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क्या ईरान से युद्ध से अब जल्दी बाहर निकलना चाहते हैं ट्रंप?
दुनिया की महाशक्ति अमेरिका इस वक्त एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसता नजर आ रहा है, जिसका सिरा युद्ध के मैदान से होकर शेयर बाजार के गलियारों तक जाता है. ईरान के साथ जारी जंग को एक महीना बीत चुका है, लेकिन जीत का दावा करने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के माथे पर अब चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में जारी तनाव और सहयोगियों के 'पीछे हटने' ने ट्रंप को इस कदर नाराज कर दिया है कि उन्होंने अब NATO (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) को ही अलविदा कहने का मन बना लिया है.
एक इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ कहा कि वह NATO से बाहर निकलने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. उन्होंने इसे एक 'कागजी शेर' करार दिया है. आखिर क्यों ट्रंप अपने दशकों पुराने दोस्तों से नाराज हैं और क्या वास्तव में ईरान युद्ध अमेरिका के लिए एक 'महंगा सौदा' साबित हो रहा है? चलिए, इस पूरे घटनाक्रम की एक-एक कड़ी को विस्तार से समझते हैं.
इस पूरे विवाद की जड़ में है वह समुद्री रास्ता, जहां से दुनिया का 20 परसेंट तेल गुजरता है. ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग बंद कर दिया है. ट्रंप चाहते थे कि NATO के सदस्य देश अपनी नौसेना भेजें और अमेरिका का साथ दें, लेकिन ब्रिटेन जैसे पुराने साथियों ने इससे साफ इनकार कर दिया.
ट्रंप का गुस्सा: ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ने हमेशा सहयोगियों की मदद की (जैसे यूक्रेन के मामले में), लेकिन जब अमेरिका को ईरान के खिलाफ मदद चाहिए थी, तो कोई सामने नहीं आया.
ब्रिटेन के साथ तल्खी: ट्रंप ने ब्रिटिश पीएम कीर स्टारमर की जमकर आलोचना की. उन्होंने ब्रिटेन की नौसेना की ताकत पर भी सवाल उठाए. जवाब में स्टारमर ने साफ कह दिया, "यह हमारी जंग नहीं है."
वन-वे स्ट्रीट: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने तो यहाँ तक कह दिया कि NATO अब 'वन-वे स्ट्रीट' बन गया है, जहां सिर्फ अमेरिका ही सबको दे रहा है.
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भले ही ट्रंप बाहर से सख्त दिख रहे हों, लेकिन अंदरूनी आंकड़े बता रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस युद्ध का बोझ ज्यादा दिन नहीं उठा पाएगी. यही वजह है कि ट्रंप अब 'बिना किसी समझौते के जीत की घोषणा' करके युद्ध खत्म करने की जुगत लगा रहे हैं.
युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 119 डॉलर प्रति बैरल तक चली गई थीं. अमेरिका में पेट्रोल के दाम 4 डॉलर प्रति गैलन को पार कर चुके हैं. अगर तेल महंगा रहेगा, तो महंगाई बढ़ेगी. इससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे आम अमेरिकियों की जेब पर भारी बोझ पड़ेगा.
अमेरिका का 30 ट्रिलियन डॉलर का ट्रेजरी मार्केट (जहां सरकार कर्ज लेती है) भारी दबाव में है. सरकारी बॉन्ड की डिमांड कम हो रही है और ब्याज दरें (Yields) बढ़ रही हैं. इसका मतलब है कि अमेरिकी सरकार के लिए अपना खर्च चलाने के लिए कर्ज लेना अब बहुत महंगा हो गया है. ट्रंप प्रशासन इस आर्थिक दबाव को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकता.
शेयर बाजार किसी भी राष्ट्रपति की लोकप्रियता का पैमाना होता है. अमेरिकी शेयर बाजार (Dow Jones) अपने ऊंचे स्तरों से 10 परसेंट गिरकर 'करेक्शन टेरिटरी' में जा चुका है. निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है. ट्रंप जानते हैं कि अगर बाजार और गिरा, तो उनकी राजनीतिक साख मिट्टी में मिल जाएगी.
युद्ध के दूसरे महीने में प्रवेश करते ही ट्रंप के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है. इसे विशेषज्ञों ने उनकी पुरानी 'ब्लास्टर' यानी बढ़ा-चढ़ाकर बात करने वाली शैली माना है.
विरोधाभासी बयान: कभी ट्रंप कहते हैं कि वे ईरान को 'मिटा' देंगे, तो कभी कहते हैं कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता.
अकेले लड़ने की बात: सहयोगियों के मना करने पर वे अब कह रहे हैं कि उन्हें किसी की मदद की जरूरत नहीं है, जबकि हकीकत में वे चौतरफा दबाव महसूस कर रहे हैं.
परमाणु हथियार: ट्रंप का कहना है कि उनका असली मकसद सिर्फ ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है, और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं.
व्हाइट हाउस अब सिर्फ NATO से निकलने की धमकी नहीं दे रहा, बल्कि संगठन के ढांचे को बदलने की तैयारी में है. एक नया 'पे-टू-प्ले' मॉडल लाने की चर्चा है. इसके तहत-
डोनाल्ड ट्रंप इस वक्त एक बड़ी मुश्किल में फंसे हैं. एक तरफ ईरान को सबक सिखाने की जिद है, तो दूसरी तरफ अपने ही देश की चरमराती अर्थव्यवस्था और रूठे हुए सहयोगी. हॉर्मुज का संकट सिर्फ एक युद्ध नहीं, बल्कि एक वैश्विक आर्थिक भूकंप की आहट है.
ट्रंप का NATO छोड़ने का संकेत देना यह बताता है कि वे अब अपनी शर्तों पर ही दुनिया को चलाना चाहते हैं. लेकिन क्या वॉल स्ट्रीट और ट्रेजरी मार्केट की गिरावट उन्हें ऐसा करने देगी? आने वाले दो हफ्ते न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे.