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IPO Market Slowdown: कभी गुलजार रहे बाजार में आज सन्नाटा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: AI/ChatGPT)
IPO Market Slowdown: कुछ महीने पहले तक शेयर बाजार में IPO का ऐसा क्रेज था कि हर नया इश्यू निवेशकों के लिए कमाई का मौका माना जाता था. कई IPO लिस्टिंग के दिन ही 50% से 100% तक का रिटर्न दे रहे थे. रिटेल निवेशकों से लेकर HNI और संस्थागत निवेशक तक हर इश्यू पर टूट पड़ते थे. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है
अब माहौल बदल गया है. IPO फंडिंग दो साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है. मई 2026 में एक भी मेनबोर्ड IPO बाजार में नहीं आया. यह मार्च 2025 के बाद पहली बार हुआ है जब पूरे महीने कोई बड़ा IPO लॉन्च नहीं हुआ. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या IPO मार्केट की चमक फीकी पड़ रही है, या फिर निवेशक अब पहले की तुलना में ज्यादा सोच-समझकर पैसा लगा रहे हैं?
Prime Database के आंकड़ों के मुताबिक 2026 के पहले पांच महीनों में कंपनियों ने IPO के जरिए करीब ₹19,854 करोड़ जुटाए हैं. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा ₹27,686 करोड़ था. यानी साल-दर-साल आधार पर करीब 28% की गिरावट देखने को मिली है.
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| अवधि | जुटाई गई राशि |
| जनवरी-मई 2024 | ₹48,152 करोड़ |
| जनवरी-मई 2025 | ₹27,686 करोड़ |
| जनवरी-मई 2026 | ₹19,854 करोड़ |
| बदलाव | लगभग 28% गिरावट |
यह भी समझना जरूरी है कि मौजूदा सुस्ती ऐसे समय आई है जब पिछले वित्त वर्ष में IPO बाजार ने रिकॉर्ड प्रदर्शन किया था.
FY26 में मेनबोर्ड IPOs के जरिए कंपनियों ने करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये जुटाए. अक्टूबर 2025 में तो सिर्फ एक महीने में 45,188 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई गई थी. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड था.
हालांकि इतनी तेज रफ्तार के बाद बाजार में कुछ ठहराव आना भी स्वाभाविक माना जा रहा है. कई एनालिस्ट्स का मानना है कि पिछले साल निवेशकों का उत्साह काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था और अब बाजार सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है.
यह 2024 और 2025 में दिखी रिकॉर्ड तेजी के बिल्कुल उलट तस्वीर है.
हैरानी की बात ये है कि कंपनियों की कमी नहीं है. अगर आपको लगता है कि IPO इसलिए कम आ रहे हैं क्योंकि कंपनियां नहीं हैं, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है.
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2025 भारत के IPO इतिहास का रिकॉर्ड साल था. उस साल मुख्य बोर्ड IPO के जरिए करीब ₹1.76 लाख करोड़ जुटाए गए थे, जो भारतीय बाजार के इतिहास में सबसे बड़ा आंकड़ा था. 103 कंपनियां बाजार में आई थीं.
इतना ही नहीं, 2026 के लिए भी पाइपलाइन बेहद मजबूत है. दर्जनों कंपनियां SEBI की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं और कई बड़े नाम बाजार में आने की तैयारी कर रहे हैं.
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2025 में औसत रिटेल सब्सक्रिप्शन करीब 23.56 गुना था. 2026 में यह घटकर सिर्फ 8.1 गुना रह गया है. यानी रिटेल निवेशकों की भागीदारी में करीब 65% की गिरावट दर्ज की गई है.
| पैरामीटर | 2025 | 2026 |
| औसत रिटेल सब्सक्रिप्शन | 23.56x | 8.1x |
| 10x से ज्यादा सब्सक्राइब हुए IPO | 45+ | केवल 3 |
| निवेशकों का मूड | एग्रेसिव | सेलेक्टिव |
IPO बाजार की सुस्ती के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक अनिश्चितता को माना जा रहा है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने निवेशकों का भरोसा प्रभावित किया है.
जब भी दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाने लगते हैं. ऐसे माहौल में कंपनियां भी अपने IPO लॉन्च करने से बचती हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कमजोर बाजार में सही वैल्यूएशन नहीं मिल पाएगा.
