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FIIs सेलिंग का रिटेल निवेशकों के लिए क्या है मतलब (प्रतीकात्मक तस्वीर: AI)
FII Selling: भारतीय शेयर बाजार में अब विदेशी निवेशकों की बिकवाली गिरावट के सबसे बड़े कारणों में से एक बन चुकी है. बिकवाली का ये Cycle खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. ऐसे में एक सवाल जो उठ रहा है, वो ये कि जब विदेशी निवेशक (FII) लगातार बिकवाली कर रहे हैं तो क्या रिटेल निवेशक खरीद-खरीदकर फंस रहे हैं? क्या बाजार में जो पैसा आ रहा है, वह सिर्फ घरेलू निवेशकों की वजह से टिक रहा है?
Abacus Asset Manager के फाउंडर और दिग्गज निवेशक सुनील सिंघानिया ने अनिल सिंघवी के साथ खास बातचीत में कहा कि बाजार में उतार-चढ़ाव जरूर है, लेकिन भारत की लॉन्ग टर्म स्टोरी अभी भी मजबूत बनी हुई है. उनके मुताबिक FII की बिकवाली को सिर्फ निगेटिव नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसके पीछे के कारणों को समझना ज्यादा जरूरी है.
सुनील सिंघानिया ने कहा कि मई के आखिरी तीन दिनों में अचानक से 27,000-28,000 करोड़ रुपये की बिकवाली आई, जो काफी हद तक MSCI रीबैलेंसिंग की वजह से थी. कई ग्लोबल फंड्स को इंडेक्स में बदलाव के चलते अपने पोर्टफोलियो में फेरबदल करना पड़ा.
दूसरे देशों (जैसे कोरिया और ताइवान) के मार्केट्स बहुत अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं, जिससे MSCI इंडेक्स में इंडिया का वेटेज लगातार कम हुआ है. हर इन्वेस्टर वहां पैसा डालता है जहां मोमेंटम अच्छा हो.
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हालांकि उनका मानना है कि यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली. भारत को अब कुछ ट्रिगर्स की ज़रूरत है- जैसे कच्चे तेल का $80 के आसपास आना, गवर्नमेंट के मानसून सेशन से कुछ सकारात्मक घोषणाएं होना या करेंसी का स्टेबल होना. जैसे ही फॉरन इन्वेस्टर्स का कॉन्फिडेंस लौटेगा, भारत में पैसा वापस आएगा.
यह सवाल आज लगभग हर निवेशक के मन में है. लगातार SIP और घरेलू निवेश के दम पर बाजार संभला हुआ है, जबकि विदेशी निवेशक बिकवाली कर रहे हैं. इस पर सुनील सिंघानिया का जवाब काफी दिलचस्प रहा. उन्होंने कहा कि शेयर बाजार को सिर्फ ट्रेडिंग के नजरिए से नहीं देखना चाहिए. जब कोई निवेशक शेयर खरीदता है तो वह एक बढ़ती हुई कंपनी और बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था का साझेदार बनता है.
उन्होंने कहा कि जब आप शेयर खरीदते हैं, तो आप एक बढ़ती हुई इकॉनमी में एक ग्रोइंग कंपनी के पार्टनर बनते हैं. अगर आपने 17-18 के पीई (P/E) मल्टीपल पर कोई शेयर खरीदा है और कंपनी सालाना 15% की रफ्तार से बढ़ रही है, तो 10 साल में उसकी वैल्यू 3 से 4 गुना हो ही जाएगी, जो किसी भी दूसरे एसेट क्लास से बेहतर है. इक्विटी मार्केट में जब सुस्ती आती है, तो सबको फिक्स्ड इनकम (FD) अच्छी लगने लगती है, लेकिन बाज़ार 3-4 महीनों में ही ऐसा रिटर्न दे जाता है जो पिछले 2-3 साल की कसर पूरी कर देता है. हमें पूरा भरोसा है कि भारत में लॉन्ग टर्म में 12-15% का सस्टेनेबल रिटर्न आराम से बनेगा.
सुनील सिंघानिया का मानना है कि भारत की इकोनॉमिक डेवलपमेंट स्टोरी अभी भी पूरी तरह मजबूत है. देश की जनसंख्या, खपत, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और औद्योगिक विस्तार आने वाले सालों में विकास को गति देंगे.
उनके अनुसार लॉन्ग टर्म में भारतीय इक्विटी बाजार से 12-15% सालाना का टिकाऊ रिटर्न मिलने की संभावना बनी हुई है. इसलिए शॉर्ट टर्म FII फ्लो को देखकर घबराने की जरूरत नहीं है.
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फार्मा (Pharma): यह सेक्टर अच्छा लग रहा है, विशेष रूप से सीडीएमओ (CDMO) और डोमेस्टिक फार्मा सेगमेंट. यहां वैल्यूएशन बहुत महंगे नहीं हैं और यूएस डिमांड व करेंसी का सपोर्ट भी है.
फाइनेंशियल्स और बैंकिंग: बैंक अब अच्छे और रीज़नेबल भाव पर आ गए हैं, इसलिए यहां से एक बाउंस बैक दिख सकता है. इसके अलावा एनबीएफसी (NBFCs) और वेल्थ मैनेजमेंट/कैपिटल मार्केट प्लेसेस भी अच्छे हैं, बशर्ते इनमें थोड़ा 8-10% का करेक्शन आए.
मेटल्स और कैपिटल गुड्स: मेटल अच्छा है, लेकिन डीप-साइक्लिकल होने की वजह से हम पोर्टफोलियो में इसे 8-9% से ज्यादा वेटेज नहीं देते. कैपिटल गुड्स बेहतरीन सेगमेंट है, लेकिन हम इसमें फ्रेश एंट्री के लिए कीमतों में सुधार (Correction) का इंतजार करेंगे.
कंज्यूमर डिस्क्रीशनरी: यह स्पेस भी फिलहाल ठीक नजर आ रहा है.
किन्हें अवॉइड करें?: हम ऑयल एंड गैस, कंज्यूमर स्टेपल्स और बिना मुनाफे वाली नई ज़माने की कंपनियों (Loss-making New Age Tech Companies) में निवेश करने से पूरी तरह बच रहे हैं.
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सुनील सिंघानिया का मानना है कि बाजार में शॉर्ट टर्म उतार-चढ़ाव हमेशा रहेंगे. कभी FII बिकवाली होगी तो कभी ग्लोबल घटनाएं दबाव बनाएंगी. लेकिन भारत की लॉन्ग टर्म की आर्थिक कहानी मजबूत है और अच्छी कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशकों को इसका फायदा मिलता रहेगा.
उनके मुताबिक निवेशकों को बाजार की रोजाना की हलचल के बजाय मजबूत बिजनेस, उचित वैल्यूएशन और लंबी अवधि के नजरिए पर ध्यान देना चाहिए. यही रणनीति भविष्य में बेहतर रिटर्न दिला सकती है.