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सेबी (SEBI) ने सेक्युरिटाइजेशन (ऋण को निवेश में बदलना) के नियमों को आरबीआई (RBI) के मानकों के अनुरूप बनाने के लिए नए प्रस्ताव पेश किए हैं.
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने देश के वित्तीय ढांचे को मजबूत करने के लिए सेक्युरिटाइजेशन फ्रेमवर्क में बड़े संशोधनों का प्रस्ताव दिया है. सेक्युरिटाइजेशन वह प्रक्रिया है जिसमें बैंक या वित्तीय संस्थान अपने द्वारा दिए गए लोन (जैसे होम लोन या कार लोन) को एक साथ जोड़कर 'इन्वेस्टमेंट सर्टिफिकेट' के रूप में निवेशकों को बेचते हैं. इससे बैंकों के पास नया लोन देने के लिए तुरंत नकदी उपलब्ध हो जाती है और निवेशकों को एक नया फिक्स्ड-इनकम निवेश का विकल्प मिलता है.
सेबी का यह नया कदम न केवल नियमों की पेचीदगियों को कम करेगा, बल्कि इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुरूप बनाकर पूरे सिस्टम में एकरूपता लाएगा. इन बदलावों से ऋण बाजार में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ेगी और बड़े निवेशकों (Institutional Investors) के लिए निवेश करना और भी आसान हो जाएगा.
सेबी द्वारा प्रस्तावित नए नियमों में कई क्रांतिकारी बदलाव शामिल हैं, जो बाजार के संचालन के तरीके को बदल देंगे:
बड़े लोन की पैकेजिंग और लिमिट से राहत
अब तक कई छोटे लोन को मिलाकर पूल बनाना जरूरी होता था, लेकिन अब एक ही बड़े लोन का पैकेज बनाकर भी उसे निवेशकों को बेचा जा सकेगा. इसके अतिरिक्त, आरबीआई द्वारा रेगुलेटेड बैंकों और NBFCs को पहले के 25% लोन लिमिट नियम से छूट देने का प्रस्ताव है, जिससे बड़े स्तर पर डील्स संभव हो सकेंगी.
रिपोर्टिंग सिस्टम में बदलाव: सर्विसर की भूमिका
अब तक निवेशकों को रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी बैंकों की होती थी, लेकिन अब ईएमआई (EMI) कलेक्ट करने वाला (Servicer) सीधे निवेशकों को रिपोर्ट देगा. पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 'सर्विसर' को ही हर तिमाही (Quarterly) एक ऑडिटर सर्टिफिकेट भी जमा करना होगा, जिससे यह प्रमाणित हो सके कि दी गई जानकारी पूरी तरह सही है.
ट्रस्ट और गवर्नेंस में सुधार
लोन देने वाली कंपनी की ताकत को कम करने के लिए एसपीवी (SPV/Trust) में अब उनके केवल 1 सदस्य को रहने की अनुमति होगी, जिसके पास कोई वीटो पावर (Veto Power) नहीं होगी. इसके अलावा, यदि कोई ट्रस्टी (Trustee) हट जाता है, तो पूरा सिस्टम बंद नहीं होगा, उसकी जगह तुरंत नया ट्रस्टी लाया जा सकेगा, जिससे निवेशकों का पैसा नहीं फंसेगा.
इंटर-ग्रुप डील्स और फीडबैक
नए नियमों के तहत अब एक ही ग्रुप की अलग-अलग कंपनियों के बीच भी लोन डील्स करने की इजाजत मिल सकती है, जिससे कॉर्पोरेट घरानों को अपने फंड्स को मैनेज करने में अधिक लचीलापन मिलेगा. सेबी ने इन सभी महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर आम जनता और विशेषज्ञों से 25 मई 2026 तक ऑनलाइन फॉर्म के जरिए सुझाव मांगे हैं.
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Conclusion
सेबी का यह प्रयास भारत के ऋण बाजार को वैश्विक मानकों के करीब ले जाने की एक गंभीर कोशिश है. नियमों को सरल और सख्त बनाकर सेबी एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना चाहता है जहाँ जोखिम कम हो और पारदर्शिता अधिक. यदि ये प्रस्ताव लागू होते हैं, तो आने वाले समय में न केवल बैंकों की वित्तीय स्थिति सुधरेगी, बल्कि आम निवेशकों को भी सुरक्षित और स्थिर रिटर्न वाले नए निवेश विकल्प मिल सकेंगे.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 सेक्युरिटाइजेशन (Securitisation) क्या होता है?
यह एक वित्तीय प्रक्रिया है जिसमें बैंक अपने लोन को 'सिक्योरिटीज' (निवेश पत्रों) में बदलकर निवेशकों को बेचते हैं, ताकि वह तुरंत नकदी जुटा सकें.
Q2 सर्विसर (Servicer) की नई जिम्मेदारी क्या है?
सर्विसर अब ईएमआई कलेक्ट करने के साथ-साथ निवेशकों को रिपोर्ट देने और ऑडिट प्रमाणपत्र जमा करने के लिए भी जिम्मेदार होगा.
Q3 सेबी (SEBI) और आरबीआई (RBI) के नियमों को मैच करना क्यों जरूरी है?
ताकि नियमों में कोई टकराव न हो और बैंकों व निवेशकों को अलग-अलग संस्थानों के लिए अलग-अलग कागजी कार्रवाई न करनी पड़े.
Q4 सिंगल लोन सेक्युरिटाइजेशन का क्या फायदा है?
इससे बड़े कॉर्पोरेट लोन को भी आसानी से निवेश में बदला जा सकेगा, जिससे बड़े स्तर पर पूंजी जुटाना संभव होगा.
Q5 एसपीवी (SPV) क्या है?
स्पेशल पर्पस व्हीकल एक कानूनी इकाई होती है जो विशेष रूप से किसी खास वित्तीय लेनदेन (जैसे लोन पैकेजिंग) को संभालने के लिए बनाई जाती है.