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मार्केट पर सुनील सिंघानिया का आउटलुक. (फोटो: Zee Business)
Market Outlook: शेयर बाजार में पिछले कुछ महीनों से निवेशकों के सामने एक साथ कई चुनौतियां खड़ी हैं. पश्चिम एशिया में तनाव, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता और महंगे होते मिडकैप शेयरों ने निवेशकों को असमंजस में डाल रखा है.
Abacus Asset Manager के फाउंडर और मार्केट के दिग्गज एक्सपर्ट सुनील सिंघानिया ने अनिल सिंघवी के साथ बातचीत में कहा कि भारत की लंबी अवधि की कहानी अब भी मजबूत है, लेकिन अगले बड़े उछाल के लिए बाजार को नए ट्रिगर्स की जरूरत होगी. उन्होंने कहा कि इस बाजार में वही कमाई कर पाएगा, जो सेलेक्टिव Buying अप्रोच और धैर्य के साथ टिकेगा.
सबको लग रहा था कि युद्ध मार्च-अप्रैल में खत्म हो जाएगा, लेकिन अब ऐसा मोड़ आ गया है कि अगर सच में खत्म भी हो जाए तो किसी को विश्वास नहीं होगा. हालांकि, वर्ल्ड मार्केट्स ने अब इसे इग्नोर करना शुरू कर दिया है और क्रूड ऑयल पर भी अब इसका बहुत ज्यादा असर नहीं दिख रहा है.
भारतीय बाज़ार थोड़ा कमज़ोर ज़रूर रहा है, क्योंकि ऑयल में उछाल से ट्रेड डेफिसिट और करेंसी पर थोड़ा कंसर्न आया. बाज़ार एक लेवल पर आ गया है, यहां से इसके बहुत नीचे जाने की आशंका नहीं है, लेकिन ऊपर जाने के लिए अब मल्टीपल ट्रिगर्स की ज़रूरत है.
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12% पर इंडिया का वेटेज हमेशा नहीं रह सकता. भारत दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ने वाली इकॉनमी है. 1 जनवरी 2000 के बाद पैदा होने वाले दुनिया के हर 5 में से 1 व्यक्ति भारतीय है, इसलिए ग्रोथ यहीं आने वाली है.
कोरिया या ताइवान जैसे देश केवल 2-3 बड़ी कंपनियों या एक ही सेक्टर (चिप मैन्युफैक्चरिंग/हाइपरस्केलर्स) पर निर्भर हैं. जैसे ही उनके सुपर-नॉर्मल प्रॉफिट पीक होंगे, बाज़ार का रुख बदलेगा. भारत एक डाइवर्सिफाइड मार्केट है जो स्ट्रक्चरली 6-7% ग्रो करेगा. यह सिर्फ समय की बात है, एफआईआई लौटेंगे और बाजार का पॉजिटिव साइकिल फिर शुरू होगा.
बाज़ार में ज़्यादातर लोग आईटी बेचकर पूरी तरह 'अंडरवेट' हो चुके थे. हमारा खुद का भी आईटी सर्विसेज में कोई बड़ा वेटेज नहीं है. जब किसी सेक्टर में बेचने वाला कोई नहीं बचता, तो थोड़ी सी भी पॉजिटिव न्यूज़ आने पर उसमें उछाल आता है. भारतीय आईटी कंपनियां मुख्यतः टाइम और एफर्ट (Time and Effort) के बेसिस पर बिलिंग करती हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि यहां कोई बहुत बड़ा अपसाइड विज़िबल है. ना तो कोई बड़ी हायरिंग हो रही है और ना ही कंपनियों का गाइडेंस सुधरा है.
यह सिर्फ एक टेक्निकल बाउंस बैक है, क्योंकि शेयर काफी गिर चुके थे और ₹95 के आसपास के डॉलर रेट से इन्हें अर्निंग में थोड़ा करेंसी सपोर्ट मिल गया है. इसलिए हम आईटी सर्विसेज को लेकर बहुत ज्यादा पॉजिटिव नहीं हैं.
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आरबीआई की पॉलिसी पक्का हॉकिश यानी सतर्क रहने वाली होगी. पेट्रोल, डीजल और सीएनजी के दाम बढ़ने से इन्फ्लेशन (महंगाई) थोड़ा ऊपर आएगा. इस पॉलिसी में आरबीआई ब्याज दरें शायद ना बढ़ाए, लेकिन उनका टोन काफी सतर्क रहेगा. भारत को अपनी करेंसी भी मेंटेन करनी है, इसलिए फिलहाल ब्याज दरों का गिरना तो असंभव है. अगर कच्चा तेल जल्दी नीचे नहीं आया, तो आगे चलकर ब्याज दरें बढ़ानी भी पड़ सकती हैं. हालांकि, हमारा मानना है कि तेल जल्द ही $70-$80 के दायरे में आ जाएगा.
मिडकैप इंडेक्स की 150 कंपनियों की प्रॉफिट ग्रोथ (Earnings Growth) निफ्टी और स्मॉलकैप के मुकाबले बहुत शानदार रही है. मार्च तिमाही में जहां निफ्टी की प्रॉफिट ग्रोथ सिर्फ 5-6% थी, वहीं मिडकैप इंडेक्स की ग्रोथ 25-30% रही. बाज़ार हमेशा अर्निंग्स को क्रेडिट देता है.
दूसरा कारण यह है कि म्यूचुअल फंड्स की मिडकैप कैटेगरी अब 5-6 लाख करोड़ रुपये की हो चुकी है और नियमों के मुताबिक उन्हें इसी बास्केट के 150 स्टॉक्स में ही पैसा लगाना है. डिमांड-सप्लाई का यह खेल भी मिडकैप स्टॉक्स को ऊपर ले जा रहा है. हालांकि, यहां बहुत से स्टॉक्स काफी महंगे हो चुके हैं, इसलिए आंख मूंदकर कुछ भी खरीदने के बजाय स्टॉक-स्पेसिफिक और उसके वैल्यूएशन को देखकर ही निवेश करें.
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सुनील सिंघानिया की राय में भारत की लॉन्ग टर्म स्टोरी पर कोई सवाल नहीं है. FII वापस आ सकते हैं, अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और कॉर्पोरेट कमाई भी धीरे-धीरे सुधर रही है. लेकिन निवेशकों को इस समय अंधाधुंध खरीदारी से बचना चाहिए. खासकर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में कई जगह वैल्यूएशन काफी महंगे हो चुके हैं.
उनका सुझाव है कि सेक्टर या थीम के पीछे भागने के बजाय कंपनी की कमाई, बिजनेस क्वालिटी और वैल्यूएशन को ध्यान में रखकर निवेश करना चाहिए. आने वाले समय में वही निवेशक बेहतर रिटर्न कमा पाएंगे जो धैर्य और सेलेक्टिव नजरिए के साथ बाजार में बने रहेंगे.