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साल 2026 की शुरुआत ग्लोबल मार्केट के लिए बड़े बदलाव का संकेत लेकर आई है. जापान, जो दशकों से अपनी 'जीरो इंटरेस्ट रेट' पॉलिसी के लिए जाना जाता था, अब उस दौर से बाहर निकलता दिख रहा है. जापानी सरकारी बॉन्ड (JGB) की यील्ड में तेज उछाल ने दुनिया भर के निवेशकों का ध्यान फिर से जापान की ओर खींच लिया है.
इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया के बड़े बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है. जनवरी 2026 में विदेशी निवेशकों (FII) ने भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाला है. हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सक्रिय भूमिका और घरेलू निवेशकों (DII) की मजबूत खरीदारी ने इस झटके को काफी हद तक संभाल लिया है. लेकिन, इसके बाद भी भारतीय बाजारों पर अभी भी दबाव नज़र आ रहा है. चलिए, आसान भाषा में समझते हैं कि कैसे जापानी बॉन्ड का तूफान दुनिया भर के बड़े बाज़ारों को निगलने के लिए तैयार है.
वित्तीय बाजारों में कभी-कभी छोटा सा बदलाव भी बड़ा तूफान खड़ा कर देता है. इस वक्त पूरी दुनिया की नजरें जापान पर टिकी हैं. जापान के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में आई तेजी से भारत समेत दुनिया भर के बाजार प्रभावित हो रहे हैं. 23 जनवरी 2026 को 10 साल वाले जापानी बॉन्ड की यील्ड 2.26% तक पहुंच गई.
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यह आंकड़ा भले ही छोटा लगे, लेकिन पिछले साल के मुकाबले इसमें 1.03% की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. नतीजा यह हुआ कि जनवरी 2026 में FII ने भारत से हाथ खींचना शुरू कर दिया.
23 जनवरी तक के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने करीब 40,704 करोड़ रुपये की नेट बिकवाली की. सिर्फ 23 जनवरी को ही 3,191 करोड़ रुपये का शेयर बेचा गया. इससे डॉलर और येन की मांग बढ़ी और भारतीय रुपये पर दबाव बना.

जापान के केंद्रीय बैंक (BOJ) ने अब अपनी सख्त बॉन्ड-खरीद नीति को धीरे-धीरे ढीला करना शुरू कर दिया है. बैंक ऑफ जापान हर तिमाही में 400 अरब येन की बॉन्ड खरीद में कटौती कर रहा है. आसान भाषा में समझाएं तो, बाजार में बॉन्ड की सप्लाई बढ़ रही है और सबसे बड़ा खरीदार पीछे हट रहा है. इसके अलावा, जापान में चुनावी माहौल और सरकार के बड़े राहत पैकेज ने महंगाई की उम्मीदों को और हवा दी है.
इसी वजह से 30 और 40 साल वाले बॉन्ड की यील्ड 3.66% से 4% के बीच पहुंच गई है. बैंक ऑफ जापान (BOJ) का अनुमान है कि 2026 में महंगाई 1.9% से 2.0% के आसपास रह सकती है. इस माहौल में जापान के बड़े सरकारी फंड, जैसे GPIF, विदेशों से पैसा निकालकर घरेलू बॉन्ड में निवेश बढ़ा रहे हैं.

जापान की इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 1990 के दशक में जब जापान का एसेट बबल फटा, तो वहां की अर्थव्यवस्था जैसे ठहर सी गई. इसे पटरी पर लाने के लिए बैंक ऑफ जापान ने 'अबेनॉमिक्स' का सहारा लिया और 2013 में बड़े पैमाने पर बॉन्ड खरीदना शुरू किया. मकसद था- महंगाई को 2% तक लाना. 2016 तक आते-आते उन्होंने 'यिल्ड कर्व कंट्रोल' (YCC) लागू कर दिया, यानी 10 साल के बॉन्ड की यील्ड को 0% के आसपास लॉक कर दिया.
इससे हुआ ये कि जापान के लोगों ने अपना पैसा बाहर भेजना शुरू किया क्योंकि घर में तो कोई मुनाफा मिल नहीं रहा था. जापान दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता बन गया, जिसके पास सितंबर 2025 तक लगभग 3.66 ट्रिलियन डॉलर की विदेशी संपत्ति थी. इसी माहौल में पैदा हुआ 'येन कैरी ट्रेड'. यानी जापान से सस्ती दरों पर येन उधार लो और उसे भारत या अमेरिका जैसे देशों में ऊंचे मुनाफे वाले एसेट्स में लगा दो. लेकिन अब जब जापान में ब्याज दरें दशकों के उच्चतम स्तर की ओर पहुंच गई हैं, तो यह पूरा खेल उल्टा पड़ता दिख रहा है.
आज की तारीख में जापानी बॉन्ड की स्थिति डराने वाली है. 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 2.26% तक पहुंच गई है, जो एक साल पहले महज 1.1% थी. इतना ही नहीं, 30 साल वाले बॉन्ड की यील्ड 3.65% पर है, जो 1999 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. निवेशकों में डर इस बात का है कि जापान का कर्ज उसकी जीडीपी के 250% से भी ज्यादा हो चुका है.
