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BSE में 'धर्मम चर' का शंखनाद.
मुंबई का दलाल स्ट्रीट, जिसे देश की आर्थिक धड़कन माना जाता है, आज एक अलग ही रंग में रंगा नजर आया. शेयर बाजार के सबसे बड़े केंद्र बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की सीढ़ियों पर आज 'संस्कृति' की दस्तक सुनाई दी. मौका था 'धर्मम चर' कार्यक्रम के शंखनाद का, जहां 'पावर' और 'पवित्रता' का एक अद्भुत संगम देखने को मिला. जब भारत विश्व गुरु बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, तो इस कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया कि हमारी तरक्की का आधार केवल 'अर्थ' यानी पैसा नहीं, बल्कि 'धर्म' और 'संस्कृति' भी होना चाहिए.
इस खास आयोजन में कांची कामकोटि पीठम के जगद्गुरु शंकराचार्य शंकर विजयेंद्र सरस्वती की गरिमामयी उपस्थिति रही. उनकी मौजूदगी ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया. कार्यक्रम की शुरुआत BSE के MD और CEO आर. सुंदररमन के स्वागत भाषण से हुई, जिन्होंने इस पहल की अहमियत पर प्रकाश डाला.
BSE के इस मंच पर आज सिर्फ मुनाफे की बात नहीं हुई, बल्कि 'प्रॉफिट के साथ पुण्य' को कैसे जोड़ा जाए, इस पर मंथन हुआ. कार्यक्रम में देश के कई दिग्गज जुटे, जिन्होंने अपने अनुभव साझा किए. पूर्व SEBI चेयरमैन एम. दामोदरन, सेल्सफोर्स इंडिया की CEO अरुंधति भट्टाचार्य और L&T के CFO आर. शंकर रमन जैसे बड़े नामों ने एक सुर में कहा कि 'विकसित भारत' के निर्माण के लिए प्रोफेशनल लाइफ में धर्म और नैतिकता का होना अनिवार्य है.
इन दिग्गजों ने बताया कि सफलता के सनातन सूत्र क्या हैं. चर्चा के दौरान यह बात उभरकर आई कि एक मजबूत कॉर्पोरेट गवर्नेंस तभी संभव है जब उसमें भारतीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का समावेश हो. इन दिग्गजों का मानना था कि व्यापार में शुचिता और ईमानदारी ही उसे लंबी रेस का घोड़ा बनाती है.
कार्यक्रम का सबसे मुख्य हिस्सा शंकराचार्य जी का संबोधन रहा. उन्होंने अपनी वाणी से पेशेवरों को सफलता का आशीर्वाद दिया और शांति का संदेश फैलाया. शंकराचार्य ने 'विकसित भारत' का रास्ता दिखाते हुए कहा कि विकास की दौड़ में हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए.
उन्होंने पेशेवरों को संयम और धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करने की सीख दी. शंकराचार्य जी के संदेश ने यह स्पष्ट किया कि आज की भागदौड़ भरी कॉर्पोरेट दुनिया में मानसिक शांति और पेशेवर सफलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है. उनके गुरुमंत्र ने वहां मौजूद हर शख्स को एक नई दिशा देने का काम किया.
इस मंथन से मुंबई के साथ-साथ पूरे देश के कॉर्पोरेट जगत को यह संदेश गया कि व्यापार और आध्यात्मिकता अलग-अलग नहीं हैं. 'धर्मम चर' का उद्देश्य कॉर्पोरेट दुनिया में उन मूल्यों को पुनर्जीवित करना है जो भारत की पहचान रहे हैं. सामाजिक जिम्मेदारी सिर्फ एक कागजी शब्द नहीं, बल्कि एक पेशेवर का धर्म होना चाहिए.
इस पहल के जरिए यह कोशिश की गई है कि कंपनियां और उनके लीडर्स न केवल अपने शेयरहोल्डर्स के प्रति वफादार रहें, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझें. जब बाजार के दिग्गज और आध्यात्मिक गुरु एक मंच पर आते हैं, तो वह समाज में एक बड़ा बदलाव लाने की ताकत रखते हैं.