भारत में AI बूम की तैयारी! हर 2 में से एक कंपनी India में बना रही नए डेटा सेंटर, अगले 5 साल में इतना बढ़ जाएगा काम

ये रिपोर्ट सिस्को नाम की एक बड़ी नेटवर्किंग कंपनी ने जारी की है. इसमें ये भी बताया गया है कि 91% भारतीय कंपनियां अपने सिस्टम में "ऑटोनॉमस AI एजेंट्स" का इस्तेमाल कर रही हैं.
भारत में AI बूम की तैयारी! हर 2 में से एक कंपनी India में बना रही नए डेटा सेंटर, अगले 5 साल में इतना बढ़ जाएगा काम

एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि भारत में कंपनियां AI के बढ़ते इस्तेमाल के लिए कमर कस रही हैं. आधी से ज्यादा भारतीय कंपनियों को लगता है कि अगले 3-5 सालों में AI से जुड़ा काम 50% से भी ज्यादा बढ़ जाएगा. इस भारी-भरकम काम को संभालने के लिए, 51% कंपनियां अगले 12 महीनों में नए डेटा सेंटर बनाने या उनकी क्षमता बढ़ाने में पैसा लगा रही हैं. डेटा सेंटर वो जगह होती हैं जहां बड़ी-बड़ी मशीनों में सारा डिजिटल डेटा और AI से जुड़े कंप्यूटिंग का काम होता है.

ये रिपोर्ट सिस्को नाम की एक बड़ी नेटवर्किंग कंपनी ने जारी की है. इसमें ये भी बताया गया है कि 91% भारतीय कंपनियां अपने सिस्टम में "ऑटोनॉमस AI एजेंट्स" का इस्तेमाल कर रही हैं. ये ऐसे AI होते हैं जो खुद से काम करते हैं. लेकिन चिंता की बात ये है कि इनमें से सिर्फ 37% ही इन एजेंट्स को पूरी तरह सुरक्षित रख पा रही हैं.

AI सिर्फ कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि..

दुनिया भर में, जो कंपनियां AI को बहुत अच्छे से लागू कर रही हैं, उन्हें "पेससेटर" कहा गया है. ये कंपनियां AI का इस्तेमाल नए तरीके के काम करने और ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए कर रही हैं. वे मजबूत नेटवर्क, अच्छी बिजली व्यवस्था, लगातार सुधार और शुरू से ही सुरक्षा पर ध्यान देती हैं. AI सिर्फ कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों के लिए भी गेम चेंजर बन रहा है. एक और स्टडी (जॉब साइट इनडीड की) बताती है कि 71% कर्मचारी अपने करियर की प्लानिंग करने और समस्याओं को सुलझाने के लिए AI का इस्तेमाल कर रहे हैं.

कर्मचारी अब काम को लेकर नए-नए तरीके अपना रहे हैं. 75% लोग "माइक्रो-रिटायरमेंट" (छोटे-छोटे ब्रेक लेकर आराम करना), "मूनलाइटिंग" (एक से ज्यादा जगह काम करना), फ्लेक्सिबल शेड्यूल (अपनी सुविधानुसार काम के घंटे चुनना) और "बेयर-मिनिमम मंडे" (सोमवार को कम से कम काम करना) जैसे व्यवहार अपना रहे हैं. हैरानी की बात ये है कि एंट्री-लेवल के 68% कर्मचारी भी सीखने और करियर बनाने के लिए नए तरीके अपना रहे हैं. लगभग 40% कर्मचारी काम और निजी जिंदगी को बैलेंस करने के लिए मूनलाइटिंग, फ्लेक्सिबल शेड्यूल और छोटे करियर ब्रेक ले रहे हैं.

AI का बढ़ता दबदबा और भारत पर इसका असर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ हॉलीवुड फिल्मों का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी और व्यापार का अभिन्न अंग बन गया है. भारत भी इस डिजिटल क्रांति में पीछे नहीं है. कंपनियां और कर्मचारी, दोनों ही AI को अपना रहे हैं, जिससे देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्क कल्चर में बड़े बदलाव आ रहे हैं.

डेटा सेंटरों में भारी निवेश की जरूरत

जब हम AI की बात करते हैं, तो ये सिर्फ सॉफ्टवेयर या एल्गोरिदम तक सीमित नहीं है. AI को चलाने के लिए बहुत बड़ी कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है. ये ीं पर डेटा सेंटरों की भूमिका आती है. ये विशाल इमारतें होती हैं जहां हजारों सर्वर, स्टोरेज डिवाइस और नेटवर्किंग उपकरण लगे होते हैं. ये डेटा सेंटर ही AI मॉडल्स को प्रशिक्षित करने, डेटा को प्रोसेस करने और AI-आधारित सेवाओं को चलाने के लिए जरूरी शक्ति प्रदान करते हैं.

