IPO फाइलिंग से ठीक 29 दिन पहले boAt फाउंडर्स क्यों 'पीछे हटे'? निवेशकों में बेचैनी! आखिर अंदर क्या पक रहा है

देश की चर्चित ऑडियो ब्रांड boAt के IPO से पहले हालात कुछ अच्छे नहीं दिख रहे हैं. फाउंडर्स के इस्तीफे, कर्मचारियों की भारी भागदौड़ और घटते रेवेन्यू ने कंपनी के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि IPO से पहले ही boAt अंदर से हिलने लगी है.
IPO फाइलिंग से ठीक 29 दिन पहले boAt फाउंडर्स क्यों 'पीछे हटे'? निवेशकों में बेचैनी! आखिर अंदर क्या पक रहा है

boAt का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में आता है एक ऐसा भारतीय ब्रांड जिसने महंगे इंटरनेशनल प्रोडक्ट्स को कड़ी टक्कर दी. हेडफोन, स्मार्टवॉच और स्पीकर्स के बाजार में इस कंपनी ने युवाओं का दिल जीत लिया. लेकिन अब जब यह ब्रांड IPO के ज़रिए स्टॉक मार्केट में कदम रखने जा रहा है, तो इसके अंदर के हालात कुछ और ही कहानी बता रहे हैं.

कंपनी के दोनों को-फाउंडर्स, अमन गुप्ता और समीर मेहता, जिन्होंने इसे जमीन से खड़ा किया था, IPO फाइलिंग से ठीक 29 दिन पहले अपने एक्जीक्यूटिव रोल्स छोड़ दिए. यह कदम निवेशकों और मार्केट एक्सपर्ट्स दोनों के लिए हैरान करने वाला था.

फाउंडर्स का अचानक पीछे हटना, ‘रेड फ्लैग’ या रणनीति?

अमन गुप्ता, जो "Shark Tank India" से घर-घर में पहचाने जाने लगे, अब कंपनी में नॉन-एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं. वहीं, उनके को-फाउंडर समीर मेहता, जो पहले CEO थे, अब एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर की भूमिका में हैं. यानी दोनों अब कंपनी के ऑपरेशनल कामकाज से दूर हैं.

मार्केट एनालिस्ट जयंत मुंधरा ने अपने लिंक्डइन के एक पोस्ट में इसे एक “calculated pre-IPO move” बताया है. उनका कहना है कि यह कोई सामान्य “सक्सेशन प्लान” नहीं बल्कि IPO से पहले का एक सोचा-समझा कदम है, ताकि फाउंडर्स की जवाबदेही IPO के बाद सीमित रहे. उन्होंने लिखा, “फाउंडर्स ने अपनी ज़िम्मेदारियां छोड़ दीं, लेकिन बोर्ड में बने रहे ताकि उनकी मौजूदगी बनी रहे और यह बात संभावित निवेशकों के लिए बड़ी चिंता का विषय हो सकती है.”

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कंपनी के भीतर की बेचैनी

boAt के UDRHP (Updated Draft Red Herring Prospectus) में खुलासा हुआ है कि कंपनी के अंदर कर्मचारियों का पलायन तेजी से बढ़ा है. वित्त वर्ष 2025 में boAt का एट्रिशन रेट 34.18% पहुंच गया, जो FY24 में 28% और FY23 में 27% था. इसका मतलब यह है कि हर तीन में से एक कर्मचारी कंपनी छोड़ चुका है. अगर आंकड़ों की बात करें तो, FY23 में 107 कर्मचारी गए.

FY24 में 132 और FY25 में 161 कर्मचारी कंपनी छोड़ गए. यह सिलसिला FY26 की पहली तिमाही में भी नहीं थमा, सिर्फ तीन महीने में 31 कर्मचारी बाहर हो गए. मार्केट एक्सपर्ट मुंधरा ने इसे “mass exodus” कहा है और लिखा है कि यह किसी सामान्य टर्नओवर का हिस्सा नहीं बल्कि एक गंभीर कल्चर क्राइसिस का संकेत है.

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ESOP भी नहीं रोक पाए टैलेंट

कंपनी ने अपने कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए बड़े पैमाने पर ESOP (Employee Stock Option Plans) जारी किए. इसका मकसद था कि कर्मचारी कंपनी की ग्रोथ में हिस्सा महसूस करें और लंबे समय तक जुड़े रहें. लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि अगर कंपनी के पास इतना बड़ा ESOP पूल था, तो फिर कर्मचारी क्यों जा रहे हैं?

इसका जवाब दो संभावनाओं में देखा जा सकता है या तो कर्मचारियों को कंपनी के शेयर की भविष्य की वैल्यू पर भरोसा नहीं रहा, या फिर आंतरिक माहौल इतना अस्थिर है कि लोग “पेपर वेल्थ” को असली पैसा नहीं मान रहे.

