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सड़क पर बनी सफेद पट्टियां एक दूसरे से कितनी दूरी पर होती हैं? प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
सड़क पर चलते समय हर ड्राइवर ने सफेद लाइनों या कह लें पट्टियों को जरूर देखा होगा. कई लोग यह सवाल पूछते हैं कि आखिर इन सफेद लाइनों के बीच कितनी दूरी होती है और क्या इसका कोई तय नियम होता है.
दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के यूनिफाइड ट्रैफिक एंड ट्रांसपोर्टेशन इंफ्रास्ट्रक्चर (PLG & ENGG) सेंटर यानी UTTIPEC की आधिकारिक गाइडलाइन के अनुसार, सड़क पर बनी इन लाइनों की लंबाई और इनके बीच का गैप पूरी तरह स्टैंडर्ड माप के अनुसार तय किया जाता है ताकि ट्रैफिक सुरक्षित और व्यवस्थित रहे.
UTTIPEC की रोड मार्किंग गाइडलाइन के अनुसार, सामान्य सीधी सड़कों पर इस्तेमाल होने वाली सफेद टूटी हुई लाइनें वाहनों को एक ही दिशा में अलग-अलग लेन में चलाने के लिए बनाई जाती हैं. इनका उद्देश्य ड्राइवरों को लेन डिसिप्लिन बनाए रखने में मदद करना होता है.

गाइडलाइन के मुताबिक हर सफेद लाइन का पेंटेड हिस्सा आमतौर पर 1.5 मीटर लंबा होता है. इसके बाद अगली लाइन आने से पहले लगभग 3 मीटर का खाली गैप छोड़ा जाता है. इस तरह सड़क पर एक पूरा पैटर्न 4.5 मीटर का बनता है जिसमें 1.5 मीटर सफेद लाइन और 3 मीटर का खाली हिस्सा शामिल होता है.
आधिकारिक गाइडलाइन के अनुसार, सड़क के मोड़ों और इंटरसेक्शन के आसपास ड्राइवरों को ज्यादा सतर्क रखने के लिए सफेद लाइनों के बीच की दूरी कम कर दी जाती है.
ऐसी जगहों पर दो लाइनों के बीच का गैप सामान्य 3 मीटर की बजाय 1.5 मीटर तक रखा जाता है. इसका उद्देश्य ड्राइवरों को विजुअल चेतावनी देना होता है ताकि वे स्पीड कम करें और ज्यादा ध्यान से वाहन चलाएं.
गाइडलाइन में यह भी बताया गया है कि चार लेन से कम चौड़ाई वाली सड़कों पर आमतौर पर पीली सेंटर लाइन का इस्तेमाल किया जाता है. ये लाइनें विपरीत दिशा में चलने वाले ट्रैफिक को अलग करने का काम करती हैं.
ऐसी सड़कों पर लाइन का पेंटेड हिस्सा 3 मीटर लंबा होता है जबकि दो हिस्सों के बीच 4.5 मीटर का गैप रखा जाता है. इन मार्किंग्स का उपयोग सुरक्षित ओवरटेकिंग और ट्रैफिक सेपरेशन के लिए किया जाता है.
UTTIPEC गाइडलाइन के अनुसार, चार लेन वाली सड़कों पर भी लेन मार्किंग के लिए 1.5 मीटर लंबी सफेद लाइन और 3 मीटर का गैप इस्तेमाल किया जाता है.
वहीं छह लेन वाली सड़कों पर डबल सॉलिड सेंटर लाइन का उपयोग किया जाता है. हालांकि लेन मार्किंग का पैटर्न सामान्य तौर पर वही रहता है जिसमें 1.5 मीटर लाइन और 3 मीटर की दूरी शामिल होती है.
आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, रोड मार्किंग ट्रैफिक मैनेजमेंट और रोड सेफ्टी सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इनका इस्तेमाल ट्रैफिक फ्लो गाइड करने, असुरक्षित ओवरटेकिंग रोकने, लेन डिसिप्लिन बनाए रखने और खराब मौसम में विजिबिलिटी बेहतर करने के लिए किया जाता है.
गाइडलाइन में यह भी बताया गया है कि सड़क पर इस्तेमाल होने वाली पेंट और रिफ्लेक्टिव मटेरियल को इस तरह डिजाइन किया जाता है ताकि रात, बारिश और धुंध जैसी परिस्थितियों में भी ड्राइवर आसानी से लेन पहचान सकें.
दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के UTTIPEC द्वारा जारी आधिकारिक रोड मार्किंग गाइडलाइन के अनुसार, सामान्य सड़कों पर सफेद टूटी हुई लाइनें आमतौर पर 1.5 मीटर लंबी होती हैं और उनके बीच 3 मीटर का गैप रखा जाता है. मोड़ों और इंटरसेक्शन के पास यह दूरी घटाकर 1.5 मीटर की जा सकती है. ये सभी माप सड़क सुरक्षा, बेहतर ट्रैफिक मैनेजमेंट और स्मूद वाहन संचालन के लिए तय किए गए स्टैंडर्ड ट्रैफिक इंजीनियरिंग नियमों का हिस्सा हैं.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 सड़क पर सफेद टूटी हुई लाइन का मतलब क्या होता है?
यह लाइन एक ही दिशा में चल रहे वाहनों की लेन अलग करने के लिए इस्तेमाल होती है और जरूरत पड़ने पर लेन बदलने की अनुमति देती है.
Q2 सड़क पर पीली सेंटर लाइन क्यों बनाई जाती है?
पीली सेंटर लाइन विपरीत दिशा में चलने वाले ट्रैफिक को अलग करने के लिए उपयोग की जाती है.
Q3 रोड मार्किंग में रिफ्लेक्टिव पेंट क्यों इस्तेमाल होता है?
रात, बारिश और धुंध में विजिबिलिटी बेहतर बनाने के लिए रिफ्लेक्टिव मटेरियल का उपयोग किया जाता है.
Q4 क्या सभी सड़कों पर एक जैसी रोड मार्किंग होती है?
नहीं. सड़क की चौड़ाई, ट्रैफिक और डिजाइन के अनुसार अलग-अलग मार्किंग पैटर्न इस्तेमाल किए जाते हैं.
Q5 रोड मार्किंग ट्रैफिक सेफ्टी में कैसे मदद करती है?
यह ड्राइवरों को दिशा, लेन और चेतावनी संकेत देकर सड़क पर सुरक्षित ड्राइविंग में मदद करती है.