द्रोणाचार्य अवॉर्ड से नवाजी गई भारत की पहली महिला हॉकी कोच, जानिए कैसे तय किया ये सफर!

भारतीय खेल में ऐसे तमाम नाम हैं जिन्‍होंने न सिर्फ अपनी मेहनत के बल पर खुद को साबित किया, बल्कि देश के लिए भी प्रेरणा बन गए. उन्‍हीं में से एक नाम प्रीतम सिवाच का है. वो सिर्फ एक खिलाड़ी या कोच नहीं, बल्कि द्रोणाचार्य अवॉर्ड से नवाजी जाने वाली पहली महिला भी हैं.
द्रोणाचार्य अवॉर्ड से नवाजी गई भारत की पहली महिला हॉकी कोच, जानिए कैसे तय किया ये सफर!

भारतीय खेल इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ खिलाड़ी या कोच नहीं, बल्कि प्रेरणा के प्रतीक बन जाते हैं. ऐसा ही एक नाम है प्रीतम सिवाच का. उस दौर में जब बेटियों का घर से निकलकर खेल खेलना तक मुश्किल था, ये हरियाणा की शेरनी ना सिर्फ हॉकी स्टिक थामकर मैदान में उतरी, बल्कि गांव के तानों को अनसुना कर इतिहास रच दिया. उन्होंने अपने शानदार खेल से देश को कई मेडल दिलाए और फिर कोचिंग में उतरकर 'द्रोणाचार्य अवॉर्ड' पाने वाली पहली महिला हॉकी कोच बनकर एक नया अध्याय लिखा. हर साल 2 अक्‍टूबर को उनका जन्‍मदिन होता है. आइए जानते हैं उनके प्रेरक सफर के बारे में.

खेल के मैदान से संघर्ष की शुरुआत

गुरुग्राम के झाड़सा गांव में 2 अक्टूबर 1974 को जन्मीं प्रीतम सिवाच ने जब महज 13 साल की उम्र में हॉकी स्टिक थामी, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये लड़की एक दिन इतिहास रच देगी. उस दौर में लड़कियों का खेलकूद करना आम बात नहीं थी और प्रीतम को गांव के लोगों से खूब ताने सुनने पड़े. मगर, ये लड़की पक्की इरादों वाली थी. लोगों की बातों पर ध्यान दिए बिना, वो अपने सपने को पूरा करने में लगी रहीं.

सपनों के लिए 'बगावत' और परिवार का साथ

जब प्रीतम 10वीं क्लास में थीं, तो परिवार ने शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया. लेकिन, प्रीतम के मन में तो कुछ और ही था. उन्होंने साफ कह दिया कि अगर इतनी जल्दी शादी हुई, तो वो घर से भाग जाएंगी! उनकी इस हिम्मत के आगे परिवार को झुकना पड़ा और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए दो साल की मोहलत मिल गई. यहीं से उनके असली सफर की शुरुआत हुई.

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमक

साल 1990 में, प्रीतम ने पहली बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए 'सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी' का खिताब जीता. फिर 1992 में आया वो पल जब उन्होंने जूनियर एशिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व किया. ये उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट था और यहां भी उन्होंने 'बेस्ट प्लेयर' का खिताब अपने नाम किया. इसी साल रेलवे से जुड़ने के बाद प्रीतम को खुद पर और भरोसा हो गया कि वो अब अपने सपनों के लिए समाज से लड़ सकती हैं.

शादी के बाद भी नहीं रुका सफर

शादी के बाद भले ही उन्हें सोनीपत जाना पड़ा, लेकिन उनके पति और मायके से उन्हें भरपूर सपोर्ट मिला. इस सपोर्ट ने उन्हें और मजबूत बनाया और वो भारतीय हॉकी टीम की कमान संभालने के लिए तैयार हो गईं. 1998 में एशियन गेम्स (Asiaad) में उन्होंने भारत को रजत पदक दिलाया, जो एक बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन, असली चमक तो 2002 के कॉमनवेल्थ गेम्स में दिखी, जब प्रीतम की अगुवाई में भारतीय महिला हॉकी टीम ने गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा.

कोचिंग की नई पारी और 'द्रोणाचार्य' सम्मान

एक शानदार खिलाड़ी होने के साथ-साथ प्रीतम में एक बेहतरीन कोच की भी झलक थी. 2002 में उन्होंने कोचिंग शुरू करने का फैसला लिया. कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में वो भारतीय महिला हॉकी टीम की ट्रेनर थीं. आज वो सोनीपत में 'द प्रीतम सिवाच एकेडमी' चलाती हैं, जहां से कई खिलाड़ियों ने ओलंपिक तक का सफर तय किया है.

हॉकी में उनके बेहतरीन योगदान के लिए 1998 में उन्हें 'अर्जुन अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया. और फिर, साल 2021 में, उन्हें 'द्रोणाचार्य पुरस्कार' से नवाजा गया, जिसने उन्हें 'द्रोणाचार्य अवॉर्ड' पाने वाली पहली महिला हॉकी कोच बनाकर इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया.

एक सच्ची प्रेरणा

प्रीतम सिवाच की कहानी ये बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती. उन्होंने सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि हजारों लड़कियों के लिए एक रास्ता बनाया है कि वो भी अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं. ये एक ऐसी कहानी है जो हमें सिखाती है कि मेहनत, लगन और हिम्मत के दम पर कुछ भी हासिल किया जा सकता है.

Add Zee Business as a Preferred Source