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कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनकर ही लोग घबरा जाते हैं. आमतौर पर इस बीमारी का पता तीसरी या चौथी स्टेज पर चल पाता है और तब तक ये बीमारी गंभीर रूप ले लेती है. इससे बचाव का एक यही तरीका है कि समय-समय पर शरीर की जरूरी जांचें करवाई जाएं ताकि बीमारी का समय रहते इलाज किया जा सके. कैंसर कई तरह का होता है. कोलोरेक्टल कैंसर भी उनमें से एक है और ये दुनिया में सबसे आम प्रकार के कैंसर में से एक है, लेकिन इसे लेकर कई गलतफहमियां लोगों के बीच फैली हुई हैं.
चूंकि मार्च का महीना Colorectal Cancer Awareness Month के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है. इस मौके पर हम मुंबई के फोर्टिस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉ. अनिल हीरूर के जरिए उन गलतफहमियों को दूर करने का प्रयास करेंगे, ताकि इस बीमारी को लेकर लोगों को जागरूक किया जा सके.
उम्र बढ़ने के साथ कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा ज़रूर बढ़ता है, लेकिन युवाओं को भी यह बीमारी हो सकती है. हाल के अध्ययनों के अनुसार, 50 साल से कम उम्र के लोगों में भी कोलोरेक्टल कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं. जीवनशैली, जेनेटिक्स और खानपान इसकी मुख्य वजहें हो सकती हैं. इसलिए, युवाओं के लिए भी नियमित जांच करवाना बहुत जरूरी है.
कई लोग मानते हैं कि जब तक कोई लक्षण न दिखे, तब तक कोलोरेक्टल कैंसर की जांच कराने की जरूरत नहीं है. लेकिन यह कैंसर शुरुआती चरणों में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकता है. यही कारण है कि नियमित जांच, जैसे कि कोलोनोस्कोपी, प्रीकैंसरस पॉलीप्स (जो बाद में कैंसर में बदल सकते हैं) को समय रहते पहचानने और हटाने में मदद करती है.
ये सच है कि कोलोरेक्टल कैंसर की फैमिली हिस्ट्री होने से इसका खतरा बढ़ सकता है, लेकिन अधिकांश मामले ऐसे लोगों में होते हैं जिनका कोई ज्ञात जेनेटिक संबंध नहीं होता. यही कारण है कि डॉक्टर 45 साल की उम्र से सभी लोगों को नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं.
यह गलत धारणा है कि यह कैंसर केवल पुरुषों में होता है. यह बीमारी महिलाओं को भी उतनी ही गंभीरता से प्रभावित करती है. कई बार महिलाओं में इसके लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है या जागरूकता की कमी के कारण वे देर से जांच करवाती हैं. इससे बीमारी का इलाज कठिन हो सकता है.
कोलोरेक्टल कैंसर का निदान होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति जीवित नहीं रहेगा. जब समय रहते पता चल जाता है, तो स्थानीयकृत कोलोरेक्टल कैंसर के लिए जीवित रहने की दर 90% से अधिक होती है. आजकल कोलोरेक्टल कैंसर की सर्जरी में काफी आधुनिकीकरण आ गया है. यह अब दूरबीन (लैप्रोस्कोपी) और रोबोटिक्स की सहायता से की जाती है, जिससे डॉक्टर सटीक सर्जरी कर सकते हैं. फ्लोरोसेंस निर्देशित सर्जरी के कारण अब इलाज के नतीजे बेहतर हैं. ऐसे में डॉक्टरों को बड़ा चीरा लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ती. पहले, जब ये कैंसर होता था तो मरीज़ के मोशन के लिए पेट के पास एक स्थायी जगह, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है, बनाई जाती थी. लेकिन, अब इन आधुनिक तकनीकों के चलते इस सर्जरी में बदलाव आए हैं और अब स्ट्रोमा से बचा जा सकता है. इन एडवांसमेंट के परिणामस्वरूप, मरीज़ को वापस स्वस्थ महसूस करने और अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को वापस शुरू करने में कम समय लगता है. अगर लोग इन आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के बारे में जागरूक हों और गलतफहमियों को दूर करें तो कोलोरेक्टल कैंसर की रोकथाम और इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है.