सुरों की मल्लिका पद्म विभूषण आशा भोसले का निधन, 92 साल की उम्र में ली आखिरी सांस

दिग्गज सिंगर आशा भोसले का 92 साल की उम्र में मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया है. उनके बेटे आनंद भोसले ने इस खबर की पुष्टि की. आठ दशकों से अधिक के करियर में आशा भोंसले ने शास्त्रीय संगीत से लेकर पॉप और कैबरे तक हर तरह के गानों को अपनी आवाज दी. उन्हें दादा साहब फाल्के और पद्म विभूषण जैसे सम्मानों से नवाजा गया था.
सुरों की मल्लिका पद्म विभूषण आशा भोसले का निधन, 92 साल की उम्र में ली आखिरी सांस

भारतीय संगीत जगत के लिए आज का दिन एक गहरे शोक की लहर लेकर आया है. अपनी जादुई आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली महान गायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं. रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली. उन्हें 11 अप्रैल को बहुत ज्यादा थकान और सीने में संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उनके निधन की खबर से संगीत प्रेमियों और फिल्म इंडस्ट्री में सन्नाटा पसर गया है.

आशा भोसले के बेटे आनंद भोसले ने इस दुखद खबर की पुष्टि की है. अस्पताल के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी माता जी का निधन हो गया है. उन्होंने यह भी जानकारी दी कि जो लोग उन्हें अंतिम विदाई देना चाहते हैं, वह सोमवार सुबह 11 बजे उनके घर पर आ सकते हैं. आशा जी का अंतिम संस्कार कल शाम 4 बजे मुंबई के प्रसिद्ध शिवाजी पार्क में किया जाएगा.

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बचपन से शुरू हुआ सुरों का सफर

आशा भोसले का संगीत का सफर महज 10 साल की उम्र में शुरू हो गया था. उन्होंने साल 1943 में एक मराठी फिल्म 'माझा बाल' के गाने 'चला चला नव बाला' से अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके पांच साल बाद, 1948 में उन्होंने फिल्म 'चुनरिया' के गाने 'सावन आया' के जरिए हिंदी सिनेमा में कदम रखा. हालांकि, शुरुआती दौर में उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी गायिकाओं का दबदबा था, लेकिन आशा जी ने हार नहीं मानी.

उनकी मेहनत रंग लाई और 1957 में फिल्म 'नया दौर' से उन्हें बड़ी पहचान मिली. इस फिल्म के गाने 'मांग के साथ तुम्हारा' और 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी' जबरदस्त हिट रहे. इसके बाद आशा जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह उस दौर की सबसे ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने वाली गायिका बन गईं.

अपनी एक अलग और खास पहचान बनाई

आशा भोसले की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने कभी अपनी बहन लता मंगेशकर की शैली की नकल नहीं की. उन्होंने जानबूझकर अपनी एक अलग पहचान बनाई. जहां लता जी को उनकी सुरीली और गंभीर गायकी के लिए जाना जाता था, वहीं आशा जी ने वेस्टर्न म्यूजिक और कैबरे गानों में महारत हासिल की.

संगीतकार आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत की दुनिया में तहलका मचा दिया था. 'तीसरी मंजिल' फिल्म के गाने 'आजा आजा' और 'ओ हसीना जुल्फों वाली' आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं. वह मशहूर डांसर हेलन की आवाज बन गईं और 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां) व 'ये मेरा दिल' (डॉन) जैसे गानों को हमेशा के लिए अमर कर दिया.

हर तरह के गानों में दिखाई अपनी प्रतिभा

आशा जी सिर्फ चुलबुले या तेज गानों तक सीमित नहीं रहीं. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 'उमराव जान' (1981) जैसी फिल्म में बेहद खूबसूरत गजलें गाईं. 'दिल चीज क्या है' और 'इन आंखों की मस्ती के' जैसी गजलों के लिए उन्हें अपना पहला नेशनल अवार्ड मिला. इसके बाद फिल्म 'इजाजत' के गाने 'मेरा कुछ सामान' के लिए उन्हें एक और नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया.

हैरानी की बात तो यह है कि 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए गाने गाना जारी रखा. 90 के दशक में 'रंगीला' फिल्म के गाने 'तन्हा तन्हा' और 'रंगीला रे' ने धूम मचा दी थी. इसके बाद 'लगान' का 'राधा कैसे ना जले' और 'लकी' का 'लकी लिप्स' जैसे गानों से उन्होंने साबित कर दिया कि उनकी आवाज पर उम्र का कोई असर नहीं होता.

संगीत के साथ अभिनय में भी आजमाया हाथ

आशा भोसले का रचनात्मक सफर सिर्फ गायकी तक ही सीमित नहीं था. 2013 में, 79 साल की उम्र में उन्होंने फिल्म 'माई' (Mai) से अभिनय की दुनिया में कदम रखा. इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया था जो अल्जाइमर जैसी बीमारी से जूझ रही थी. उनके इस काम को भी काफी सराहा गया.

इसके अलावा, उन्होंने फिल्मों से अलग हटकर भी बहुत काम किया. उन्होंने गुलजार साहब और आर.डी. बर्मन के साथ 'दिल पड़ोसी है' जैसे एल्बम किए और लेस्ली लुईस के साथ 'जानम समझा करो' जैसा पॉप एल्बम भी दिया. उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी पहचान थी. उस्ताद अली अकबर खान के साथ उनके काम को 'ग्रैमी अवार्ड' के लिए नामांकित किया गया था.

उपलब्धियों और रिकॉर्ड का शानदार चार्ट

आशा भोसले का नाम दुनिया में सबसे ज्यादा गाने रिकॉर्ड करने वाली गायिका के तौर पर 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज है. उन्होंने न केवल हिंदी बल्कि मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, पंजाबी और कन्नड़ सहित कई भारतीय भाषाओं में गाने गाए हैं.

Conclusion

आशा भोसले का जाना संगीत के एक स्वर्णिम युग का अंत है. उनकी आवाज में वो जादू था जो हर उम्र के व्यक्ति को अपना बना लेता था. उन्होंने शास्त्रीय संगीत, गजल, पॉप और कैबरे के बीच की दूरियों को अपनी गायकी से पाट दिया था. हालांकि वह आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज और उनके गाए हजारों गीत हमेशा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेंगे और उन्हें सुकून देंगे.

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