ऊपर से 8 फरवरी 2026 को वहां चुनाव होने वाले हैं, जिसके कारण सरकार लोकलुभावन टैक्स कटौती का एलान कर सकती है. इससे राजकोषीय घाटा और बढ़ेगा और बॉन्ड मार्केट में और भी ज्यादा आग लगेगी. बैंक ऑफ जापान ने 23 जनवरी की मीटिंग में दरें भले ही स्थिर रखी हों, लेकिन भविष्य के संकेत स्थिति को और भारी करते हुए दिखाई दे रहे हैं.
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जापान के इस बॉन्ड संकट के ग्लोबल मार्केट पर दो बड़े असर दिख रहे हैं. पहला है- कर्ज की लागत. जब जापान जैसा बड़ा खिलाड़ी अपनी दरें बढ़ाता है, तो दुनिया भर में उधार लेना महंगा हो जाता है. अगर जापानी निवेशक अपने हाथ खींचते हैं और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड (जहां उनके 1.1 ट्रिलियन डॉलर लगे हैं) बेचना शुरू करते हैं, तो अमेरिका में भी हाहाकार मच सकता है.
दूसरा बड़ा असर है 'कैरी ट्रेड' का खत्म होना. जो लोग येन में सस्ता कर्ज लेकर बैठे थे, वे अब अपना पैसा वापस जापान ले जा रहे हैं. इससे ग्लोबल मार्केट से लिक्विडिटी यानी नकदी कम हो रही है. यूरोपीय देशों के बॉन्ड मार्केट में भी इसका असर दिखने लगा है. वहां के बॉन्ड की कीमतें गिर रही हैं और यील्ड बढ़ रही है. आईएमएफ का कहना है कि 2026 में ग्लोबल ग्रोथ 3.3% रह सकती है, लेकिन जापान की ये अस्थिरता इस अनुमान को बिगाड़ सकती है.
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भारत इस वक्त एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है. जापान की कमजोरी हमारे लिए दोधारी तलवार जैसी है. फिलहाल 1 जापानी येन की कीमत लगभग 0.55 भारतीय रुपये के आसपास है. येन के कमजोर होने से जापान से आने वाला सामान सस्ता हो गया है, जिससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है. हालांकि, जापान ने भारत में 10 ट्रिलियन येन (करीब 6 लाख करोड़ रुपये) के निवेश का वादा किया है, जो एक बड़ी राहत है.
करेंसी के मोर्चे पर रुपया दबाव में है. 2025 में एशियाई मुद्राओं में रुपया सबसे ज्यादा कमजोर होने वाली करेंसी में से एक था. अगर जापान के निवेशक अपना पैसा भारत के शेयर और बॉन्ड मार्केट से निकालकर वापस अपने देश ले जाते हैं, तो भारतीय बाजारों में गिरावट देखी जा सकती है.
हालांकि, सुमितोमो मित्सुई जैसी जापानी कंपनियों का भारत में विस्तार हमारे लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर सकता है. इसके अलावा, रिजर्व बैंक ने बाजार में पर्याप्त कैश बनाए रखने के लिए करीब 11.7 लाख करोड़ रुपये की लिक्विडिटी उपलब्ध कराई है.
दूसरी ओर, जहां FII लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशक पूरी मजबूती से बाजार का सहारा बने हुए हैं. जनवरी में FII ने 40,704 करोड़ रुपये बेचे, लेकिन DII ने 54,823 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को संतुलन में रखा. निफ्टी का 24,800 के स्तर के आसपास टिके रहना यह दिखाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद फिलहाल मजबूत बनी हुई है.
Q-1: जापानी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से भारतीय बाजार क्यों गिर रहा है?
A: क्योंकि विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालकर जापान या सुरक्षित बॉन्ड में वापस ले जा रहे हैं, जिससे बाजार में बिकवाली बढ़ रही है.
Q-2: 'येन कैरी ट्रेड' का खत्म होना क्या है?
A: जापान से सस्ता कर्ज लेकर दूसरे देशों में निवेश करने का सिलसिला अब रुक रहा है क्योंकि जापान में ब्याज दरें बढ़ गई हैं.
Q-3: क्या 2026 में शेयर बाजार और ज्यादा गिरेगा?
A: बाजार पर दबाव है, लेकिन घरेलू निवेशकों (DII) की भारी खरीदारी और RBI की नीतियों के कारण बड़े क्रैश की संभावना कम है.
Q-4: क्या कमजोर येन भारत के लिए अच्छा है?
A: यह मिला-जुला है. इससे जापानी मशीनें और सामान सस्ते मिलेंगे, लेकिन भारत का व्यापार घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है.
Q-5: क्या जापान का भारत में निवेश जारी रहेगा?
A: हां, जापान ने 6 लाख करोड़ रुपये के निवेश का जो वादा किया है, वह लॉन्ग टर्म के लिए है और बॉन्ड मार्केट की हलचल से उस पर असर नहीं पड़ेगा.