भारत में 50% से अधिक कंपनियों का मानना है कि AI से जुड़े उनके काम में अगले 3 से 5 सालों में 50% से ज्यादा की बढ़ोतरी होगी. ये एक बहुत बड़ी छलांग है, जिसके लिए मौजूदा डेटा सेंटर क्षमता पर्याप्त नहीं होगी. इसी को देखते हुए, 51% भारतीय कंपनियां अगले 12 महीनों में नए डेटा सेंटर बनाने या पुराने को अपग्रेड करने में निवेश कर रही हैं. ये निवेश सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अत्याधुनिक हार्डवेयर, कूलिंग सिस्टम और बिजली की मजबूत आपूर्ति भी शामिल है. ये निवेश न केवल AI की बढ़ती मांग को पूरा करेगा, बल्कि भारत को एक मजबूत डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने में भी मदद करेगा.

सुरक्षा एक बड़ी चुनौती

AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. सिस्को की रिपोर्ट बताती है कि 91% भारतीय कंपनियां ऑटोनॉमस AI एजेंट्स का इस्तेमाल कर रही हैं. ये AI एजेंट्स खुद से काम करते हैं, जैसे कि ग्राहक सेवा में बॉट, या डेटा विश्लेषण में स्वचालित उपकरण. लेकिन इनमें से केवल 37% कंपनियां ही इन्हें पूरी तरह से सुरक्षित रख पा रही हैं. इसका मतलब है कि बहुत सारी कंपनियों के AI सिस्टम साइबर हमलों या डेटा लीक के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं.

AI सिस्टम में डेटा की सुरक्षा, प्राइवेसी और एथिकल (नैतिक) उपयोग सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है. अगर इन AI एजेंट्स को ठीक से सुरक्षित न रखा जाए, तो वे गलत हाथों में पड़कर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसलिए कंपनियों को AI सुरक्षा पर और भी ज्यादा ध्यान देना होगा, इसमें मजबूत एन्क्रिप्शन, नियमित ऑडिट और कर्मचारियों की ट्रेनिंग शामिल है.

AI और नौकरियों का भविष्य: बदलता वर्कप्लेस

AI का प्रभाव सिर्फ कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि कर्मचारियों और नौकरियों पर भी पड़ रहा है. अक्सर लोग AI को नौकरियों के लिए खतरा मानते हैं, लेकिन इनडीड की रिपोर्ट एक अलग तस्वीर दिखाती है. 71% कर्मचारी अब AI का उपयोग अपने करियर की योजना बनाने और समस्याओं को हल करने के लिए कर रहे हैं. ये दर्शाता है कि AI एक टूल के रूप में काम आ रहा है जो कर्मचारियों को अधिक कुशल और उत्पादक बना सकता है.

AI-संचालित उपकरण कर्मचारियों को दोहराव वाले कार्यों से मुक्ति दिलाकर उन्हें अधिक रचनात्मक और रणनीतिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, एक मार्केटिंग प्रोफेशनल AI का उपयोग डेटा विश्लेषण के लिए कर सकता है, जिससे वह बेहतर मार्केटिंग रणनीतियाँ बना सके. एक सॉफ्टवेयर डेवलपर AI को कोड लिखने में मदद के लिए इस्तेमाल कर सकता है, जिससे उसका काम तेज हो जाए.

नए वर्कप्लेस बिहेवियर और वर्क-लाइफ बैलेंस

AI के साथ-साथ, कर्मचारियों के काम करने के तरीके में भी बड़े बदलाव आ रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि 75% कर्मचारियों ने "माइक्रो-रिटायरमेंट," "मूनलाइटिंग," "फ्लेक्सिबल शेड्यूल" और "बेयर-मिनिमम मंडे" जैसे नए वर्कप्लेस बिहेवियर को अपनाना शुरू कर दिया है.

  • माइक्रो-रिटायरमेंट: ये छोटे-छोटे करियर ब्रेक होते हैं, जिसमें लोग कुछ हफ्तों या महीनों के लिए काम से छुट्टी लेकर आराम करते हैं या कुछ नया सीखते हैं.
  • मूनलाइटिंग: इसमें लोग अपनी मुख्य नौकरी के साथ-साथ किसी और कंपनी या प्रोजेक्ट पर भी काम करते हैं, अक्सर अपनी स्किल और आय बढ़ाने के लिए.
  • फ्लेक्सिबल शेड्यूल: ये कर्मचारियों को अपने काम के घंटे और जगह चुनने की आजादी देता है, जैसे घर से काम करना या अपने हिसाब से काम शुरू और खत्म करना.
  • बेयर-मिनिमम मंडे: ये एक ट्रेंड है जहां कर्मचारी सोमवार को कम से कम काम करते हैं, ताकि हफ्ते की शुरुआत धीमी और कम तनावपूर्ण हो.

