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Iran-Israel War की वजह से पिछले कई दिनों से शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला जारी है. इस गिरावट को देखकर जहां अधिकतर लोग टेंशन में आ गए हैं, वहीं स्मार्ट ट्रेडर इससे भी मुनाफा कमा रहे हैं. आमतौर पर आप सुनते आए हैं कि "सस्ते में खरीदो और महंगे में बेचो", लेकिन शेयर बाजार में एक ऐसी जादुई (और थोड़ी खतरनाक) खिड़की भी है जहां आप "महंगे में पहले बेच सकते हैं और सस्ते में बाद में खरीद सकते हैं."
शेयर बाजार के इसी तरीके को कहते हैं शॉर्ट सेलिंग (Short Selling). आपको हिंडनबर्ग वाला मामला तो याद ही होगा, जिसमें उसने अडानी ग्रुप को लेकर अपनी रिपोर्ट निकाली थी. उसमें हिंडनबर्ग ने शॉर्ट सेलिंग का ही इस्तेमाल किया. आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा खेल क्या है और कैसे काम करता है.
इसे आसान तरीके से समझते हैं. साधारण ट्रेडिंग में आप क्या करते हो? मान लो आपने ₹100 का एक शेयर खरीदा और ₹120 तक कीमत जाने पर उसे बेच दिया. अब ये ₹20 आपका मुनाफा हो गया.
शॉर्ट सेलिंग में कहानी उल्टी चलती है. यहां आप 'मंदी' के खिलाड़ी होते हो. आपको लगता है कि किसी कंपनी की हालत खराब है या उसके शेयर की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ गई है और अब वो गिरेगा. तो आप क्या करते हो? आप उस शेयर को पहले ही बेच देते हो.
नॉर्मल ट्रेडिंग: Buy First - Sell Later (जब दाम बढ़े)
शॉर्ट सेलिंग: Sell First - Buy Later (जब दाम गिरे)
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अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा- "जो चीज मेरे पास है ही नहीं, उसे मैं बेच कैसे सकता हूं?" आपकी बात तो आपकी जायज है. आप अपनी पड़ोसी की कार तो नहीं बेच सकते न? लेकिन शेयर बाजार में आपका ब्रोकर आपको यह सुविधा देता है. जब आप पहले सेल का बटन दबाते हैं, तो आपका ब्रोकर अपने 'पूल' से या किसी और से उधार लेकर वो शेयर आपके नाम पर मार्केट में बेच देता है. इसके बदले में वो आपके अकाउंट से उस शेयर की वैल्यू के बराबर पैसे 'मार्जिन' के तौर पर ब्लॉक कर लेता है, ताकि आप पीछे ना हट सकें.
मान लीजिए एक कंपनी है, जिसका नाम है 'XYZ लिमिटेड'. आज उसका एक शेयर ₹1000 का है. आपको खबर मिली कि कंपनी के मैनेजमेंट में कुछ झगड़ा हो गया है और कल शेयर गिर सकता है.
सुबह 10:00 बजे: आपने XYZ के 100 शेयर ₹1000 के भाव पर बेच दिए यानी 'शॉर्ट सेल' कर दिए. ऐसे में आपके खाते से 1 लाख रुपये मार्जिन की तरह ब्लॉक हो जाएंगे.
दोपहर 02:00 बजे: शेयर का दाम गिरकर ₹900 हो गया. अब आपने अपनी पोजीशन 'कवर' की यानी 100 शेयर वापस खरीद लिए.
अब समझें मुनाफे का हिसाब:
बेचा: ₹1,00,000 में
खरीदा: ₹90,000 में
मुनाफा: ₹10,000 (माइनस ब्रोकरेज और टैक्स).
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मान लीजिए कोई अच्छी खबर आ गई और शेयर गिरकर ₹900 होने के बजाय बढ़कर ₹1100 हो गया. अब आप वो 100 शेयर ₹1100 के भाव पर खरीदते हैं.
