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SEBI की हालिया बोर्ड मीटिंग निवेशकों और कंपनियों दोनों के लिए अहम साबित हुई है. इस मीटिंग में ऐसे कई प्रस्तावों और नियमों को मंजूरी दी गई है, जो लंबे समय से अटके मामलों को सुलझाने में मदद करेंगे. खासतौर पर उन निवेशकों के लिए बड़ी राहत आई है, जिनके पास अब भी कागजी यानी फिजिकल शेयर पड़े हैं.
इन फैसलों का मकसद साफ है, शेयर से जुड़े कामों को तेज करना, बेवजह की कागजी प्रक्रिया खत्म करना और निवेशकों को ज्यादा समय और सहूलियत देना. इसके साथ ही डेब्ट मार्केट और क्रेडिट रेटिंग से जुड़े नियमों को भी ज्यादा व्यावहारिक बनाया गया है.
SEBI ने उन लोगों के लिए बड़ा मौका दिया है, जिनके पास अब भी फिजिकल मोड में रखे गए शेयर हैं. ऐसे निवेशकों को अपने शेयर अपने नाम ट्रांसफर कराने का एक बार का मौका मिलेगा. यह सुविधा 7 जुलाई 2025 से लेकर 6 जनवरी 2026 तक उपलब्ध रहेगी. शर्त यह है कि ये शेयर 1 अप्रैल 2019 से पहले खरीदे गए हों और असली शेयर सर्टिफिकेट मौजूद हो.
SEBI ने साफ किया है कि यह सुविधा सभी के लिए नहीं होगी. जिन शेयरों में कोई कानूनी झगड़ा है या जो मामला धोखाधड़ी से जुड़ा है, उन्हें इस विंडो से बाहर रखा जाएगा. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सिर्फ सही और साफ मामलों में ही ट्रांसफर की अनुमति दी जाए.
SEBI ने शेयर ट्रांसफर और उससे जुड़े कामों को भी काफी आसान कर दिया है. अब कई मामलों में कंपनी से अलग से Letter of Confirmation लेने की जरूरत नहीं होगी. नई व्यवस्था के तहत जांच पूरी होने के बाद शेयर सीधे निवेशक के Demat Account में जमा कर दिए जाएंगे. इससे पूरी प्रक्रिया में लगने वाला समय करीब 150 दिन से घटकर सिर्फ 30 दिन के आसपास रह जाएगा.
SEBI बोर्ड ने Unclaimed Amounts को लेकर भी बड़ा फैसला लिया है. अब issuers को maturity के 7 साल पूरे होने के बाद सिर्फ एक बार Unclaimed Amounts को IEPF या IPEF में ट्रांसफर करना होगा. पहले हर due date पर बार-बार ट्रांसफर करना पड़ता था. इस बदलाव से निवेशकों को कंपनी से सीधे क्लेम करने के लिए ज्यादा समय मिल सकेगा.
SEBI ने Credit Rating Agencies यानी CRAs को लेकर भी नियमों में बदलाव किया है. अब CRAs को RBI जैसे अन्य regulators के दायरे वाले instruments की rating करने की अनुमति होगी. Unlisted Debt Instruments के लिए rating का दायरा बढ़ाया जाएगा. हालांकि, इसके साथ कुछ सख्त शर्तें भी रखी गई हैं.
SEBI ने यह भी तय किया है कि Rating Reports और Marketing Material में SEBI regulated products और अन्य regulator के products की साफ पहचान होनी चाहिए. साथ ही यह साफ तौर पर बताना जरूरी होगा कि अन्य regulator के products पर SEBI की investor protection लागू नहीं होती.
SEBI बोर्ड ने High Value Debt Listed Entity यानी HVDLE की पहचान से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है. अब HVDLE का टैग ₹1000 करोड़ नहीं, बल्कि ₹5000 करोड़ outstanding debt पर लगेगा. इससे कई कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी.
इस बदलाव से NBFCs, HFCs, ARCs, Insurance कंपनियां और REITs जैसी संस्थाओं पर governance का बोझ कम होगा और compliance आसान होगी.
SEBI के ये फैसले मिलकर बाजार को ज्यादा सरल, तेज और भरोसेमंद बनाने की दिशा में बड़ा कदम हैं.
इन सभी से निवेशकों का भरोसा और मजबूत होगा.
SEBI बोर्ड मीटिंग के ये फैसले दिखाते हैं कि रेगुलेटर अब निवेशकों की जमीनी समस्याओं पर फोकस कर रहा है. फिजिकल शेयर ट्रांसफर से लेकर डेब्ट मार्केट तक नियमों में ढील और तेजी से न सिर्फ निवेशकों को राहत मिलेगी, बल्कि पूरे कैपिटल मार्केट की कार्यक्षमता भी बेहतर होगी.
कागज के रूप में रखे गए शेयर.
डिजिटल रूप में शेयर रखने का अकाउंट.
लगभग 30 दिन.
जो पैसा तय समय तक क्लेम न किया गया हो.
जो स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड न हो.
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