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सोने-चांदी की कीमतों में भारी गिरावट.
शेयर बाजार हो या सर्राफा बाजार, इस समय हर तरफ बस एक ही चर्चा है- सोने और चांदी की कीमतों में आई भारी गिरावट. जो सोना और चांदी कुछ समय पहले तक आसमान छू रहे थे, वे अब अचानक जमीन पर आ गिरे हैं. निवेशकों के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है, क्योंकि आमतौर पर जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो सोने के दाम बढ़ते हैं. लेकिन इस बार कहानी कुछ और ही है.
वैश्विक बाजारों से लेकर भारतीय एमसीएक्स (MCX) तक, हर जगह लाल निशान हावी है. आइए समझते हैं कि आखिर इस 'क्रैश' के पीछे की असली वजह क्या है और क्यों युद्ध के खतरों के बावजूद पीली धातु अपनी चमक खो रही है. वहीं,अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने-चांदी में भारी गिरावट आई. गोल्ड 6.5% टूटकर 4600 डॉलर के नीचे आ गया और चांदी 10% टूटकर, 70 डॉलर के नीचे चली गई.
सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जो वाकई हैरान करने वाले हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 350 डॉलर टूटकर 4550 डॉलर पर आ गया है. वहीं, चांदी में 13 प्रतिशत की बड़ी गिरावट देखी गई है और यह 67 डॉलर के स्तर पर पहुँच गई है.
भारतीय बाजार की बात करें, तो एमसीएक्स (MCX) पर सोने की कीमतों में 10,000 रुपये की भारी गिरावट आई है. चांदी का हाल तो और भी बुरा है, जहाँ 30,500 रुपये की तेज गिरावट दर्ज की गई है और भाव अब 2.18 लाख रुपये के नीचे फिसल गए हैं.
केवल कीमती धातुएं ही नहीं, बल्कि इंडस्ट्रियल मेटल्स में भी हाहाकार है. एलएमई (LME) कॉपर 4 प्रतिशत टूटकर 11,900 डॉलर के नीचे आ गया है, जो इसका करीब 4 महीने का निचला स्तर है. वहीं एल्युमीनियम में भी 7 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है.
आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि जब दुनिया भर में भू-राजनीतिक (Geopolitical) जोखिम इतने ज्यादा हैं, तो सोना क्यों गिर रहा है. इसका सीधा और सरल जवाब है- ब्याज दरें. अमेरिका के केंद्रीय बैंक 'फेडरल रिजर्व' ने ब्याज दरों को 3.50-3.75 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर रखा है. फेडरल रिजर्व ने साफ संकेत दिए हैं कि वह अभी ब्याज दरों में कटौती करने की जल्दबाजी में नहीं है.
जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो निवेशक सोने के बजाय बॉन्ड्स या डिपॉजिट्स में पैसा लगाना ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि वहां उन्हें निश्चित रिटर्न मिलता है. सोना रखने पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए ऊंची दरों के माहौल में इसकी अपील कम हो जाती है.
सोने की इस गिरावट के पीछे महंगाई का भी बड़ा हाथ है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से महंगाई का खतरा अभी टला नहीं है. फेडरल रिजर्व का मानना है कि जब तक महंगाई पूरी तरह काबू में नहीं आती, तब तक दरों में कटौती करना जोखिम भरा हो सकता है.
मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने भी उन उम्मीदों को तोड़ दिया है जिनमें माना जा रहा था कि जल्द ही रेट कट (Rate Cut) होगा. इसी वजह से सोना दो ताकतों के बीच फंसा हुआ है. एक तरफ वैश्विक अनिश्चितता उसे सहारा दे रही है, तो दूसरी तरफ ऊंची ब्याज दरें उस पर दबाव बना रही हैं. फिलहाल ब्याज दरों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे देश के लिए सिरदर्द साबित हो सकती हैं. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है. ऐसे में तेल महंगा होने से देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ सकता है. इससे रुपये की सेहत बिगड़ सकती है और देश में महंगाई और बढ़ सकती है.
वैश्विक स्तर पर भी शेयर बाजारों, खासकर तेल आयात करने वाले देशों के बाजारों पर दबाव साफ देखा जा सकता है. आने वाले समय में कच्चे तेल और कीमती धातुओं की चाल पर सबकी नजर रहेगी, क्योंकि ये सीधे तौर पर आम आदमी की जेब और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं.
Q: एमसीएक्स (MCX) पर सोने और चांदी की कीमतों में कितनी गिरावट आई है?
A: एमसीएक्स पर सोने के दाम 10,000 रुपये और चांदी के दाम 30,500 रुपये तक गिर गए हैं. चांदी अब 2.18 लाख रुपये के नीचे कारोबार कर रही है.
Q: युद्ध और तनाव के बावजूद सोना क्यों गिर रहा है?
A: आमतौर पर तनाव में सोना बढ़ता है, लेकिन इस बार अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें भारी पड़ रही हैं. निवेशक सोने के बजाय फिक्स्ड रिटर्न वाले बॉन्ड्स में पैसा लगा रहे हैं.
Q: फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला लिया है?
A: फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.50-3.75 प्रतिशत पर बरकरार रखा है और संकेत दिया है कि महंगाई के खतरे को देखते हुए वे फिलहाल कटौती नहीं करेंगे.
Q: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत पर क्या असर होगा?
A: तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे रुपया कमजोर हो सकता है और घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ सकती है.
Q: क्या इंडस्ट्रियल मेटल्स के दामों में भी कमी आई है?
A: हां, एलएमई (LME) कॉपर 4 प्रतिशत टूटकर 4 महीने के निचले स्तर पर आ गया है और एल्युमीनियम की कीमतों में भी 7 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आई है.