यही वजह है कि सेबी से मंजूरी मिलने के बावजूद 51 कंपनियों ने अपने IPO फिलहाल टाल दिए हैं. दिलचस्प बात यह है कि इनमें से ज्यादातर कंपनियों के कारोबार में कोई बड़ी समस्या नहीं है. वे सिर्फ बेहतर बाजार परिस्थितियों का इंतजार कर रही हैं.
निवेशक अब सिर्फ नाम देखकर पैसा नहीं लगा रहे
IPO बाजार में आई ठंडक का एक बड़ा कारण कमजोर लिस्टिंग प्रदर्शन भी है.
2026 में लिस्ट हुए करीब दो-तिहाई IPO अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं. यानी जिन निवेशकों ने लिस्टिंग गेन की उम्मीद में पैसा लगाया था, उन्हें निराशा हाथ लगी है.
सबसे अहम बात यह है कि औसत लिस्टिंग गेन घटकर सिर्फ 8% रह गया है. यह 2019 के बाद सबसे निचला स्तर माना जा रहा है.
जब निवेशकों को लिस्टिंग पर बड़े मुनाफे नहीं मिलते, तो स्वाभाविक रूप से उनका उत्साह कम होने लगता है. खासकर रिटेल और HNI निवेशक, जो अक्सर लिस्टिंग गेन के लिए IPO में पैसा लगाते हैं, अब ज्यादा सतर्क हो गए हैं.
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इस सवाल का जवाब फिलहाल 'नहीं' है.
अगर IPO बाजार पूरी तरह कमजोर पड़ गया होता, तो नई कंपनियां सेबी के पास आवेदन नहीं कर रहीं होतीं. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.
इस समय सेबी से मंजूर 2.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के IPO पाइपलाइन में हैं. इसके अलावा करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये के IPO अभी मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.
यह दिखाता है कि कंपनियों का IPO के जरिए पूंजी जुटाने का इरादा अब भी मजबूत है. फर्क सिर्फ इतना है कि वे लॉन्चिंग के लिए सही समय का इंतजार कर रही हैं.

जहां मेनबोर्ड IPO बाजार में सुस्ती दिख रही है, वहीं SME IPO सेगमेंट में स्थिति काफी बेहतर है.
मई 2026 में 17 SME IPO आए और इनके जरिए 733 करोड़ रुपये जुटाए गए. इससे साफ है कि छोटे साइज के इश्यू में निवेशकों की दिलचस्पी अभी भी बनी हुई है.
एनालिस्ट्स का मानना है कि SME कंपनियों में ग्रोथ की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. साथ ही छोटे इश्यू में डिमांड और सप्लाई का समीकरण भी अलग होता है, जिससे निवेशकों को बेहतर रिटर्न की उम्मीद रहती है.
हालांकि इस सेगमेंट में रिस्क भी ज्यादा होता है, इसलिए निवेशकों को केवल लिस्टिंग गेन के लालच में निवेश करने से बचना चाहिए.
कई मार्केट एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मौजूदा स्थिति को IPO बाजार की कमजोरी नहीं, बल्कि निवेशकों की मैच्योरिटी के तौर पर देखा जाना चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में निवेशकों ने ऐसे कई IPO देखे हैं जो भारी प्रीमियम पर लिस्ट हुए लेकिन बाद में बुरी तरह टूट गए. इसका असर निवेशकों की सोच पर पड़ा है.
अब निवेशक सिर्फ आईपीओ की चर्चा या ग्रे मार्केट प्रीमियम देखकर पैसा लगाने के बजाय कंपनी के बिजनेस मॉडल, वैल्यूएशन, ग्रोथ और मुनाफे पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. यह किसी भी Immersive Market के लिए पॉजिटिव संकेत माना जाता है.
अगर पश्चिम एशिया का तनाव कम होता है, कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और बाजार में स्थिरता लौटती है, तो IPO गतिविधियां फिर से तेज हो सकती हैं.
इतनी बड़ी IPO पाइपलाइन यह संकेत देती है कि कंपनियां बाजार में आने के लिए तैयार हैं. उन्हें सिर्फ सही समय का इंतजार है.
फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि IPO बाजार खत्म नहीं हुआ है, बल्कि निवेशक अब पहले से ज्यादा सेलेक्टिव हो गए हैं. तेजी के दौर में हर IPO को आंख बंद करके खरीदने वाले निवेशक अब सवाल पूछ रहे हैं, आंकड़े देख रहे हैं और वैल्यूएशन समझ रहे हैं. लंबे समय के लिहाज से यह बदलाव भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अच्छा संकेत माना जा सकता है.