&format=webp&quality=medium)
मोतीलाल ओसवाल ने बताया हेल्थकेयर सेक्टर का क्या होगा भविष्य
पूरी दुनिया की नजरें इस समय वाशिंगटन पर टिकी हैं. डोनाल्ड ट्रंप के फैसलों और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने ग्लोबल मार्केट की हवा बदल दी है. इसका सीधा असर अब आपके पोर्टफोलियो और भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर पर पड़ता दिख रहा है. दिग्गज ब्रोकरेज मोतीलाल ओसवाल की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए अमेरिका का रास्ता अब पहले जैसा आसान नहीं रहा.
एक तरफ जहां अमेरिका में भारतीय दवाओं को कड़ी टक्कर मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप के दौर में बढ़ती अनिश्चितता और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने खर्च बढ़ा दिया है. हालांकि, राहत की बात यह है कि देश के भीतर अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या और नई दवाओं के लॉन्च से एक उम्मीद की किरण जरूर नजर आ रही है.
भारतीय दवा कंपनियों के लिए अमेरिका सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला बाजार रहा है, लेकिन अब वहां समीकरण बदल रहे हैं. चौथी तिमाही में अमेरिकी रेवेन्यू में करीब 6.2% की गिरावट आने का अंदेशा है.
कड़ा कॉम्पिटिशन: अमेरिका में अब भारतीय जेनेरिक दवाओं को बहुत ज्यादा कॉम्पिटिशन झेलना पड़ रहा है. खासकर 'जी-रेवलिमिड' जैसी मुनाफे वाली दवाओं की कीमतों में भारी गिरावट आई है.
शिपिंग का बढ़ा बोझ: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव की वजह से समुद्र के रास्ते माल भेजना अब महंगा हो गया है. मार्च के आखिरी पखवाड़े में फ्रेट कोस्ट (माल भाड़ा) काफी बढ़ गया है, जो सीधे कंपनियों के प्रॉफिट को चोट पहुंचा रहा है.
दिग्गजों को लगा झटका: सिप्ला की अमेरिकी बिक्री में 28% और डॉ रेड्डीज में 24% की बड़ी गिरावट आ सकती है. यह 11 तिमाहियों के बाद पहली बार है जब कुल मुनाफे (PAT) में कमी देखी जा सकती है.
भले ही दवाओं का निर्यात थोड़ा सुस्त हो, लेकिन देश के भीतर अस्पतालों का कारोबार चमकने वाला है. अपोलो से लेकर मेदांता तक, सभी बड़े ग्रुप्स अपने विस्तार में जुटे हैं.
| हॉस्पिटल का नाम | विस्तार की तैयारी (FY27) | किन शहरों पर फोकस |
| मैक्स हेल्थकेयर | 500 नए बेड | गुरुग्राम (सेक्टर-56) |
| हॉस्पिटल्स | 1,500 नए बेड | हैदराबाद, कोलकाता, बेंगलुरु, गुरुग्राम |
| मेदांता | 2,300 नए बेड | दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी |
रेवेन्यू में उछाल: अस्पतालों का कुल रेवेन्यू 15% बढ़ने की उम्मीद है.
खर्च का दबाव: नए अस्पताल खोलने और डॉक्टरों की भर्ती पर काफी पैसा खर्च हो रहा है, जिसकी वजह से मार्जिन 18% के आसपास रह सकता है.
मरीजों की संख्या: ऑक्युपेंसी (बेड भरे रहने की दर) में 70 बेसिस पॉइंट की गिरावट हो सकती है, लेकिन प्रति बेड होने वाली कमाई (ARPOB) में सुधार दिखने के संकेत हैं.
ये भी पढ़ें: 1 महीने में जितना गिरा बाजार, उसके 8 गुना का रिटर्न देने की तैयारी में है ये शेयर, ब्रोकरेज ने दिया शानदार टारगेट
भारत के घरेलू बाजार (DF) में दवाओं की डिमांड बहुत मजबूत है. खासकर मार्च 2026 में वजन घटाने वाली मशहूर दवा 'सेमाग्लूटाइड' के जेनेरिक वर्जन के लॉन्च ने हलचल मचा दी है.