IPO साइज भी घटा

पहले boAt का IPO साइज ₹2000 करोड़ तय था. लेकिन हालिया अपडेट में कंपनी ने इसे घटाकर ₹1500 करोड़ कर दिया है. इसमें ₹500 करोड़ का हिस्सा फ्रेश इश्यू होगा और ₹1000 करोड़ का हिस्सा OFS (Offer for Sale) यानी पुराने निवेशकों द्वारा शेयर बेचने से आएगा.

यह कदम दो बातें साफ करता है, पहली, कंपनी को फंड जुटाने में उतनी आसानी नहीं हो रही जितनी उम्मीद थी. दूसरी, मौजूदा इन्वेस्टर्स IPO से पहले अपने हिस्से का पैसा निकालना चाहते हैं, यानी उन्हें कंपनी के वैल्यूएशन पर भरोसा नहीं रहा.

रेवेन्यू घटा लेकिन मुनाफा बढ़ा

boAt ने अपने फाइनेंशियल डेटा में FY25 के लिए ₹60 करोड़ का नेट प्रॉफिट दिखाया है, जबकि FY24 में उसे ₹80 करोड़ का नेट लॉस हुआ था. पहली नजर में यह पॉजिटिव लगता है, लेकिन जब गहराई से देखें तो तस्वीर उतनी उजली नहीं दिखती.

कंपनी का कुल रेवेन्यू ₹3,122 करोड़ से घटकर ₹3,098 करोड़ पर आ गया है. यानी मुनाफा बढ़ा, लेकिन बिक्री कम हुई. यह दिखाता है कि कंपनी ने लागत घटाई, प्रोडक्ट इनोवेशन किया, लेकिन ग्रोथ नहीं बढ़ाई. मार्केट एनालिस्ट्स मानते हैं कि कंपनी शायद IPO से पहले अपनी बैलेंस शीट को “सुंदर” दिखाने की कोशिश कर रही है ताकि निवेशकों को आकर्षित किया जा सके.

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कंपनी के अंदर ‘लीडरशिप क्राइसिस’?

IPO से ठीक पहले फाउंडर्स का ऑपरेशनल जिम्मेदारियों से पीछे हटना सवाल खड़े करता है. अब CEO की जिम्मेदारी COO गौरव नायर को दी गई है, जबकि अमन और समीर केवल बोर्ड में सलाहकार भूमिकाओं में हैं. मार्केट के जानकारों का कहना है कि IPO से पहले किसी कंपनी में इतना बड़ा लीडरशिप शेक-अप होना बहुत असामान्य है. यह दिखाता है कि या तो कंपनी के भीतर असहमति है, या फिर फाउंडर्स को आने वाले समय में चुनौतियों का अंदेशा है.

क्या कंपनी का कल्चर टूट चुका है?

boAt ने भारत के युवा बाजार को समझकर अपनी पहचान बनाई थी, “Made for India, made by India.” लेकिन अब जब अंदर के कर्मचारी बड़ी संख्या में कंपनी छोड़ रहे हैं, तो सवाल उठता है कि क्या boAt का कल्चर अब पहले जैसा नहीं रहा?

क्या IPO निवेशकों के लिए खतरे की घंटी है?

IPO बाजार में अभी निवेशक पहले से ही सतर्क हैं. Nykaa, Zomato, Paytm जैसे IPO के बाद निवेशकों ने अनुभव से सीखा है कि ब्रांड की लोकप्रियता हमेशा शेयर बाजार में सफलता की गारंटी नहीं होती.

boAt की मौजूदा स्थिति में फाउंडर्स का पीछे हटना, बढ़ता एट्रिशन और घटता रेवेन्यू यह संकेत देता है कि कंपनी के “अंदर कुछ अस्थिर है.” IPO से पहले अगर भरोसा ही कमजोर पड़ जाए, तो निवेशक अपना पैसा लगाने से पहले दो बार सोचेंगे.

खबर से जुड़े FAQs

1. क्या अमन गुप्ता और समीर मेहता अब भी कंपनी में हैं?

हां, दोनों बोर्ड में हैं लेकिन ऑपरेशनल रोल से हट चुके हैं.

2. boAt का IPO साइज क्यों घटाया गया?

कंपनी ने मार्केट कंडीशन और निवेशकों की रणनीति को देखते हुए इसे ₹2,000 करोड़ से घटाकर ₹1,500 करोड़ किया है.

3. क्या कंपनी प्रॉफिट में है?

FY25 में कंपनी ने ₹60 करोड़ का नेट प्रॉफिट दिखाया, लेकिन रेवेन्यू थोड़ा घटा है.

4. क्या इतनी ज्यादा एट्रिशन सामान्य है?

नहीं. 34% एट्रिशन बहुत अधिक माना जाता है, खासकर एक ब्रांडेड स्टार्टअप के लिए.

5. क्या IPO निवेशकों के लिए जोखिम भरा है?

हां, फिलहाल कंपनी के नेतृत्व, कल्चर और फाउंडर इनवॉल्वमेंट पर सवाल बने हुए हैं, इसलिए निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए.

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