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FIIs की लगातार बिकवाली ने खराब किया बाजार का सेंटीमेंट. (फोटो: Zee Business)
FIIs Selling: भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ हफ्तों से एक ही सवाल गूंज रहा है- FIIs आखिर कब रुकेंगे? ईरान-अमेरिका के युद्ध के बीच विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार का सेंटीमेंट खराब किया है. पिछले तीन दिनों से तो घरेलू शेयर बाजार में रिकवरी का ट्रेंड बन रहा है, लेकिन बिकवाली का असर इतना बड़ा रहा कि मार्च में निवेशकों की कुल संपत्ति में ₹41 लाख करोड़ से ज्यादा की गिरावट आई.
इस बीच, Marcellus Investment Managers के संस्थापक और सीआईओ सौरभ मुखर्जी ने अनिल सिंघवी के साथ ईरान युद्ध, भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और निवेश की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की है.
27 फरवरी को BSE में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप ₹463.5 लाख करोड़ था, जो 2 अप्रैल तक गिरकर ₹422.4 लाख करोड़ रह गया. यानी कुछ ही दिनों में ₹41 लाख करोड़ की बड़ी गिरावट. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली. US-Iran तनाव शुरू होने के बाद से ही FIIs कैश मार्केट में ₹1.30 लाख करोड़ से ज्यादा की बिकवाली कर चुके हैं.
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ताजा आंकड़े बताते हैं कि बिकवाली का सिलसिला अभी भी जारी है.
6 अप्रैल को FIIs ने करीब ₹8,167 करोड़ की बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगभग ₹8,089 करोड़ की खरीदारी कर बाजार को संभालने की कोशिश की. 2 अप्रैल को भी यही ट्रेंड दिखा. FIIs ने ₹9,931 करोड़ बेचा, जबकि DIIs ने ₹7,208 करोड़ खरीदा. यानी साफ है, अगर DIIs सपोर्ट नहीं देते तो बाजार में गिरावट और गहरी हो सकती थी.
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इस बिकवाली के पीछे कई बड़े कारण हैं, जिन्हें समझना जरूरी है.
जब तक क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के नीचे नहीं आता, भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहेगा. महंगा तेल मतलब ज्यादा महंगाई और बढ़ता फिस्कल डेफिसिट, जो विदेशी निवेशकों को डराता है.
FIIs की सबसे ज्यादा बिकवाली बैंकिंग शेयरों में दिख रही है. RBI के कुछ नियमों और FX मार्केट में पाबंदियों से विदेशी निवेशकों की चिंता बढ़ी है.
10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7% के पार पहुंच चुकी है. इससे बैंकिंग सिस्टम पर दबाव और बढ़ सकता है, जो बाजार के लिए निगेटिव संकेत है.
US-Iran तनाव, सप्लाई चेन की दिक्कतें और गैस की कमी जैसे फैक्टर भी बाजार में डर का माहौल बना रहे हैं.
सिर्फ बाजार ही नहीं, अर्थव्यवस्था के अंदर भी कुछ चुनौतियां हैं.
व्हाइट कॉलर जॉब्स (IT, बैंकिंग, मीडिया) में ग्रोथ धीमी पड़ी है. इसका सीधा असर खपत (Consumption) पर पड़ता है, जो भारत की GDP का करीब 60% हिस्सा है.
अगर लोगों की आमदनी नहीं बढ़ेगी, तो खर्च भी नहीं बढ़ेगा और यही बाजार के लिए बड़ा रिस्क है.
ऐसे माहौल में घबराने की बजाय रणनीति बदलने की जरूरत है. सौरभ मुखर्जी ने बताए हैं कि अब आपका फोकस कहां होना चाहिए.
1. एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों पर फोकस: IT, Pharma और Manufacturing सेक्टर को कमजोर रुपये और ग्लोबल डिमांड का फायदा मिल सकता है.
2. ग्लोबल थीम में निवेश: Defense, Aerospace और Infrastructure जैसे सेक्टर ग्लोबल लेवल पर मजबूत दिख रहे हैं.
3. डोमेस्टिक कंजंप्शन स्टॉक्स में सावधानी: फिलहाल ऐसे शेयरों से थोड़ा दूरी रखना बेहतर हो सकता है, जब तक मांग में सुधार साफ नजर न आए.
यह दौर थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन बाजार में ऐसे ही समय बड़े मौके भी बनते हैं. FIIs की बिकवाली हमेशा नहीं रहती, और जब ट्रेंड पलटता है तो तेजी भी उतनी ही तेज आई है. इसलिए घबराहट में फैसले लेने से बचें, डेटा को समझें और अपनी रणनीति को स्मार्ट तरीके से एडजस्ट करें.
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