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बुजुर्गों की बढ़ती फौज से खतरे में चीन का भविष्य?
चीन ने दशकों तक अपनी विशाल और युवा कार्यबल के दम पर दुनिया भर के बाजारों पर राज किया. 'मेड इन चाइना' का लेबल हर घर तक पहुंचा क्योंकि वहां काम करने वाले हाथों की कमी नहीं थी. लेकिन आज वही चीन एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसका जनसांख्यिकीय लाभ अब उसके लिए एक बड़ा बोझ बनता जा रहा है. ताइपे टाइम्स (Taipei Times) की एक रिपोर्ट के अनुसार, ताइवानी शोधकर्ता वांग चान-हसी ने चेतावनी दी है कि चीन की आबादी का ढांचा अब पूरी तरह चरमरा रहा है.
पिछले साल चीन में नवजात शिशुओं की संख्या गिरकर महज 79.2 लाख रह गई. अगर इसकी तुलना साल 2016 के आंकड़ों से करें, तो यह उस समय की तुलना में केवल 44 प्रतिशत ही है. यह गिरावट इतनी तेज है कि इसने विशेषज्ञों के सभी पुराने अनुमानों को फेल कर दिया है. 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद से यह जन्मदर का सबसे न्यूनतम स्तर है. चीन की कुल आबादी अब 1.40489 अरब पर सिमट गई है, जो लगातार चार वर्षों से नकारात्मक विकास दर दर्ज कर रही है.
गिरती जन्मदर का सबसे पहला और गहरा असर चीन के शिक्षा क्षेत्र पर पड़ना शुरू हो गया है. जब बच्चे ही नहीं होंगे, तो स्कूल भला कैसे चलेंगे? साल 2024 के आंकड़े बताते हैं कि चीन में लगभग 20,000 किंडरगार्टन यानी बालवाटिकाएं बंद हो गई हैं. इसके कारण प्री-स्कूल में पढ़ाने वाले 2.40 लाख से ज्यादा शिक्षकों की नौकरियां चली गई हैं.
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यह तो बस शुरुआत है. साल 2023 से प्राथमिक विद्यालयों में भी छात्रों की संख्या हर साल 20 लाख से ज्यादा की दर से घट रही है. कई क्षेत्रों में शिक्षकों के पदों में भारी कटौती की जा रही है और मौजूदा शिक्षकों पर अपनी भूमिकाएं बदलने या नई नौकरियों की तलाश करने का भारी दबाव है. यह स्थिति दिखाती है कि चीन का भविष्य यानी उसकी अगली पीढ़ी किस तरह गायब होती जा रही है. अगले तीन से पांच साल में चीन की जन्मदर ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के बराबर पहुंच सकती है, जो पहले से ही इस संकट से जूझ रहे हैं.
चीन की आबादी के साथ एक और बड़ी समस्या है लिंग अनुपात का भयानक अंतर. यह असंतुलन शहरों और गांवों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर रहा है. सातवीं राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, शहरों में जहां 100 महिलाओं पर 106 पुरुष हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह अनुपात बढ़कर 120 पुरुषों तक पहुंच गया है.
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रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के ग्रामीण इलाकों में करीब 3 करोड़ युवा पुरुष कुंवारे रह रहे हैं क्योंकि वहां महिलाओं की कमी है. इसके उलट, बड़े और विकसित शहरों (फर्स्ट और सेकंड टियर सिटीज) में 2 करोड़ से ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं जो अविवाहित हैं. यह सामाजिक विरोधाभास शादी की दर को और नीचे गिरा रहा है, जिससे जन्मदर में सुधार की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. युवा पीढ़ी अब शादी और बच्चों की जिम्मेदारी से दूर भाग रही है, जो चीन के अर्थतंत्र के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है.
चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह "अमीर होने से पहले ही बूढ़ा" हो गया है. जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने जब इस तरह के जनसांख्यिकीय संकट का सामना किया, तब तक वे विकसित और अमीर देश बन चुके थे. लेकिन चीन की प्रति व्यक्ति आय अभी भी उन देशों के मुकाबले काफी कम है. ऊपर से कमजोर उपभोक्ता मांग ने उसकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार को और धीमा कर दिया है.
बुजुर्गों के बीच आय का वितरण भी इतना असमान है कि वह सामाजिक असंतोष पैदा कर रहा है. चीन में 32 करोड़ से ज्यादा रिटायर लोग हैं. इनमें से 18 करोड़ ग्रामीण पेंशनभोगी ऐसे हैं जिन्हें हर महीने 200 युआन (करीब 2300 रुपये) से भी कम मिलते हैं. दूसरी तरफ, सिर्फ 1.7 करोड़ शहरी रिटायर्ड लोग ही ऐसे हैं जो हर महीने 5,000 युआन से ज्यादा कमाते हैं. यह कुल रिटायर्ड आबादी का महज 5.3 प्रतिशत है. गांवों के करोड़ों बुजुर्गों के पास न तो पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं हैं और न ही सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त पैसा.
मध्यम और लंबी अवधि में, घटती प्रजनन दर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी चीन के सतत विकास के लिए एक दीवार बनकर खड़ी हो जाएगी. शोधकर्ता वांग चान-हसी का मानना है कि यह जनसांख्यिकीय बदलाव चीन की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को उम्मीद से कहीं ज्यादा बुरी तरह से अस्त-व्यस्त कर सकता है. काम करने वाले लोगों की कमी होने से फैक्ट्रियां प्रभावित होंगी, मजदूरी बढ़ेगी और चीन का 'मैन्युफैक्चरिंग हब' होने का तमगा छीन सकता है.
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चीन की सरकार ने 'वन चाइल्ड पॉलिसी' से हटकर अब 'थ्री चाइल्ड पॉलिसी' को बढ़ावा देना शुरू किया है, लेकिन महंगाई, शिक्षा का खर्च और करियर की होड़ के बीच चीनी युवा इसे अपनाने को तैयार नहीं हैं. अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दशकों में चीन की अर्थव्यवस्था अपनी चमक खो देगी और उसका वैश्विक दबदबा कम होना तय है.