SEBI का नया सर्कुलर, म्यूचुअल फंड को इंट्राडे बॉरोइंग की अनुमति, अगले महीने से लागू होंगे नियम 

SEBI के मुताबिक, कई बार म्यूचुअल फंड स्कीम्स को निवेशकों को रिडेम्प्शन का भुगतान करना होता है, जबकि स्कीम को मिलने वाली रकम उसी दिन देर शाम तक आती है.
SEBI का नया सर्कुलर, म्यूचुअल फंड को इंट्राडे बॉरोइंग की अनुमति, अगले महीने से लागू होंगे नियम 

मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) ने म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के लिए एक अहम कदम उठाया है. रेगुलेटर ने म्यूचुअल फंड्स को इंट्राडे बॉरोइंग (Intraday Borrowing) की अनुमति देने से जुड़ा नया सर्कुलर जारी किया है. यह नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होगा. इस फैसले का मकसद निवेशकों के रिडेम्प्शन पेमेंट को सुचारू बनाना और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में अस्थायी कैश मिसमैच की समस्या को दूर करना है.

SEBI के मुताबिक, कई बार म्यूचुअल फंड स्कीम्स को निवेशकों को रिडेम्प्शन का भुगतान करना होता है, जबकि स्कीम को मिलने वाली रकम उसी दिन देर शाम तक आती है. ऐसे में फंड हाउस अस्थायी तौर पर इंट्राडे बॉरोइंग के जरिए इस गैप को भर सकते हैं. नए नियमों के तहत इस पूरी प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया गया है, ताकि म्यूचुअल फंड ऑपरेशंस अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से चल सकें.

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क्या है SEBI का नया नियम?

SEBI ने 13 मार्च को जारी सर्कुलर में कहा कि म्यूचुअल फंड्स को अस्थायी कैश फ्लो मिसमैच को संभालने के लिए इंट्राडे बॉरोइंग की अनुमति दी जाएगी. यह बॉरोइंग केवल उसी दिन के भीतर ली और चुकाई जाएगी.

रेगुलेटर का कहना है कि यह व्यवस्था खासतौर पर तब काम आती है जब निवेशकों को रिडेम्प्शन पेमेंट सुबह दे दिया जाता है, जबकि स्कीम को मिलने वाली रकम शाम को मिलती है. ऐसे मामलों में फंड हाउस थोड़े समय के लिए फंड उधार लेकर निवेशकों को भुगतान कर सकते हैं.

किन कामों के लिए ही होगी इंट्राडे बॉरोइंग

नए नियमों के मुताबिक म्यूचुअल फंड्स इंट्राडे बॉरोइंग का इस्तेमाल सीमित उद्देश्यों के लिए ही कर सकेंगे. इसमें मुख्य रूप से निवेशकों के रिडेम्प्शन भुगतान, यूनिट रीपरचेज और IDCW (Income Distribution cum Capital Withdrawal) पेमेंट शामिल हैं.

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SEBI ने साफ किया है कि यह सुविधा केवल अस्थायी नकदी जरूरत को पूरा करने के लिए है और इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा.

तय सीमा के भीतर ही ले सकेंगे फंड

नए फ्रेमवर्क के तहत म्यूचुअल फंड्स जितनी राशि उसी दिन निश्चित तौर पर मिलने वाली है, उतनी ही राशि तक इंट्राडे बॉरोइंग ले सकेंगे. इन गारंटीड रिसीवेबल्स में कई स्रोत शामिल होंगे.

जैसे TREPS ट्रांजैक्शन की मैच्योरिटी से मिलने वाली रकम, रिवर्स रेपो से आने वाली राशि, सरकारी सिक्योरिटीज की मैच्योरिटी पेमेंट और ट्रेजरी बिल्स या स्टेट डेवलपमेंट लोन से मिलने वाली रकम. इसके अलावा सरकारी बॉन्ड्स और अन्य पात्र सिक्योरिटीज की बिक्री से मिलने वाली राशि को भी इस सीमा में शामिल किया जाएगा.

AMC को बनानी होगी स्पष्ट पॉलिसी

SEBI ने यह भी कहा है कि हर एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) को इंट्राडे बॉरोइंग के इस्तेमाल के लिए एक स्पष्ट पॉलिसी तैयार करनी होगी. इस पॉलिसी को कंपनी के बोर्ड और ट्रस्टी की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा.

साथ ही इस पॉलिसी को कंपनी की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से अपलोड करना भी जरूरी होगा, ताकि निवेशकों को इसकी पूरी जानकारी मिल सके.

बॉरोइंग का खर्च स्कीम पर नहीं डाला जा सकेगा

रेगुलेटर ने साफ किया है कि इंट्राडे बॉरोइंग से जुड़ा कोई भी खर्च म्यूचुअल फंड स्कीम पर नहीं डाला जाएगा. इसका पूरा खर्च एसेट मैनेजमेंट कंपनी को ही उठाना होगा. अगर किसी वजह से अपेक्षित फंड समय पर नहीं मिलता है या नुकसान होता है, तो उसकी जिम्मेदारी भी AMC की ही होगी.

ETF और इंडेक्स फंड्स के लिए भी नियम

SEBI ने इक्विटी आधारित इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) के लिए भी बॉरोइंग से जुड़े नियम स्पष्ट किए हैं. इन फंड्स को केवल स्टॉक एक्सचेंज के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में भाग लेने के लिए ही बॉरोइंग की अनुमति दी जाएगी. रेगुलेटर के अनुसार यह क्लोजिंग ऑक्शन सेशन 3 अगस्त 2026 से लागू होने वाला है.

निवेशकों के हित में उठाया गया कदम

SEBI का कहना है कि यह सर्कुलर निवेशकों के हितों की सुरक्षा और म्यूचुअल फंड ऑपरेशंस को अधिक सुचारू बनाने के उद्देश्य से जारी किया गया है. इससे फंड हाउस को कैश फ्लो मैनेजमेंट में मदद मिलेगी और निवेशकों को समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जा सकेगा.

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस कदम से म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री में पारदर्शिता और संचालन क्षमता दोनों बेहतर होने की उम्मीद है. वहीं निवेशकों के लिए भी यह व्यवस्था फायदेमंद साबित हो सकती है क्योंकि इससे रिडेम्प्शन पेमेंट में देरी की संभावना कम होगी.

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