तो नुकसान का हिसाब:
बेचा: ₹1,00,000 में
खरीदा: ₹1,10,000 में
घाटा: ₹10,000 (आपकी जेब से जाएगा).
शॉर्ट सेलिंग सुनकर अगर अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रहे हैं तो एक बात को गांठ बांध लें. नॉर्मल खरीददारी में आपका नुकसान 'लिमिटेड' होता है. अगर आपने ₹1000 का शेयर खरीदा, तो वो गिरकर ज्यादा से ज्यादा ₹0 हो सकता है. आपका ₹1000 डूबेगा, उससे ज्यादा नहीं.
लेकिन शॉर्ट सेलिंग में कहानी बदल जाती है. अगर आपने ₹1000 पर शेयर बेचा, तो वो बढ़कर ₹2000, ₹5000 या ₹10,000 भी हो सकता है. शेयर के ऊपर जाने की कोई सीमा (Limit) नहीं है. इसलिए यहां नुकसान असीमित (Unlimited) हो सकता है.
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भारत में सेबी (SEBI) बहुत सख्त है, ताकि बाजार में कोई बड़ी गड़बड़ी न हो. यहां दो अलग-अलग मार्केट के लिए अलग नियम हैं:
अगर आप किसी कंपनी के शेयर सीधे कैश में शॉर्ट करना चाहते हैं, तो ऐसा सिर्फ इंट्राडे (Intraday) में ही कर सकते हैं, इसमें डिलीवरी नहीं मिलती. यानी उसी दिन आपको सौदा काटना होगा यानी शेयर को वापस खरीदना होगा. आप आज बेचकर उसे कल के लिए नहीं छोड़ सकते.
आपको शाम 3:15 बजे से पहले उसे वापस खरीदना ही होगा. अगर आप नहीं खरीदेंगे, तो आपका ब्रोकर खुद ही उसे मार्केट रेट पर खरीद लेगा, इसे Square off करना कहते हैं. बता दें कि अलग-अलग ब्रोकर के लिए इसकी समय सीमा अलग-अलग हो सकती है. कोई आपको 3:15 तक का समय देगा तो कोई 3:20 तक का समय दे सकता है.
यहां असली खेल होता है. अगर आप किसी शेयर को हफ़्तों या महीनों तक शॉर्ट रखना चाहते हैं, तो आप उसके 'फ्यूचर्स' (Futures) या 'ऑप्शन' (Option) का इस्तेमाल करना होता है. हालांकि, यह गेम बहुत ही खतरनाक होता है, क्योंकि इसमें कई बार नुकसान बहुत ज्यादा हो जाता है.
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फ्यूचर ट्रेडिंग में आप किसी शेयर या कमोडिटी को भविष्य की तय कीमत पर खरीदने या बेचने की डील आज ही कर लेते हैं. यानी आज कीमत तय हो जाती है, लेकिन डील भविष्य की तारीख पर पूरी होती है. इसमें पूरा पैसा देने की जरूरत नहीं होती, बल्कि मार्जिन देकर ट्रेडिंग की जाती है और आपको 2–3 गुना तक लीवरेज मिल सकता है. हालांकि, इसमें पूरा लॉट खरीदना पड़ता है, जिसकी कीमत कई लाख रुपये तक हो सकती है.
ऑप्शन ट्रेडिंग फ्यूचर ट्रेडिंग जैसी ही होती है, लेकिन इसमें आपको डील करने या छोड़ने का विकल्प (Option) मिलता है. इसमें आप एक प्रीमियम देकर कॉन्ट्रैक्ट खरीदते हैं. अगर भविष्य में कीमत आपके पक्ष में जाती है तो आप मुनाफा कमा सकते हैं, लेकिन अगर कीमत उल्टी दिशा में चली जाए तो आप डील छोड़ सकते हैं. इसमें आपको लाखों रुपये के हिसाब से पैसे खर्च नहीं करने होते, लेकिन पैसे डूबने का रिस्क बहुत ज्यादा रहता है.
