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तेल बाजार में सबसे बड़ा झटका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़े जोखिम से आया है. (प्रतीकात्मक फोटो:AI)
मिडिल ईस्ट में छिड़े इजराइल-ईरान युद्ध ने दुनिया के ऊर्जा बाजार में भूचाल ला दिया है. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए इस संघर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. 9 मार्च 2026 तक ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है. युद्ध से पहले यानी फरवरी के आखिरी हफ्ते में यह कीमत करीब 72-73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी. यानी महज 10 दिनों में कच्चा तेल लगभग 60% तक महंगा हो गया है.
यह स्तर पिछले साढ़े तीन साल में सबसे ऊंचा माना जा रहा है. इससे पहले 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड पहली बार 100 डॉलर के पार गया था.
विशेषज्ञों के मुताबिक तेल बाजार में आई तेजी के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें हैं-
1. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संकट
2. मिडिल ईस्ट की ऑयल फैसिलिटीज पर हमले
तेल बाजार में सबसे बड़ा झटका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़े जोखिम से आया है.
यह 167 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है.
लेकिन ईरान-इजराइल संघर्ष के बाद यह रूट बेहद जोखिम भरा हो गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक:
इसका असर यह हुआ कि तेल की वैश्विक सप्लाई अचानक अनिश्चित हो गई और कीमतें तेजी से चढ़ने लगीं.
भारत के लिए यह रूट और भी अहम है क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 50% कच्चा तेल और 50% से ज्यादा LNG इसी रास्ते से आयात करता है.
तेल कीमतों में उछाल की दूसरी बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में ऊर्जा ढांचे पर हमले हैं.
अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई में कई ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया. रिपोर्ट्स के मुताबिक:
ईरान समर्थित समूहों ने सऊदी अरामको की रास तनूरा रिफाइनरी पर भी हमला किया था, जिसे दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्रों में गिना जाता है.
इन घटनाओं के बाद कई देशों को एहतियातन उत्पादन कम करना पड़ा.
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युद्ध के बढ़ते खतरे के बीच इराक, कुवैत और यूएई ने भी कुछ तेल क्षेत्रों में उत्पादन घटा दिया है.
इसके पीछे दो कारण बताए जा रहे हैं:
तेल बाजार में सप्लाई घटने की आशंका से कीमतों में और तेजी आ गई.
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं.
ऊर्जा मामलों के जानकार नरेंद्र तनेजा ने ज़ी बिज़नेस से बातचीत में कहा:
“पैनिक बटन पर हाथ रखिए लेकिन अभी दबाने की जरूरत नहीं है. स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन भारत के पास विकल्प मौजूद हैं.” उन्होंने कहा कि “मौजूदा हालात में तेल आयात की लागत तेजी से बढ़ रही है और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव साफ दिख रहा है.”
एक्सपर्ट्स की मानें तो अगर होर्मुज संकट और गहराता है तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा के मुताबिक इजराइल-ईरान युद्ध का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार और सप्लाई चेन पर पड़ रहा है. उनका कहना है कि इस संघर्ष का पहला और सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है, क्योंकि मिडिल ईस्ट दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का केंद्र है.
उन्होंने कहा कि अगर संघर्ष बढ़ता है और ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल शिपिंग को रोक देता है, तो वैश्विक सप्लाई पर बड़ा झटका लग सकता है. उनके मुताबिक भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि ऊर्जा कीमतें अचानक बढ़ जाएं और इससे महंगाई व आर्थिक दबाव बढ़े.
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कई एनालिस्ट मान रहे हैं कि अगर संघर्ष लंबा चला और होर्मुज रूट प्रभावित हुआ तो तेल $130-150 प्रति बैरल तक पहुंच सकता है.
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है.
1. पेट्रोल-डीजल
2. महंगाई
3. चालू खाता घाटा
हालांकि हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन भारत के पास कुछ राहत देने वाले फैक्टर भी हैं.
सरकारी सूत्रों के मुताबिक:
अमेरिका ने भी हाल ही में भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए विशेष लाइसेंस दिया है ताकि वैश्विक सप्लाई संतुलित रहे.
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक बाजार में उथल-पुथल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पिछले करीब चार साल से स्थिर बनी हुई हैं.
इसके पीछे मुख्य कारण हैं:
इसके उलट कई देशों में ईंधन कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है. उदाहरण के लिए:
तेल बाजार फिलहाल पूरी तरह जियोपॉलिटिक्स के भरोसे चल रहा है. अगर इजराइल-ईरान तनाव कम होता है तो कीमतों में नरमी आ सकती है. लेकिन संघर्ष बढ़ा या होर्मुज रूट प्रभावित हुआ तो तेल बाजार में और बड़ा उछाल संभव है. फिलहाल वैश्विक बाजार में यही सवाल सबसे बड़ा है- क्या कच्चा तेल $150 की ओर बढ़ रहा है? और इसका जवाब आने वाले कुछ हफ्तों में मिडिल ईस्ट की स्थिति तय करेगी.