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फोटो क्रेडिट - ANI
मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का असर भारत पर भी दिखने लगा है. LPG गैस की किल्लत पर सरकार लगातार नजर बनाए हुए है. क्रूड की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव दिख रहा है. अगर यह युद्ध चलता रहा तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है.
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल को लेकर बाजार में चिंता जरूर है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है. उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार में उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया है.
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कोटक महिंद्रा एएमसी के एमडी नीलेश शाह का कहना है कि मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है.
उनके मुताबिक तेल महंगा होने से LPG सिलेंडर की कीमत और सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है. ऐसे हालात में शेयर बाजार में भी अस्थिरता बढ़ सकती है.
नीलेश शाह का मानना है कि तेल की कीमतों में तेजी आने से रुपए पर दबाव बन सकता है. हालांकि भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है और RBI बाजार को स्थिर रखने में सक्षम है. उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में रुपया 100 प्रति डॉलर तक जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा तुरंत होने की संभावना कम है.
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नीलेश शाह के अनुसार निवेशकों को बाजार की गिरावट से घबराना नहीं चाहिए और लंबी अवधि का नजरिया रखना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा कि फिलहाल मौद्रिक नीति समिति (MPC) की ओर से ब्याज दरों में बड़े बदलाव की संभावना कम दिखाई दे रही है.
HDFC AMCompany के एमडी और सीईओ नवनीत मुनोत का कहना है कि वैश्विक जियोपॉलिटिकल हालात और कच्चे तेल की कीमतों की वजह से बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. हालांकि उन्होंने कहा कि भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत है और SIP निवेश के जरिए रिटेल निवेशकों का भरोसा बाजार में बना हुआ है.
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नवनीत मुनोत के अनुसार सोना और चांदी की कीमतों में तेजी से निवेशकों पर “वेल्थ इफेक्ट” पड़ सकता है. ऐसे हालात में लोग कीमतों में और बढ़ोतरी की उम्मीद में खरीदारी को कुछ समय के लिए टाल भी सकते हैं.
नवनीत मुनोत का मानना है कि सरकार की कूटनीतिक रणनीति और आरबीआई की नीतियां आर्थिक ग्रोथ को सपोर्ट कर सकती हैं. साथ ही भारत-यूरोपियन यूनियन जैसे ट्रेड समझौते भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं.
HUL के पूर्व एमडी संजीव मेहता इस मुद्दे पर कहा कि Indian Karuna Collaborativ जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए जानवरों से फैलने वाली बीमारियों और एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल यानी AMR (Antimicrobial Resistance) पर काम करने की जरूरत है.
उन्होंने चेतावनी दी कि AMR की समस्या से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 1% से 2.3% GDP तक नुकसान हो सकता है. इसके अलावा उन्होंने सप्लाई चेन को ज्यादा टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की भी जरूरत बताई.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है. देश में महंगाई नियंत्रण में है और विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत है.
उनका कहना है कि चुनौतियों के साथ नए अवसर भी आते हैं और भारत को इनका फायदा उठाना चाहिए. आने वाले समय में भारत दुनिया की सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बन सकता है.
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