स्टील और ऑटो कंपनियों पर अभी भी खतरा बरकरार! ट्रंप की नई टैरिफ नीति ने उड़ाई ग्लोबल मार्केट की नींद

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के टैरिफ फैसलों पर SBI रिसर्च की बड़ी रिपोर्ट. 175 अरब डॉलर के रिफंड से मच सकती है खलबली. जानिए भारत और चीन पर क्या होगा इसका असर.
स्टील और ऑटो कंपनियों पर अभी भी खतरा बरकरार! ट्रंप की नई टैरिफ नीति ने उड़ाई ग्लोबल मार्केट की नींद

अमेरिका के नए फैसलों ने व्यापार की दुनिया में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है.

दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में इन दिनों ट्रेड वॉर को लेकर जो ड्रामा चल रहा है, उसका असर अब हर भारतीय की जेब और ग्लोबल मार्केट पर पड़ने वाला है. SBI रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट ने इस पूरे मामले की परतें खोल दी हैं. रिपोर्ट कहती है कि अमेरिकी प्रशासन ने अलग-अलग देशों से लगभग 160 से 175 अरब डॉलर का टैरिफ वसूला है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन की कंपनियों ने चुकाया है. अब जबकि वहां की कोर्ट ने पुराने टैरिफ फैसलों को पलट दिया है, तो यह पैसा वापस करना यानी 'रिफंड' करना एक बड़ी मुसीबत साबित हो सकता है.

लेकिन बात सिर्फ पैसों की नहीं है. यह पूरा मामला एक मनोवैज्ञानिक दबाव की तरह काम करेगा. भले ही रिफंड की प्रक्रिया उलझी हुई हो, लेकिन यह भविष्य में टैरिफ लगाने की अमेरिका की मनमानी पर एक लगाम की तरह काम करेगी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी हार नहीं मानी है और सुप्रीम कोर्ट के झटके के अगले ही दिन 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का इस्तेमाल करते हुए ग्लोबल टैरिफ को 15 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है.

150 दिनों का खेल और ट्रंप की नई चाल

Add Zee Business as a Preferred Source

अमेरिका के नए फैसलों ने व्यापार की दुनिया में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है. ट्रेड एक्ट के तहत राष्ट्रपति बैलेंस ऑफ पेमेंट की समस्याओं को ठीक करने के लिए 15 प्रतिशत तक का अस्थायी सरचार्ज लगा सकते हैं. यह पावर सिर्फ 150 दिनों के लिए होती है, जब तक कि अमेरिकी कांग्रेस इसे कानून बनाकर आगे न बढ़ा दे. ट्रंप प्रशासन इस समय का इस्तेमाल अपनी जांच पूरी करने और धारा 301 और 232 के तहत नए टैरिफ थोपने के लिए कर सकता है.

हालांकि, इसमें कुछ छूट भी दी गई है. कनाडा और मेक्सिको के सामान, जो USMCA के नियमों को पूरा करते हैं, उन्हें इस नए टैरिफ से बाहर रखा गया है. इसके अलावा नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े कुछ खास टैरिफ भी पहले की तरह जारी रहेंगे.

Zee Business Hindi Live TV यहां देखें-

भारत के लिए क्या है खतरे की घंटी?

भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. SBI की रिपोर्ट साफ तौर पर चेतावनी देती है कि स्टील, एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल और कॉपर जैसे सेक्टर्स पर धारा 232 के तहत लगने वाले टैरिफ अभी भी बरकरार हैं. चूंकि कोर्ट ने इस धारा को रद्द नहीं किया है, इसलिए भारतीय एक्सपोर्टर्स को अभी भी कड़े मुकाबले और भारी टैक्स का सामना करना पड़ सकता है.

असल चुनौती अब यह देखने की होगी कि अलग-अलग देशों के बीच हुए व्यापारिक समझौतों की व्याख्या कंपनियां और कानूनी एजेंसियां किस तरह करती हैं. जिन कंपनियों ने केस जीता है और जो रिफंड का इंतजार कर रही हैं, उनके लिए यह रास्ता इतना आसान नहीं होने वाला.

अमेरिकी कांग्रेस और बदलती डिप्लोमेसी

रिपोर्ट में एक बहुत गहरी बात कही गई है कि असली ताकत अब अमेरिकी कांग्रेस के पास है, जो बहुत ही नाजुक संतुलन पर टिकी है. आने वाले समय में देशों को अपनी रणनीति बहुत सोच-समझकर बनानी होगी. इंटर-सोवियत ट्रीटी और कानूनी संस्थाओं के बीच टैरिफ ढांचे को लेकर जो तालमेल होना चाहिए, वह फिलहाल एक बड़ी उलझन जैसा नजर आ रहा है.

द्विपक्षीय संबंधों की बदलती रेत (Shifting Sands) इस पूरे परिदृश्य को और भी पेचीदा बना सकती है. भारत जैसे देशों को इस बीच बातचीत की अपनी टेबल को बहुत मजबूत रखना होगा ताकि अमेरिकी प्रशासन के साथ बीच का रास्ता निकाला जा सके.

क्या रिफंड से सुधरेगा माहौल?

SBI रिसर्च का मानना है कि भले ही 175 अरब डॉलर का रिफंड एक 'मेस' पैदा करे, लेकिन यह एक सबक की तरह भी काम करेगा. यह उन कंपनियों के लिए बड़ी जीत है जिन्होंने सिस्टम के खिलाफ केस लड़ा और एक अनुकूल फैसला हासिल किया. यह दिखाता है कि व्यापार के नियम सिर्फ पॉलिसी से नहीं, बल्कि कानूनी स्पष्टता से भी चलते हैं.

अमेरिकी टैरिफ की यह नई जंग अब एक कानूनी और कूटनीतिक मोड़ ले चुकी है. ट्रंप का 15 प्रतिशत का नया दांव अगले 150 दिनों तक दुनिया को बेचैन रखेगा. भारत के लिए अच्छी बात यह है कि बातचीत के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं, लेकिन स्टील और ऑटो जैसे सेक्टर्स के लिए राह अभी भी पथरीली है. 175 अरब डॉलर का रिफंड कब और कैसे होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इसने ग्लोबल ट्रेड की नींव को जरूर हिला दिया है.

  1. 1
  2. 2
  3. 3
  4. 4
  5. 5
  6. 6