तेल बाजार में बड़ा उलटफेर! 116 डॉलर से लुढ़ककर 98 डॉलर पर आया कच्चा तेल

कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट. 116 डॉलर के ऊंचे स्तर से फिसलकर ब्रेंट क्रूड 98 डॉलर के करीब पहुंचा. जानें मिडिल ईस्ट तनाव के बीच क्यों आई तेल बाजार में यह बड़ी राहत.
तेल बाजार में बड़ा उलटफेर! 116 डॉलर से लुढ़ककर 98 डॉलर पर आया कच्चा तेल

तेल बाजार में बड़ा उलटफेर. (Image Source-AI)

दुनियाभर के बाजारों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त गिरावट देखी गई है. जो ब्रेंट क्रूड आज अपनी ऊंचाई पर 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, उसमें अचानक भारी गिरावट आई और वह लुढ़ककर 98 डॉलर के करीब पहुंच गया है. यानी सिर्फ एक दिन की ऊंचाई से देखें तो कच्चे तेल के दाम में करीब 22 डॉलर की बड़ी कमी आई है.

पिछले 10 दिनों से मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और इजराइल-ईरान संघर्ष की वजह से तेल की कीमतों में जो आग लगी हुई थी, उस पर फिलहाल पानी पड़ता दिख रहा है. हालांकि बाजार में अभी भी उतार-चढ़ाव का दौर जारी है, लेकिन ऊपरी स्तरों से आई यह गिरावट भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए किसी बड़े सुकून से कम नहीं है. आइए समझते हैं कि बाजार में यह हलचल क्यों मची है और अब तक के हालात क्या रहे हैं.

10 दिनों में 60 परसेंट का उछाल और फिर गिरावट

Add Zee Business as a Preferred Source

28 फरवरी 2026 को जब मिडिल ईस्ट में संघर्ष की शुरुआत हुई, उसके बाद से तेल बाजार में जैसे तूफान आ गया था. फरवरी के आखिरी हफ्ते में जो कच्चा तेल 72-73 डॉलर प्रति बैरल पर मिल रहा था, वह 9 मार्च 2026 तक 116 डॉलर के स्तर को छू गया. यानी सिर्फ 10 दिनों के भीतर दुनिया ने कच्चे तेल को 60 प्रतिशत तक महंगा होते देखा.

फरवरी आखिरी हफ्ता (युद्ध से पहले)$72 - $73
9 मार्च 2026 (आज की ऊंचाई)$116
ताजा गिरावट के बाद का स्तर$98 के करीब
आज की गिरावट (ऊपरी स्तर से)$22 (लगभग)
10 दिनों में कुल उछाल60% (लगभग)

यह पिछले साढ़े तीन साल का सबसे ऊंचा स्तर था. इससे पहले साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान ही तेल ने 100 डॉलर का आंकड़ा पार किया था. लेकिन अब 116 डॉलर के पहाड़ से फिसलकर तेल फिर से 100 डॉलर के नीचे यानी 98 डॉलर पर आता दिख रहा है.

होर्मुज जलडमरूमध्य का वो डर जिसने कीमतें बढ़ाईं

तेल की कीमतों में आई हालिया तेजी के पीछे सबसे बड़ा हाथ 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के संकट का था. यह 167 किलोमीटर लंबा समुद्री रास्ता पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की लाइफलाइन माना जाता है. दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है.

ईरान-इजराइल युद्ध की वजह से यह रूट इतना खतरनाक हो गया कि करीब 200 से ज्यादा तेल टैंकर समुद्र में फंस गए. हैरानी की बात यह है कि इन फंसे हुए टैंकरों में 37 भारत के भी हैं. शिपिंग कंपनियों ने अपने जहाजों को वहां जाने से रोक दिया और बीमा कंपनियों ने प्रीमियम इतना बढ़ा दिया कि तेल की सप्लाई पर अनिश्चितता के बादल छा गए. भारत अपनी जरूरत का 50 परसेंट तेल और 50 परसेंट से ज्यादा LNG इसी रास्ते से मंगाता है.

रिफाइनरियों पर हमले और सप्लाई का गणित

सिर्फ रास्ता ही नहीं, बल्कि तेल के ठिकानों पर हुए हमलों ने भी आग में घी डालने का काम किया. इजराइल और ईरान के बीच बढ़ती जंग की वजह से कतर, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई की तेल सुविधाओं पर ड्रोन हमले हुए. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यात केंद्र 'सऊदी अरामको' की रास तनूरा रिफाइनरी को निशाना बनाया गया.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज200 टैंकर फंसे, रूट बेहद जोखिम भरा
भारत के लिए खतरा37 टैंकर फंसे, 50% तेल इसी रास्ते से आता है
रिफाइनरी हमलेसऊदी अरामको समेत कई गैस फैसिलिटीज प्रभावित
उत्पादन में कटौतीइराक, कुवैत और यूएई ने उत्पादन घटाया
भविष्य की आशंकायुद्ध बढ़ने पर $150 तक जाने का डर

इन हमलों की वजह से डर का माहौल इतना बढ़ गया कि इराक, कुवैत और यूएई जैसे देशों को अपनी सुरक्षा के लिए उत्पादन कम करना पड़ा. विशेषज्ञों का मानना था कि अगर यही हाल रहा तो तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकता है. लेकिन आज की 22 डॉलर की भारी गिरावट ने फिलहाल उन डरावनी आशंकाओं पर ब्रेक लगा दिया है.

क्या कहते हैं बाजार के जानकार?

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि तेल बाजार इस समय पूरी तरह से युद्ध और राजनीति के इशारों पर नाच रहा है. एक्सपर्ट अजय बग्गा के मुताबिक, मिडिल ईस्ट दुनिया की ऊर्जा सप्लाई का केंद्र है, इसलिए वहां की छोटी सी हलचल भी पूरी दुनिया को प्रभावित करती है. अगर संघर्ष बढ़ता है और होर्मुज रूट बंद होता है, तो खतरा बड़ा हो सकता है.

वहीं ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का मानना है कि हालात गंभीर जरूर हैं, लेकिन भारत के पास विकल्प मौजूद हैं. उन्होंने सलाह दी है कि पैनिक बटन पर हाथ जरूर रखें, लेकिन अभी उसे दबाने की जरूरत नहीं है. ऊपरी स्तर से आई यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बाजार अब ऊंचे दामों पर टिकने को तैयार नहीं है.

काम की बात

आज कच्चे तेल की कीमतों में आई 22 डॉलर की यह गिरावट उन करोड़ों लोगों के लिए राहत है जो बढ़ती महंगाई से डरे हुए थे. 116 डॉलर से फिसलकर 98 डॉलर पर आना यह दिखाता है कि बाजार अब धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, जब तक इजराइल और ईरान के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक तेल की कीमतों पर खतरा बना रहेगा. फिलहाल, ऊपरी स्तरों से आई यह भारी गिरावट दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी संजीवनी साबित हो सकती है.