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बीते कुछ समय से OTT का चलन तेजी से बढ़ा है. वेबसीरीज, फिल्म, शॉर्ट फिल्म से लेकर डॉक्यूमेंट्री तक, एंटरटेनमेंट से जुड़ा तमाम कंटेंट आसानी से ओटीटी पर मिल जाता है. ऐसे में लोग एक साथ कई ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का सब्सक्रिप्शन ले लेते हैं. लेकिन भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 9 तरह के डार्क पैटर्न्स का इस्तेमाल किया जा रहा है. सब्सक्रिप्शन ले चुके तमाम यूजर्स इसके झांसे में फंसकर परेशान हो रहे हैं और यही वजह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को लेकर शिकायतें भी तेजी से बढ़ रही हैं. हाल ही में OTT को लेकर हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई है.
लोकल सर्किल्स ने देशभर के 353 जिलों में ये सर्वे किया जिसमें 95,000 लोगों ने हिस्सा लिया. सर्वे में शामिल 50% यूजर्स का कहना था कि उन्हें सबसे ज्यादा समस्या सब्सक्रिप्शन कैंसिल करने में होती है क्योंकि कैंसिलेशन का ऑप्शन सामने नहीं होता, वो इंटरफेस में छिपा होता है. वहीं 77% यूजर्स ने ‘फोर्स्ड एक्शन’ को लेकर परेशानी को शेयर किया.
1- ड्रिप प्राइसिंग (Drip Pricing): इसमें शुरुआत में सब्सक्रिप्शन चार्जेज कम दिखाए जाते हैं, बाद में बढ़ा दिए जाते हैं.
2- सब्सक्रिप्शन ट्रैप (Subscription Trap): आपके सब्सक्रिप्शन को बिना सहमति के रिन्यू कर देना.
3- फोर्स्ड एक्शन (Forced Action): कंटेंट के लिए जबरन ऐप डाउनलोड या निजी जानकारी मांगना.
4- इंटरफेस-इंटरफेस (Interface-Interface): ऐसे डिजाइन जो गलत बटन पर क्लिक करवाएं.
5- सास बिलिंग (SaaS Billing): सर्विस के नाम पर बार-बार चार्ज करना.
6- प्राइवेसी जकरिंग (Privacy Zuckering): यूजर की जानकारी बिना स्पष्ट सहमति के शेयर करना.
7- नैगिंग (Nagging): बार-बार पॉप-अप या नोटिफिकेशन से यूजर को परेशान करना.
8- बेट एंड स्विच (Bait and Switch): इसमें यूजर को एक आकर्षक ऑफर (जैसे- 'ऐड-फ्री' प्लान) वगैरह दिखाकर लुभाया जाता है, लेकिन बाद में चुपके से शर्तें बदल दी जाती हैं या उस प्लान के लिए पैसे मांगे जाते हैं.
9- डिसगाइज्ड ऐड (Disguises Ad): ऐसे विज्ञापन जो कंटेंट की तरह दिखते हैं.
Dark Pattern एक तरह का यूजर इंटरफेस होता है जो इस तरह से डिज़ाइन किया जाता है कि यूजर फैसला लेने पर मजबूर हो जाए. इसका मकसद यूजर को कंफ्यूज करके उनसे अनचाहे सब्सक्रिप्शन दिलवाना, ज़्यादा पैसे खर्च करवाना होता है, जिससे कंपनी का फायदा हो सके. कुल मिलाकर कहें तो Dark Pattern के जरिए कंपनियां ग्राहकों को मैनिपुलेट करती हैं, जिससे वो उनका प्रोडक्ट खरीद लेते हैं. डार्क पैटर्न सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं होता है, बल्कि कंपनियां इसे ऑफलाइन भी करती हैं.