ईरान युद्ध के बीच जानिए ऐशिया में कौन सा देश है जो सबसे ज्यादा हथियारों पर खर्च कर रहा पैसा? लिस्ट में भारत का भी नाम शामिल

ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने पूरे एशिया में हथियारों की होड़ तेज कर दी है. जानिए चीन, भारत और मिडिल ईस्ट के देश अपनी सेना पर कितना पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं.
ईरान युद्ध के बीच जानिए ऐशिया में कौन सा देश है जो सबसे ज्यादा हथियारों पर खर्च कर रहा पैसा? लिस्ट में भारत का भी नाम शामिल

सांकेतिक तस्वीर

आज के दौर में जब हम सुबह उठकर खबरें देखते हैं, तो मन में एक ही सवाल आता है कि क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की कगार पर है. ईरान और इजरायल के बीच जो तनाव इस समय चरम पर है, उसने केवल दो देशों को ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया की नींद उड़ा दी है.

जब हवाओं में बारूद की गंध हो, तो कोई भी देश हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकता. यही वजह है कि आज एशिया के तमाम देश अपनी तिजोरी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खतरनाक हथियारों और डिफेंस सिस्टम पर खर्च कर रहे हैं. एशिया अब केवल मसालों और संस्कृति का केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य अखाड़ा बनता जा रहा है. आइए आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि इस तनाव के बीच एशिया की महाशक्तियां अपनी सुरक्षा के लिए क्या कर रही हैं.

चीन का विशालकाय बजट

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अगर हम खर्च की बात करें, तो चीन इस रेस में सबको पीछे छोड़ चुका है. SIPRI डेटा के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच चीन का सैन्य बजट 20 फीसदी से भी ज्यादा बढ़कर 320 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है. यह आंकड़ा डराने वाला है क्योंकि चीन केवल अपनी सीमाएं सुरक्षित नहीं कर रहा, बल्कि वह अपनी सेना को इतना आधुनिक बना रहा है कि वह अमेरिका को चुनौती दे सके. दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान तक, चीन का बढ़ता खर्च पड़ोसियों के लिए खतरे की घंटी है.

भारत की तैयारी

Statista की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर मजबूती से खड़ा है. 2024 में भारत का रक्षा बजट 84 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. पिछले पांच सालों में इसमें 8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन भारत की रणनीति चीन से अलग है. भारत अब केवल विदेश से हथियार नहीं मंगवा रहा, बल्कि वह 'मेड इन इंडिया' मिसाइलें, फाइटर जेट और सबमरीन बनाने पर पैसा खर्च कर रहा है. सीमा पर जारी तनाव और हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारत का यह खर्च बहुत जरूरी हो गया है.

ईरान बनाम इजरायल

मिडिल ईस्ट में मचे घमासान के बीच हर किसी की नजर ईरान और इजरायल की ताकत पर है.

इजरायल: युद्ध के हालातों को देखते हुए इजरायल का सैन्य खर्च अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 46.5 बिलियन डॉलर के करीब पहुंच गया है. अपनी जीडीपी का करीब 9 फीसदी हिस्सा सेना पर खर्च करने वाला इजरायल तकनीक के मामले में बहुत आगे है. उसका 'आयरन डोम' और 'एरो' जैसे मिसाइल डिफेंस सिस्टम दुनिया में सबसे महंगे और सटीक माने जाते हैं.

ईरान: दूसरी तरफ ईरान का आधिकारिक बजट लगभग 7.9 बिलियन डॉलर है. हालांकि यह इजरायल के मुकाबले कम दिखता है, लेकिन ईरान का सारा पैसा उसके मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन तकनीक पर खर्च होता है, जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल रखा है.

रेगिस्तान का सबसे अमीर योद्धा

अगर हम मिडिल ईस्ट की बात करें, तो सऊदी अरब को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 79 बिलियन डॉलर के भारी-भरकम बजट के साथ सऊदी अरब इस क्षेत्र का सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है. वह अपनी सेना को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए आधुनिक टैंक और फाइटर जेट्स की बड़ी खेप खरीद रहा है ताकि क्षेत्र में शक्ति संतुलन बना रहे.

जापान और ताइवान

जापान, जो कभी अपनी शांतिवादी नीतियों के लिए जाना जाता था, उसने अपने रक्षा बजट में 40 फीसदी की ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है. 58 बिलियन डॉलर का यह बजट उत्तर कोरिया और चीन के खतरे का मुकाबला करने के लिए है. वहीं, ताइवान भी 17 बिलियन डॉलर के साथ अपनी सेना को अभेद्य बनाने में जुटा है.

FAQs

Q: एशिया में सबसे ज्यादा सैन्य खर्च करने वाला देश कौन सा है?
A: चीन एशिया में सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश है, जिसका बजट 2024 में 320 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है.

Q: ईरान और इजरायल के रक्षा बजट में कितना अंतर है?
A: इजरायल का रक्षा बजट करीब 46.5 बिलियन डॉलर है, जबकि ईरान का आधिकारिक खर्च लगभग 7.9 बिलियन डॉलर है.

Q: भारत का रक्षा बजट पिछले कुछ सालों में कितना बढ़ा है?
A: भारत का रक्षा बजट 2020 के मुकाबले 2024 में 8 फीसदी बढ़कर 84 बिलियन डॉलर हो गया है.

Q: सऊदी अरब रक्षा पर इतना पैसा क्यों खर्च कर रहा है?
A: सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में अपनी सुरक्षा और प्रभुत्व बनाए रखने के लिए 79 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, जो क्षेत्र में सबसे ज्यादा है.

Q: क्या जापान ने भी अपना रक्षा बजट बढ़ाया है?
A: हां, जापान ने चीन और उत्तर कोरिया के खतरे को देखते हुए अपने रक्षा बजट में 40 फीसदी की बढ़ोतरी की है, जो अब 58 बिलियन डॉलर है.

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