कोलंबिया यूनीवर्सिटी ने माना भारत का लोहा, कहा 2600 साल पहले होती थी प्लास्टिक सर्जरी

कोलंबिया यूनीवर्सिटी (COLUMBIA UNIVERSITY) ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारत की ताकत को स्वीकार किया है.
कोलंबिया यूनीवर्सिटी ने माना भारत का लोहा, कहा 2600 साल पहले होती थी प्लास्टिक सर्जरी

सुश्रुत को सर्जरी का जनक कहा जाता है (फोटो- Wikipedia)

कोलंबिया यूनीवर्सिटी (COLUMBIA UNIVERSITY) ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारत की ताकत को स्वीकार किया है. कोलंबिया यूनीवर्सिटी के इरविंग मेडिकल सेंटर ने कहा है कि कुछ लोग प्लास्टिक सर्जिरी को मार्डर्न लक्जरी समझते हैं, लेकिन कॉस्मेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव प्रोसीजर्स का इतिहास 2600 साल पुराना है. कोलंबिया यूनीवर्सिटी के डिवीजन ऑफ प्लास्टिक सर्जरी (PLASTIC SURGERY) ने कहा है, 'छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में सुश्रुत्र नाम के एक भारतीय फिजिशियन ने मेडिसिन और सर्जरी पर किताब लिखी. सुश्रुत्र संहिता में 1100 से अधिक बीमारियों का इलाज बताया गया है. सैकड़ों औषधीय पौधों का फायदा बताया गया है.'

प्लास्टिक सर्जरी और सुश्रुत संहिता

कोलंबिया यूनीवर्सिटी ने कहा है, 'सर्जरी कैसे की जाए, इसके बारे में बताया गया है. इसमें तीन तरह के त्वचा प्रत्यारोपण और नाक को फिर से आकार देने का तरीका शामिल है.' आमतौर पर प्लास्टिक सर्जरी के नाम से लोग समझते हैं कि किसी कृत्रिम पदार्थ का सर्जरी में उपयोग. हालांकि प्लास्टिक सर्जरी ग्रीक शब्द प्लास्टिको से बना है, जिसका अर्थ है बदलना या नया आकार देना. इस तरह सुश्रुत्र संहिता में बताई गई ये सर्जरी प्लास्टिक सर्जरी ही है.

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राइनोप्लास्टी की जानकारी

रिपोर्ट में बताया गया है कि त्वचा प्रत्यारोपण में शरीर के एक हिस्से से त्वचा को लेकर दूसरे हिस्से में लगाया जाता था. सुश्रुत की किताब में दुनिया में पहली बार फोरहेड फ्लैप राइनोप्लास्टी (Rhinoplasty) के बारे में बताया गया, जिस टेक्नीक का इस्तेमाल आज भी किया जाता है. इसके तहत सिर की त्वचा की मदद से नाक को नया आकार दिया जाता है. कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने लिखा है कि उस समय लोगों को चोरी और व्यभिचार के आरोप में नाक काटने की सजा दी जाती थी और ऐसी सजा पाने वाले लोग बाद में नाक की प्लास्टिक सर्जिरी करवाते थे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आज भी सर्जन शरीर के जिस हिस्से में नई त्वचा बननी बंद हो जाती है, वहां डॉक्टर स्किल प्रत्यारोपण की मदद लेते हैं. आश्चर्य की बात है कि इन सभी विधियों को सुश्रुत्र संहिता में अच्छी तरह समझाया गया है.

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