ये सभी बदलाव दर्शाते हैं कि कर्मचारी अब सिर्फ वेतन के लिए काम नहीं करना चाहते, बल्कि वे अपनी मानसिक सेहत, व्यक्तिगत विकास और वर्क-लाइफ बैलेंस को भी प्राथमिकता दे रहे हैं. AI और अन्य तकनीकों ने इन लचीले काम के तरीकों को संभव बनाया है.

एंट्री-लेवल और जूनियर कर्मचारियों के लिए भी ये एक बड़ा बदलाव है. 68% ऐसे कर्मचारी सीखने और करियर प्लानिंग के लिए नए तरीके अपना रहे हैं. ये उनके लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अपने करियर की शुरुआत में ही नए कौशल सीख सकते हैं और विविध अनुभव प्राप्त कर सकते हैं. लगभग 40% कर्मचारी मूनलाइटिंग, फ्लेक्सिबल शेड्यूल और शॉर्ट करियर ब्रेक्स के साथ काम और जिंदगी दोनों को बैलेंस कर रहे हैं.

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

AI वर्कलोड क्या होता है?

AI वर्कलोड का मतलब है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े कंप्यूटेशनल टास्क और डेटा प्रोसेसिंग की मात्रा. इसमें AI मॉडल को ट्रेनिंग देना, डेटा एनालिसिस करना, AI-आधारित एप्लीकेशन चलाना आदि शामिल हैं. जब AI का इस्तेमाल बढ़ता है, तो AI वर्कलोड भी बढ़ जाता है.

डेटा सेंटर क्या हैं और वे क्यों महत्वपूर्ण हैं?

डेटा सेंटर वो सुरक्षित जगहें होती हैं जहाँ बड़ी संख्या में कंप्यूटर सर्वर, स्टोरेज डिवाइस और नेटवर्क उपकरण रखे जाते हैं. ये इंटरनेट, क्लाउड सेवाओं और AI जैसी तकनीकों को चलाने के लिए जरूरी कंप्यूटिंग पावर और डेटा स्टोरेज प्रदान करते हैं. AI के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्हें भारी मात्रा में डेटा को प्रोसेस करने और जटिल गणनाएं करने की जरूरत होती है.

ऑटोनॉमस AI एजेंट्स क्या हैं?

ऑटोनॉमस AI एजेंट्स ऐसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम होते हैं जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के अपने आप कार्य कर सकते हैं. ये अपने परिवेश से जानकारी एकत्र करते हैं, निर्णय लेते हैं और उन निर्णयों के आधार पर क्रियाएं करते हैं. उदाहरण के लिए, ग्राहक सेवा चैटबॉट या स्वचालित डेटा विश्लेषण उपकरण.

"पेससेटर" कंपनियां कौन सी हैं?

सिस्को की रिपोर्ट में "पेससेटर" उन कंपनियों को कहा गया है जो AI को बहुत प्रभावी ढंग से लागू कर रही हैं. ये कंपनियां AI का उपयोग करके नए अवसर तलाशती हैं, अधिक रिटर्न (मुनाफा) कमाती हैं, और मजबूत नेटवर्क, बिजली के बुनियादी ढांचे, लगातार सुधार और मजबूत सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करती हैं.

माइक्रो-रिटायरमेंट क्या है और ये क्यों लोकप्रिय हो रहा है?

माइक्रो-रिटायरमेंट का मतलब है काम से छोटे, नियोजित ब्रेक लेना - जैसे कुछ हफ्ते या महीने. ये एक नया ट्रेंड है जो कर्मचारियों को आराम करने, शौक पूरा करने, नई स्किल्स सीखने या यात्रा करने की आजादी देता है, बिना पूरे करियर से रिटायर हुए. ये वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखने और बर्नआउट से बचने में मदद करता है.

मूनलाइटिंग का मतलब क्या है?

मूनलाइटिंग का अर्थ है अपनी मुख्य या पहली नौकरी के अलावा दूसरी नौकरी या काम करना. ये अक्सर शाम या रात में किया जाता है (जैसे चंद्रमा की रोशनी में काम करना). कर्मचारी अतिरिक्त आय कमाने, नए कौशल सीखने या विभिन्न क्षेत्रों में अनुभव प्राप्त करने के लिए मूनलाइटिंग करते हैं.

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