मार्केटिंग पर भारी खर्च: कंपनियों ने इस दवा को प्रमोट करने के लिए शुरुआत में काफी पैसा खर्च किया है. इसका असर चौथी तिमाही के नतीजों पर दिखेगा, लेकिन इसकी असली कमाई वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही से शुरू होगी.
क्रोनिक थेरेपी की रफ्तार: शुगर और हार्ट जैसी बीमारियों की दवाओं की बिक्री में 16.5% की जोरदार बढ़ोतरी देखी गई है.
टॉप पिक्स: ल्यूपिन और ग्लेनमार्क जैसे शेयरों से शानदार प्रदर्शन की उम्मीद है क्योंकि उन्हें अमेरिका में कुछ खास दवाओं पर एक्सक्लूसिविटी मिली हुई है.
इस चुनौतीपूर्ण माहौल में भी कुछ कंपनियां बाजी मार सकती हैं. मोतीलाल ओसवाल ने कुछ खास शेयरों पर दांव लगाने की सलाह दी है.
ल्यूपिन और ग्लेनमार्क: ल्यूपिन की अमेरिकी सेल्स 37% बढ़ने का अनुमान है. ग्लेनमार्क को भी बड़ी डील्स से फायदा होगा. इन दोनों कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट में 45% से ज्यादा की बढ़त दिख सकती है.
इन पर है दबाव: सिप्ला, डॉ रेड्डीज और जायडस लाइफ के मुनाफे में गिरावट आने की आशंका है क्योंकि अमेरिका में इनकी पुरानी दवाओं की कीमतें गिर रही हैं.
अनुमान में कटौती: ब्रोकरेज ने ग्लेनमार्क, बायोकोन, मैक्स और डॉ रेड्डीज के भविष्य के अनुमानों में 5% से 8.5% तक की कटौती की है.
(डिस्क्लेमर: यहां स्टॉक्स में निवेश की सलाह ब्रोकरेज हाउस द्वारा दी गई है. ये जी बिजनेस के विचार नहीं हैं. निवेश से पहले अपने एडवाइजर से परामर्श कर लें.)
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 ट्रंप के फैसलों का भारतीय दवा कंपनियों पर क्या असर हो रहा है?
ट्रंप प्रशासन की 'अमेरिका फर्स्ट' नीतियों और मिडिल ईस्ट में तनाव से शिपिंग खर्च बढ़ गया है. साथ ही अमेरिकी बाजार में रेगुलेटरी सख्ती और कॉम्पिटिशन से भारतीय कंपनियों का मार्जिन कम हो रहा है.
Q2 क्या वजन घटाने वाली दवा से कंपनियों की किस्मत बदलेगी?
हां, सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं की भारत में बहुत डिमांड है. हालांकि अभी विज्ञापन पर खर्च ज्यादा हो रहा है, लेकिन आने वाले महीनों में यह कंपनियों के मुनाफे का बड़ा जरिया बनेगी.
Q3 अस्पतालों के शेयरों में निवेश करना कितना सही है?
अस्पतालों का भविष्य बेड बढ़ने से सुरक्षित नजर आ रहा है. मेदांता और अपोलो जैसे ग्रुप्स भारी विस्तार कर रहे हैं, जिसका फायदा अगले 1-2 साल में शानदार रिटर्न के रूप में मिल सकता है.
Q4 ल्यूपिन और ग्लेनमार्क ही क्यों चमक रहे हैं?
इन कंपनियों के पास कुछ ऐसी दवाएं हैं जिनका अमेरिका में कोई विकल्प या बड़ा कॉम्पिटिशन नहीं है. इस 'एक्सक्लूसिविटी' की वजह से वे गिरते बाजार में भी मुनाफा कमा रही हैं.
Q5 क्या अभी फार्मा सेक्टर से पैसा निकाल लेना चाहिए?
नहीं, लेकिन पोर्टफोलियो में बदलाव जरूरी है. पुरानी और सामान्य दवाएं बनाने वाली कंपनियों के बजाय उन कंपनियों को चुनें जो रिसर्च और हॉस्पिटल्स जैसे सेगमेंट में मजबूत हैं.