&format=webp&quality=medium)
चेक बाउंस मामले में बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव को बड़ी राहत मिली है. दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें चेक बाउंस मामले में मेलबर्न यात्रा की सशर्त अनुमति दे दी है. अभिनेता 27 जून से 5 जुलाई 2025 तक अपनी आगामी फिल्म 'मेरा काले रंग दा यार' के प्रचार कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये अनुमति कुछ शर्तों के अधीन होगी, जिनमें एक लाख रुपए की फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद (एफडीआर) कोर्ट रजिस्ट्री में जमा करनी होगी. साथ ही अपना मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी भी उपलब्ध कराना होगा, जो विदेश यात्रा के दौरान हर समय चालू रहना चाहिए. इसके अलावा, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट में जमा उनका पासपोर्ट उन्हें विदेश यात्रा के लिए सौंपा जाए, लेकिन भारत लौटने के बाद इसे पुनः अदालत में जमा करना अनिवार्य होगा.
दरअसल साल 2010 में राजपाल यादव ने बतौर डायरेक्टर अपनी फिल्म 'अता-पता लापता' के लिए 5 करोड़ रुपए का लोन लिया था, लेकिन वो इस रकम को लौटा नहीं पाए. जिसके बाद उनके और अन्य के खिलाफ चेक बाउंस से जुड़ी सात अलग-अलग शिकायतें दर्ज कराई गईं. मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल को कई नोटिस भेजे, लेकिन वे कोर्ट में पेश नहीं हुए. साल 2013 में उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया. उन्होंने 3 से 6 दिसंबर 2013 तक जेल में चार दिन काटे थे, जिसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उनकी अपील पर सजा निलंबित कर दी थी.
बता दें कि अभिनेता राजपाल यादव के खिलाफ मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत दर्ज है, जिसमें राजपाल यादव को पिछले साल सजा सुनाई गई थी. उन्होंने और उनकी पत्नी ने इस सजा के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जून 2024 में कोर्ट ने यह मानते हुए उनकी सजा पर रोक लगा दी थी कि वे कोई गंभीर अपराधी नहीं हैं और उनके मामले में सुधार और समाधान की गुंजाइश है. कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी समझौते की संभावनाएं तलाशने का सुझाव दिया था, जो वर्तमान में दिल्ली हाईकोर्ट के मीडिएशन सेंटर में विचाराधीन है.
भारत में चेक बाउंस होने को एक अपराध माना जाता है. Negotiable Instrument Act 1881 की धारा 138 के मुताबिक चेक का बाउंस होना एक दंडनीय अपराध है और इसके अलावा दो साल की सजा और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है. हालांकि ये उसी स्थिति में होता है जब चेक देने वाले के अकाउंट में पर्याप्त बैलेंस न हो और बैंक चेक को डिसऑनर कर दे.
ऐसा नहीं चेक डिसऑनर होते ही भुगतानकर्ता पर मुकदमा चला दिया जाता है. चेक के बाउंस होने पर बैंक की तरफ से पहले लेनदार को एक रसीद दी जाती है, जिसमें चेक बाउंस होने की वजह के बारे में बताया जाता है. इसके बाद लेनदार को 30 दिनों के अंदर देनदार को नोटिस भेज सकता है. अगर नोटिस के 15 दिनों के अंदर देनदार की तरफ से कोई जवाब न आए तो लेनदार कोर्ट जा सकता है. लेनदार मजिस्ट्रेट की अदालत में एक महीने के अंदर शिकायत दर्ज करा सकता है. इसके बाद भी उसे देनदार से रकम न मिले तो वो उस पर केस कर सकता है. दोषी पाए जाने पर 2 साल तक की जेल या जुर्माना या फिर दोनों लगाया जा सकता है.