शॉर्ट स्क्वीज शेयर बाजार में तब होता है जब किसी शेयर की कीमत अचानक तेजी से बढ़ने लगती है और जिन निवेशकों ने उस शेयर पर शॉर्ट सेलिंग की होती है, उन्हें नुकसान से बचने के लिए जल्दबाजी में शेयर वापस खरीदने (Short Covering) पड़ते हैं.
जब बहुत सारे शॉर्ट सेलर एक साथ शेयर खरीदने लगते हैं, तो बाजार में डिमांड अचानक बढ़ जाती है और इससे शेयर की कीमत और तेजी से ऊपर चली जाती है. इस तरह एक चेन रिएक्शन (feedback loop) बन जाता है, जिससे कीमत बहुत तेजी से उछल सकती है. अक्सर ऐसा तब होता है जब किसी कंपनी से जुड़ी अचानक अच्छी खबर आ जाए या उस शेयर में पहले से बहुत ज्यादा शॉर्ट पोजीशन (high short interest) हो.
हर्षद मेहता का दौर (1992): जब हर्षद मेहता एसीसी (ACC) के शेयर को ₹200 से ₹9000 ले गए थे, तब कुछ अनुभवी ट्रेडर्स जानते थे कि यह एक बबल है. जब यह बबल फटा, तो शॉर्ट सेलर्स ने कुछ ही दिनों में सैकड़ों करोड़ रुपये कमाए.
राकेश झुनझुनवाला: दिवंगत राकेश झुनझुनवाला ने भी अपने करियर के शुरुआती दिनों में 'बियर' (मंदी के खिलाड़ी) के रूप में काफी पैसे बनाए थे. वो हमेशा कहते थे कि मार्केट में दोनों तरफ मौके होते हैं. कई साल पहले उन्होंने खुद यह बात एक इंटरव्यू में कही थी कि उन्होंने जिंदगी का सबसे ज्यादा पैसा शेयर्स को शॉर्ट सेल कर के कमाया है. उन्होंने कहा था- 'मैंने जिंदगी का सबसे ज्यादा पैसा कमाया शेयर बेच के, हर्षद मेहता वाले दौर में शॉर्ट सेलिंग से ही करीब 30-35 करोड़ रुपये कमाए.'
शॉर्ट सेलिंग 'लहरों की विपरीत दिशा' में नाव चलाने जैसा है. दुनिया की प्रगति के साथ शेयर बाजार आमतौर पर ऊपर ही जाता है. शॉर्ट सेलिंग केवल तब करनी चाहिए जब:
शॉर्ट सेलिंग शेयर बाजार का एक जरूरी हिस्सा है. यह बाजार को संतुलित रखता है और उन कंपनियों को सजा देता है जो केवल धोखाधड़ी या हवा-हवाई दावों पर टिके हैं. सेबी इस पर कड़ी नजर रखता है और समय-समय पर इससे जुड़े नियम भी बनाता है. याद रखिये, यहां सावधानी हटी और दुर्घटना घटी!
1- क्या मैं बिना डीमैट अकाउंट के शॉर्ट सेलिंग कर सकता हूं?
नहीं, इसके लिए एक एक्टिव ट्रेडिंग और डीमैट अकाउंट होना अनिवार्य है.
2- क्या संडे को भी शॉर्ट सेलिंग हो सकती है?
नहीं, यह केवल शेयर बाजार के वर्किंग डेज (सोमवार से शुक्रवार) पर ही संभव है, जब मार्केट खुला हो.
3- शॉर्ट स्क्वीज (Short Squeeze) क्या होता है?
जब शेयर गिरने के बजाय अचानक तेजी से बढ़ने लगता है और शॉर्ट सेलर्स अपनी जान बचाने के लिए एक साथ शेयर खरीदने भागते हैं, जिससे दाम और बढ़ जाते हैं.
4- क्या शॉर्ट सेलिंग गैर-कानूनी है?
बिल्कुल नहीं! भारत में सेबी के नियमों के दायरे में रहकर शॉर्ट सेलिंग करना पूरी तरह कानूनी है.
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