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क्या फिर से कॉपर में आने वाली है बंपर तेजी?
दुनिया भर के बाजारों में जब भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल होती है, तो कमोडिटी मार्केट में भूचाल सा आ जाता है. लेकिन इन सब के बीच एक धातु ऐसी है जो चट्टान की तरह मजबूती से खड़ी है, और वो है तांबा.
मोतीलाल ओसवाल की हालिया रिपोर्ट बताती है कि तांबे (Copper) की कीमतों में स्थिरता के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि कई बड़ी आर्थिक और तकनीकी ताकतें काम कर रही हैं. यह सिर्फ धातु का भाव नहीं है, बल्कि दुनिया में बदलती टेक्नोलॉजी और सुरक्षा जरूरतों की एक पूरी कहानी है.
मिडल ईस्ट के संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में पैदा हुई तनावपूर्ण स्थितियों ने शुरुआत में बाजार को डराया था, जिससे तांबे की कीमतों पर भी असर पड़ने की उम्मीद थी. लेकिन, बाजार ने बहुत जल्द खुद को संभाल लिया.
इसके पीछे दो बड़े कारण थे. पहला, अमेरिकी डॉलर का थोड़ा कमजोर होना, जिससे दुनिया भर के खरीदारों के लिए तांबा खरीदना सस्ता हो गया. दूसरा, चीन के फैब्रिकेटर्स का बाजार में कूदना. जैसे ही कीमतों में गिरावट आई, चीनी खरीदारों ने बड़ी मात्रा में खरीदारी शुरू कर दी, जिससे तांबे को एक मजबूत सहारा मिला.
| एआई (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर | डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार | पावर केबल, कूलिंग सिस्टम, ग्रिड नेटवर्क |
| डिफेंस (रक्षा) | भू-राजनीतिक तनाव में वृद्धि | सैन्य उपकरण, वाहन, संचार प्रणाली |
| चीन का बाजार | कीमतों में गिरावट पर खरीदारी | विनिर्माण और फैब्रिकेशन |
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट में एक बेहद चिंताजनक संकेत दिया गया है जो भविष्य की स्थिति को स्पष्ट करता है. तांबे को कच्ची धातु से रिफाइंड धातु में बदलने के लिए स्मेल्टर कंपनियों को जो शुल्क (Refining Charges) मिलता है, वह 2026 में शून्य डॉलर प्रति टन पर आ गया है. यह बाजार के लिए एक बड़ी चेतावनी है.
इसका मतलब यह है कि बाजार में कच्ची तांबे की सप्लाई में जबरदस्त कमी आ रही है और स्मेल्टर कंपनियों के बीच कच्चे माल को हासिल करने के लिए होड़ मची है. अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में रिफाइंड तांबे का उत्पादन करना मुश्किल हो सकता है.
| इन्वेंट्री (गोदामों का स्टॉक) | उच्च (LME और शंघाई) | कीमतों में उछाल को अस्थायी रूप से रोक रही है |
| स्मेल्टिंग शुल्क | शून्य डॉलर प्रति टन | कच्चे तांबे की सप्लाई में कमी का संकेत |
| ट्रेडिंग पोजीशन | मुनाफावसूली (Profit-taking) | बाजार अभी एक दायरे में (Sideways) फंसा है |
| भविष्य का रुख | स्ट्रक्चरल डेफिसिट की संभावना | लंबे समय में कीमतों में बढ़ोतरी का संकेत |
एक तरफ सप्लाई की कमी है, तो दूसरी तरफ कीमतें बहुत ज्यादा नहीं बढ़ रही हैं. इसकी मुख्य वजह गोदामों में भरा हुआ तांबे का स्टॉक है. लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) में करीब 294,250 मीट्रिक टन और शंघाई में 425,145 मीट्रिक टन तांबे का भंडार है.
यह विशाल स्टॉक अभी बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर रहा है. जब बाजार में इतना माल मौजूद होता है, तो खरीदारों को डर नहीं रहता और वे तेजी से दाम नहीं बढ़ाते. लेकिन, यह भंडार कब तक चलेगा, यह बड़ा सवाल है.
तांबे की मांग बढ़ने के पीछे के दो सबसे बड़े कारण भविष्य की तकनीक और सुरक्षा से जुड़े हैं. आज दुनिया भर में एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जो दौर चल रहा है, उसके लिए डेटा सेंटर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इन डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली के तार, कूलिंग सिस्टम और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, और इन सब में तांबे का इस्तेमाल सबसे ज्यादा है.
वहीं दूसरी तरफ, दुनिया भर में बढ़ रहे सैन्य तनावों के कारण डिफेंस बजट में बढ़ोतरी हुई है. चाहे मिलिट्री इलेक्ट्रॉनिक्स हो, वाहन हों या संचार प्रणालियां, तांबा हर जगह मौजूद है. इन दोनों क्षेत्रों की वजह से आने वाले समय में तांबे की मांग और सप्लाई के बीच एक बड़ा अंतर यानी डेफिसिट पैदा हो सकता है.
अगर आप बाजार की हलचल पर नजर रखें, तो हाल ही में सट्टेबाजी यानी स्पेक्युलेटिव पोजीशन में थोड़ी कमी देखी गई है. ट्रेडर्स मुनाफावसूली कर रहे हैं, जिससे कॉन्ट्रैक्ट्स की संख्या में गिरावट आई है.

एमसीएक्स (MCX) पर तांबे का चार्ट अभी एक दायरे में फंसा हुआ है, जहां कीमतें करीब 1207 रुपये प्रति किलोग्राम के इर्द-गिर्द घूम रही हैं. यह बताता है कि फिलहाल बाजार किसी एक दिशा में भागने के बजाय ठहरे हुए मूड में है.
तांबे का बाजार इस समय दो तरफा शक्तियों के बीच फंसा है. एक तरफ भारी इन्वेंट्री और ट्रेडर्स की मुनाफावसूली जैसे शॉर्ट टर्म दबाव हैं, तो दूसरी तरफ एआई और डिफेंस जैसे सेक्टर से आने वाली लंबी अवधि की जबरदस्त मांग है.
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट से यह साफ है कि अगर कच्ची तांबे की सप्लाई की कमी और बढ़ी, तो बाजार का संतुलन बदल सकता है. आने वाले महीनों में देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह धातु अपनी बढ़ती मांग के आगे सरेंडर करती है या फिर सप्लाइ की दिक्कतों के कारण इसकी कीमतें एक नए स्तर पर पहुंचती हैं.