.
इजरायल के इस हमले को समझने के लिए हमें 2003 के इराक युद्ध के पन्नों को पलटना होगा. 2003 में अमेरिका ने जिस तरह का सैन्य जमावड़ा किया था, आज 2026 में उससे भी अधिक उन्नत और घातक 'स्ट्राइक आर्किटेक्चर' तैयार है. पिछले 26 दिनों में मध्य-पूर्व में जो घटा, वह इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ.
विशालकाय नौसैनिक घेराबंदी: दो अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स का तैनाती का मतलब है- ईरान की मिसाइल रेंज के बाहर से भी पूरे देश को तबाह करने की क्षमता.
F-22 रैप्टर का पदार्पण: 21 वर्षों के इतिहास में पहली बार इजरायल में F-22 रैप्टर की तैनाती यह सुनिश्चित करने के लिए थी कि ईरान के रडार और डिफेंस सिस्टम को हवा में ही 'अंधा' कर दिया जाए.
लॉजिस्टिक रिपोजिशनिंग: अल उदेईद एयर बेस से 18 टैंकरों का अचानक गायब होकर सुरक्षित ठिकानों पर जाना यह दर्शाता है कि अब मिसाइलें बरसने वाली हैं. यह कोई अचानक हुई झड़प नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित 'ब्लूप्रिंट' का अंत है.
ईरान का 'ट्रिपल थ्रेट': इजरायल की मिसाइलें एक ऐसे ईरान पर गिरी हैं, जो बाहरी हमले से पहले ही आंतरिक पतन के कगार पर था. यह 45 साल के अमेरिकी-ईरान संघर्ष का सबसे कमजोर मोड़ है.
आर्थिक शून्यता: ईरान की अर्थव्यवस्था अपनी क्षमता के केवल 39% पर सिमट गई है. शेयर बाजार में 40% की गिरावट और नौकरियों में 81% की कमी ने देश की औद्योगिक कमर तोड़ दी है.
'वाटर डे जीरो' और बिजली का अंधकार: देश के कई प्रांतों में पानी की बूंद-बूंद को लेकर हाहाकार है. शासन ने प्रदर्शनों को दबाने के लिए बिजली काटी और लोगों को अंधेरे में गोलियों से भून दिया, जिससे हजारों जानें गईं.
संकट का चरम: 2020 में सोलेमानी की मौत के बाद जो आंतरिक स्थिरता थी, वह आज पूरी तरह खत्म हो चुकी है. अब ईरान के पास युद्ध लड़ने के लिए न तो संसाधन हैं और न ही जनता का समर्थन.
इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) ने पुष्टि की है कि पिछले कुछ मिनटों में ईरान के भीतर ठिकानों पर मिसाइलें बरसाई गई हैं. पूरे इजरायल में इमरजेंसी घोषित है, सायरन बज रहे हैं और नागरिकों को सुरक्षित 'प्रोटेक्टेड स्पेस' में रहने के आदेश दिए गए हैं. इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि यह 'प्री-एम्प्टिव' हमला है. यानी, इससे पहले कि ईरान अपनी मिसाइलें दागता, उसे उसके लॉन्च पैड पर ही कुचलने की कोशिश है.
जिनेवा, जेरूसलम और वियना में पिछले कुछ दिनों से जारी कूटनीतिक बैठकों का विफल होना इस बात का प्रमाण है कि अब बातचीत का समय समाप्त हो चुका है. तेल की कीमतें $92 पर आग उगल रही हैं, और वैश्विक बाजार इस बात को लेकर दहशत में है कि क्या यह युद्ध अब पूरे मध्य-पूर्व को अपनी चपेट में ले लेगा.