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ब्रोकरेज फर्म CLSA भारतीय बाजार पर Constructive View अपनाया है. (फोटो: Freepik)
Stock Market Outlook: करीब 18 महीने तक भारतीय बाजारों पर सतर्क और बेयरिश नजरिया रखने के बाद अब ग्लोबल ब्रोकरेज हाउस CLSA ने बड़ा बदलाव किया है. CLSA ने भारतीय शेयर बाजार पर अपना रुख बदलते हुए कहा है कि अब इंडियन इक्विटीज में रिस्क-रिवॉर्ड काफी हद तक बैलेंस्ड हो चुका है और बाजार “maximum pain” फेज से बाहर निकलता दिख रहा है.
ब्रोकरेज का मानना है कि ईरान तनाव, ग्लोबल अनिश्चितता, ऊंची ब्याज दरें और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जैसे बड़े जोखिम अब काफी हद तक बाजार में प्राइस इन हो चुके हैं. ऐसे में अब डाउनसाइड सीमित और अपसाइड की संभावना ज्यादा दिखाई दे रही है.
CLSA के मुताबिक भारतीय बाजार में सेंटीमेंट इतना कमजोर हो चुका है कि यह ऐतिहासिक रूप से एक कॉन्ट्रा बाइंग सिग्नल बन गया है. ब्रोकरेज का Bull-Bear इंडिकेटर सिर्फ 1% बुलिशनेस तक गिर गया, जो बेहद रेयर स्थिति मानी जाती है.
CLSA ने कहा कि 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस और 2020 के कोविड क्रैश जैसी पैनिक वाली स्थितियों में भी इसी तरह के एक्सट्रीम बेयरिश लेवल्सदेखने को मिले थे. इतिहास बताता है कि जब सेंटीमेंट इतना कमजोर हो जाता है, तब बाजार में बॉटम बनने की संभावना बढ़ जाती है.
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पिछले कुछ सालों से भारतीय बाजारों पर सबसे बड़ी चिंता हाई वैल्युएशन को लेकर थी. लेकिन अब CLSA का कहना है कि वैल्युएशन काफी सामान्य हो चुके हैं.
ब्रोकरेज के मुताबिक Nifty का 12-महीनों को फॉरवर्ड PE अब घटकर 18.3x पर आ गया है, जो 10 साल के औसत से नीचे है. यानी अब बाजार उतना महंगा नहीं दिख रहा जितना पहले था.
CLSA का मानना है कि अगर कमजोर सिनेरियो भी बनता है तो अगले 12 महीनों में डाउनसाइड करीब 7% से 14% तक सीमित रह सकता है. वहीं अगर ग्लोबल स्थितियां सुधरती हैं और अर्निंग ग्रोथ बनी रहती है तो बाजार में 20% से 35% तक अपसाइड देखने को मिल सकता है.
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CLSA ने अपनी रिपोर्ट में एक और अहम बात कही. ब्रोकरेज के मुताबिक MSCI Emerging Markets Index की तुलना में Nifty की अंडरपरफॉर्मेंस इस सदी के सबसे ऊंचे स्तरों पर पहुंच गई है.
आमतौर पर जब भारत जैसे मजबूत फंडामेंटल्स वाले बाजार इतने लंबे समय तक अंडरपरफॉर्म करते हैं, तो बाद में रिकवरी और आउटपरफॉर्मेंस देखने को मिलती है. CLSA इसी अंडरपरफॉर्मेंस को अब खरीदारी का मौका मान रहा है.
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| पॉइंट | डिटेल |
| CLSA का रुख | 18 महीने बाद Indian equities पर constructive view |
| Market View | “Maximum pain” phase काफी हद तक खत्म |
| Bull-Bear Indicator | सिर्फ 1% bullishness |
| Nifty Forward PE | 18.3x |
| Valuation | 10-year average से नीचे |
| Bear Case | 7-14% downside |
| Bull Case | 20-35% upside |
| MSCI EM Comparison | Historic underperformance = buying opportunity |
CLSA की यह रिपोर्ट इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि पिछले डेढ़ साल से ब्रोकरेज भारतीय बाजारों को लेकर काफी सतर्क था. अब रुख बदलना यह संकेत देता है कि बड़े ग्लोबल निवेशक धीरे-धीरे भारत में फिर से दिलचस्पी दिखा सकते हैं.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में तुरंत तेज रैली शुरू हो जाएगी. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वैल्यूएशन रीजनेबल बने रहते हैं, अर्निंग ग्रोथ जारी रहती है और ग्लोबल अनिश्चितताएं धीरे-धीरे कम होती है, तो भारतीय बाजार मीडियम से लॉन्ग टर्म में फिर आउटपरफॉर्म कर सकते हैं.
खासकर क्वॉलिटी लार्जकैप्स, बैंकिंग, कैपिटल गुड्स, मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू थीम वाले शेयरों पर निवेशकों की नजर बनी रह सकती है.
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वैश्विक ब्रोकरेज हाउस की राय का असर विदेशी निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ता है. जब कोई बड़ा ब्रोकरेज बेयरिश से कंस्ट्रक्टिव स्टांस में आता है, तो यह संकेत देता है कि वैल्युएशन और रिस्क-रिवॉर्ड का समीकरण बदल रहा है.
बीते कुछ महीनों में भारतीय बाजार जियोपॉलिटिकल तनाव, FII सेलिंग और महंगे वैल्युएशन के दबाव में रहे. लेकिन अब सेंटीमेंट कमजोर होने और वैल्यूएशन सॉफ्ट होने के बाद बड़े निवेशक सेलेक्टिव बाइंग शुरू कर सकते हैं.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 CLSA क्या है?
CLSA एशिया की बड़ी ग्लोबल ब्रोकरेज और इन्वेस्टमेंट एडवाइजरी फर्म है, जो इक्विटी रिसर्च, मार्केट स्ट्रैटेजी और निवेश सलाह देती है.
Q2 शेयर बाजार में ‘Bullish’ और ‘Bearish’ का क्या मतलब होता है?
Bullish का मतलब है कि किसी एसेट या बाजार में आगे तेजी की उम्मीद है, जबकि Bearish का मतलब गिरावट या कमजोरी की आशंका से होता है.
Q3 Nifty का Forward PE क्या बताता है?
Forward PE Ratio यह दिखाता है कि निवेशक भविष्य की अनुमानित कमाई के मुकाबले किसी इंडेक्स या शेयर के लिए कितना प्रीमियम देने को तैयार हैं. इससे valuation का अंदाजा लगाया जाता है.
Q4 MSCI Emerging Markets Index क्या है?
यह एक ग्लोबल इंडेक्स है, जिसमें भारत समेत कई उभरते बाजारों के शेयर शामिल होते हैं. विदेशी निवेशक अक्सर अलग-अलग देशों के प्रदर्शन की तुलना इसी इंडेक्स से करते हैं.
Q5 Market Sentiment कमजोर होने का क्या असर पड़ता है?
कमजोर sentiment के दौरान निवेशक जोखिम लेने से बचते हैं, जिससे बाजार में volatility और बिकवाली बढ़ सकती है. हालांकि कई बार यही phase long-term buying opportunities भी बनाता है.