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भारत सरकार ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण ऐलान किया है. सरकार के आईटी सचिव एस. कृष्णन ने कहा है कि भारत अपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी टेक्नोलॉजी और मॉडल्स को 'ग्लोबल साउथ' (एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के विकासशील देशों) के साथ साझा करने के लिए पूरी तरह तैयार है.
आईटी सचिव का कहना है कि भारत की सबसे बड़ी ताकत ये की भाषाई विविधता है. हमारे देश में इतनी सारी भाषाएं और बोलियां हैं कि अगर हम ये के लिए कोई AI टूल बना सकते हैं, तो उसे दुनिया में कहीं भी लागू कर सकते हैं. भारत के इस कदम में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी गहरी दिलचस्पी दिखाई है. ये भारत को उन देशों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाता है, जिनके पास सीमित संसाधन हैं लेकिन भाषाएं अनेक हैं.
भारत ने AI के क्षेत्र में अपनी काबिलियत पहले ही साबित कर दी है.
मिशन भाषिणी और 'अनुवादिनी' ऐप: ये ऐसे सरकारी टूल्स हैं, जो अलग-अलग भारतीय भाषाओं को समझने, बोलने और उनका अनुवाद करने में मदद करते हैं.
AI खजाना: 'इंडियाएआई मिशन' के तहत एक बहुत बड़ा डेटा कलेक्शन सेंटर बनाया गया है, जिसका नाम 'AI कोष' है. इसमें 400 से ज़्यादा डेटाबेस हैं, जो रिसर्च करने वालों और नए स्टार्टअप्स को अलग-अलग भाषाओं में AI बनाने में मदद करते हैं.
पुराने ज्ञान का डिजिटलीकरण: भारत अपनी सदियों पुरानी किताबों और ज्ञान, जैसे कि आयुर्वेद के ग्रंथों और ऐतिहासिक पांडुलिपियों को भी डिजिटल बना रहा है, ताकि AI की मदद से हेल्थकेयर और रिसर्च को और बेहतर बनाया जा सके.
दूसरे देशों के विपरीत, भारत AI बनाने के लिए सिर्फ सरकार पर निर्भर नहीं है. वह इस काम में यूनिवर्सिटी, प्राइवेट कंपनियों और रिसर्च सेंटरों को भी साथ लेकर चल रहा है, ताकि सबकी भागीदारी से बेहतरीन परिणाम मिल सकें.
इस सम्मेलन में गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के अधिकारियों ने भी सरकार के इस कदम का समर्थन किया. उन्होंने वादा किया कि प्राइवेट सेक्टर भी भारत को AI का पावरहाउस बनाने में पूरा सहयोग देगा. उन्होंने सरकार से ये भी अनुरोध किया कि पुराने सरकारी डेटा को रिसर्च के लिए खोला जाए, ताकि एक ही काम को बार-बार न करना पड़े और तेजी से तरक्की हो सके.
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