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आज गुरुवार 20 मार्च को जैसे ही आप मोबाइल या लैपटॉप में कुछ सर्च करने के लिए गूगल पर जाएंगे, आपको गूगल नए अवतार में नजर आएगा. Google ने आज एक खास तरह का Doodle बनाया है. ये डूडल है Nowruz 2025 का. ऐसे में तमाम लोगों के मन में सवाल होगा कि ये नवरोज आखिर है क्या? नवरोज पारसी समुदाय के लोगों के लिए बहुत खास दिन है. दो पारसी शब्दों नव और रोज से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है- नया दिन. इस दिन से पारसी नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है. पारसी नववर्ष को पतेती, जमशेदी नवरोज, नौरोज और नवरोज जैसे नामों से भी जाना जाता है. यहां जानिए नवरोज से जुड़ी खास बातें.
नवरोज से ईरानी कैलेंडर की शुरुआत होती है. इसका मतलब है ईरानी कैलेंडर के पहले महीने का पहला दिन. ग्रेगोरी कैलेंडर के अनुसार, नवरोज वसंत ऋतु में दिन मनाया जाता है, जब दिन और रात बराबर होते हैं. कहा जाता है कि करीब 3,000 वर्ष पहले नवरोज को सेलिब्रेट करने की परंपरा शुरू हुई थी. इस दिन को फारसी राजा जमशेद की याद में मनाते हैं. इसी दिन राजा जमशेद ने पारसी कैलेंडर की स्थापना की थी.
नवरोज के दिन पारसी लोग सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई करते हैं. रंगोली वगैरह बनाते हैं. घर में चंदन की लकड़ियों के टुकड़ों को रखा जाता है, जिससे पूरे घर में चंदन की खुशबू आती है. पारसी मंदिर अगियारी में विशेष प्रार्थनाएं होती हैं. लोग मंदिर में जाकर फल, चंदन, दूध और फूलों का चढ़ावा देते हैं. साथ ही उपासना स्थल पर चन्दन की लकड़ी अग्नि को समर्पित की जाती है.
चंदन की लकड़ी को लेकर मान्यता है कि इसकी सुगंध से हवा स्वच्छ होती है. प्रार्थनाओं के दौरान पिछले साल लोगों ने जो कुछ भी पाया, उसके लिए ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करते हैं. इसके बाद एक दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं. इस दिन घरों में खास पकवान भी बनाए जाते हैं, जिन्हें पारसी लोग अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ बांटते हैं. साथ ही एक दूसरे को गिफ्ट वगैरह भी देते हैं.
अंग्रेजी कैलेंडर में बेशक 1 साल में 365 दिन होते हैं, लेकिन पारसी कैलेंडर में एक साल दिन सिर्फ 360 होते हैं. पारसी कैलेंडर में एक वर्ष में 12 महीने होते हैं, हर महीना 30 दिनों का होता है. इस तरह कुल 360 दिन होते हैं. बाकी पांच दिन गाथा के रूप में मनाए जाते हैं. इन पांच दिनों में पारसी समुदाय के लोग मिलकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं.