IBC का अगला दशक चुनौतीपूर्ण; NCLAT चेयरमैन बोले- Cross Border Insolvency और Group Insolvency पर करना होगा काम

NCLAT के चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण ने IBC के पहले दशक को संस्थागत निर्माण और न्यायिक विकास का सफल दशक बताया. उन्होंने कहा कि IBC ने भारत की दिवाला व्यवस्था को अधिक संगठित और समयबद्ध बनाया है. साथ ही CIRP मामलों में देरी, ट्रिब्यूनलों की क्षमता और क्रॉस-बॉर्डर इंसॉल्वेंसी जैसी चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया.
IBC का अगला दशक चुनौतीपूर्ण; NCLAT चेयरमैन बोले- Cross Border Insolvency और Group Insolvency पर करना होगा काम

IBC के 10 साल पर NCLAT चेयरपर्सन अशोक भूषण का बड़ा बयान.

Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के 10 साल पूरे होने के अवसर पर NCLAT के चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण ने इसकी उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि IBC ने भारत की दिवाला व्यवस्था को बिखरी हुई और देरी से प्रभावित प्रणाली से निकालकर एक समयबद्ध और संगठित ढांचे में बदलने का काम किया है.

IBC ने दिवाला व्यवस्था को दी नई दिशा

जस्टिस अशोक भूषण के अनुसार IBC ने भारत में दिवाला समाधान की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाया है. उन्होंने कहा कि इस कानून ने क्रेडिट अनुशासन को मजबूत किया और डिफॉल्ट के खिलाफ प्रभावी दबाव तैयार किया.

उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही विवादों का समाधान हो गया, जो इस व्यवस्था की प्रभावशीलता को दर्शाता है.

NCLT और NCLAT की अहम भूमिका

चेयरपर्सन ने कहा कि NCLT और NCLAT ने केवल IBC को लागू करने का काम ही नहीं किया बल्कि इसके न्यायिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

उनके मुताबिक पिछले एक दशक में इस कानून के तहत विकसित न्यायिक ढांचे ने दिवाला समाधान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.

चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं

हालांकि जस्टिस भूषण ने यह भी माना कि कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां अब भी मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि CIRP मामलों के निपटारे में देरी एक बड़ी समस्या बनी हुई है.

इसके अलावा ट्रिब्यूनलों की क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर और सदस्यों की कमी को भी उन्होंने चिंता का विषय बताया. उनके अनुसार इन मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है ताकि दिवाला समाधान प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बन सके.

क्रॉस-बॉर्डर और ग्रुप इंसॉल्वेंसी पर जोर

NCLAT चेयरपर्सन ने कहा कि क्रॉस-बॉर्डर इंसॉल्वेंसी और ग्रुप इंसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क को और मजबूत करने की आवश्यकता है. उन्होंने संकेत दिया कि बदलते कारोबारी माहौल में इन क्षेत्रों को मजबूत करना भविष्य की महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है.

आगे की राह क्या हो?

जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि दिवाला मामलों में निर्धारित समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए. इसके साथ ही विशेषीकृत बेंच, बेहतर तकनीक और मजबूत संस्थागत ढांचे के विकास पर भी जोर दिया.

उन्होंने कहा कि दिवाला समाधान प्रक्रिया का उद्देश्य केवल मामलों का निपटारा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि कारोबार को बचाना, रोजगार सुरक्षित रखना और आर्थिक भरोसा बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

“रिजॉल्यूशन नियम हो, लिक्विडेशन अपवाद”

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि रिजॉल्यूशन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जबकि लिक्विडेशन अपवाद होना चाहिए. उनका मानना है कि एक प्रभावी दिवाला व्यवस्था का लक्ष्य व्यवसायों को पुनर्जीवित करना और आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखना होना चाहिए.

IBC का पहला दशक रहा सफल

जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि IBC का पहला दशक संस्थागत निर्माण और न्यायिक विकास का सफल दशक रहा है. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगले दशक में दक्षता, संस्थागत क्षमता और जनविश्वास को और मजबूत करने की जरूरत होगी.

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