90 के दशक में जाएं तो उस समय टेक्नोलॉजी ने वो स्पीड नहीं पकड़ी थी, जितनी की आज. आज के समय में टेक्नोलॉजी सातवें आसमान पर पहुंच चुकी है. 90s किड्स के लिए जिंदगी काफी दिलचस्प हुआ करती थी. क्योंकि उस समय पर जो इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स और गैजेट्स घर में हुआ करते थे वो आज भी याद आते हैं. कुछ लोगों ने तो उसे एंटीक के तौर पर घर में सजा रखे हैं. चलिए आपको भी ले चलते हैं 90s की दुनिया में.
1/5आज के टचस्क्रीन से पहले, हमारे घरों की शान हुआ करता था ये भारी-भरकम टेलीफोन. इसका मज़ा नंबर मिलाने में था. उंगली फंसाकर 'घुर्रर्र...' की आवाज़ के साथ डायल घुमाने का अहसास ही कुछ और था. हर नंबर के लिए ये इंतज़ार करना पड़ता था और गलती से कोई नंबर गलत घूम गया, तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता था. इसकी 'ट्रिंग-ट्रिंग' वाली आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है.
2/5ये 90 के दशक का 'स्पॉटिफ़ाई' था. अपनी कमर में वॉकमैन लगाकर और कानों में हेडफ़ोन लगाकर घूमने का मतलब था कि आप 'कूल' हैं. कैसेट में अपने पसंदीदा गाने रिकॉर्ड करके 'मिक्सटेप' बनाने का चलन इसी ने शुरू किया. और जब कैसेट की रील उलझ जाती थी, तो उसे पेंसिल या पेन से ठीक करने की कला तो हर किसी को आती थी. बैटरी खत्म होने का डर हमेशा बना रहता था, लेकिन चलते-फिरते संगीत सुनने का ये पहला जादू था.
3/5स्मार्ट स्पीकर और म्यूजिक ऐप्स से पहले, घर में गूंजने वाली एक ही आवाज़ थी - रेडियो की. अमीन सयानी की आवाज़ में 'बिनाका गीतमाला' सुनने का इंतज़ार हो या क्रिकेट मैच की लाइव कमेंट्री, रेडियो ही हमारा सबसे बड़ा साथी था. एंटीना को घुमा-घुमाकर साफ़ आवाज़ पकड़ने की कोशिश और अपने पसंदीदा गाने के लिए फरमाइश भेजना, ये सब रेडियो से जुड़ी वो यादें हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता.
4/5ये हमारे ज़माने का 'नेटफ्लिक्स' और 'अमेज़न प्राइम' था. शनिवार की रात को वीडियो लाइब्रेरी से किराए पर लाई गई फिल्म देखने के लिए पूरा परिवार इसी के सामने इकट्ठा होता था. बड़ी सी वीडियो कैसेट को वीसीआर में डालना, थोड़ी देर तक आने वाली घरघराहट और फिर परदे पर फिल्म का शुरू होना, एक रोमांच से कम नहीं था. फिल्म खत्म होने के बाद कैसेट को 'रिवाइंड' करके वापस देने की ज़िम्मेदारी भी तो हम पर ही थी.
5/5ये आज के पेनड्राइव और गूगल ड्राइव का पूर्वज था. सिर्फ़ 1.44 MB की स्टोरेज क्षमता वाली इस डिस्क में हम अपना 'कीमती' डेटा, स्कूल का प्रोजेक्ट या फिर कोई छोटा-मोटा गेम सहेज कर रखते थे. कंप्यूटर में इसे डालने पर आने वाली 'क्लिक' की आवाज़ और 'डिस्क एरर' का डर आज भी याद होगा. एक गेम को इनस्टॉल करने के लिए कई-कई फ्लॉपी डिस्क बदलनी पड़ती थीं. यह उस दौर की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी थी.