भारतीय शेयर बाजार लंबे समय से अंडर परफॉर्म कर रहा है. खबर लिखे जाने के समय निफ्टी 23500 के नीचे कारोबार कर रहा था. दूसरी तरफ अमेरिका समेत अन्य ग्लोबल मार्केट दमखम दिखा रहे हैं. इस साल अब तक निफ्टी में करीब -10% की गिरावट आई है. निवेशक घरेलू बाजार की इस सुस्ती से परेशान हैं. इस आर्टिकल में आपको बताएंगे कि आखिर बाजार के अंडर परफॉर्मेंस के 10 बड़े कारण क्या हैं और पोर्टफोलियो बचाने के लिए क्या फिर से GOLD खरीदने का टाइम आ गया है.
भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था के सामने इस समय 2 सबसे बड़ी चुनौती है. केवल इन दो फैक्टर के कारण सभी अन्य चुनौतियां पैदा हुई हैं जो बाजार में अस्थिरता और इकोनॉमिक ग्रोथ को प्रभावित कर सकती हैं. पहली चुनौती क्रूड ऑयल को लेकर है जो 110 डॉलर के ऊपर कारोबार कर रहा है. दूसरी बड़ी चुनौती रुपए में लगातार गिरावट है जो डॉलर के मुकाबले 96 के नीचे ऑल टाइम लो पर फिसल गया है. केवल इन दोनों फैक्टर्स ने ओवरऑल मूड खराब करने का काम किया है.
- Crude Oil में उछाल
- रुपए में रिकॉर्ड कमजोरी
आइए जानते हैं कि इन दोनों फैक्टर्स के कारण भारतीय बाजार के लिए और क्या-क्या चुनौतियां पैदा हुई हैं.
बाजार के लिए 10 बड़ी चुनौती क्या है?
1. ईरान क्राइसिस (Iran conflict and oil price)
- 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका ने हमला किया जिसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सप्लाई बंद कर दिया. नतीजन क्रूड ऑयल 100-110 डॉलर के दायरे में बना हुआ है. इसने भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ा दिया है जिसके मल्टीपल इफेक्ट्स हैं.
2. महंगाई का डर (Rising inflation)
- FY27 के लिए 5% रीटेल इंफ्लेशन का अनुमान है जो रिजर्व बैंक के 4% के मुकाबले काफी ज्यादा है. वित्त मंत्रालय का अनुमान तो 5.5%-6% इंफ्लेशन का है. ऐसे में रिजर्व बैंक के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ाना मजबूरी होगी जिसका लिक्विडिटी और क्रेडिट ग्रोथ पर असर होगा.
3. मानसून में कमजोरी से फूड इंफ्लेशन का डर (Weak monsoon)
- इस साल मानसून उम्मीद से कमजोर रहने की संभावना है जिसके कारण फूड इंफ्लेशन का डर है. IMD का अनुमान है कि इस साल 92% LPA रह सकता है जो 26 सालों का न्यूनतम स्तर है. इससे खरीफ फसल, दाल, सब्जी की कीमत बढ़ेगी. रूरल डिमांड को झटका लगेगा जो क्रूड आधारित महंगाई के इतर होगी.
4. रुपए में लगातार गिरावट (Rupee depreciation)
- डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और 96 के नीचे फिसल गया है. इससे ऑयल, फर्टिलाइजर, कैपिटल गुड्स समेत तमाम इंपोर्ट और महंगे हो रहे हैं. नतीजन, RBI को रुपए को संभालने के लिए मजबूरी में फॉरेक्स रिजर्व बेचने पड़ रहे हैं जिससे लिक्विडिटी टाइटनिंग हो रही है.
5. विदेशी निवेशकों की बिकवाली (FII outflow)
- विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से निकल रहे हैं. हाल के कुछ महीनों में 20 बिलियन डॉलर से अधिक निकासी हुई है. FII की होल्डिंग 14 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है. यह डॉलर आउटफ्लो भी रुपए को कमजोर कर रहा है. इससे कॉर्पोरेट, मार्केट सबका सेंटिमेंट बिगड़ा है.
6. करेंट अकाउंट डेफिसिट (Widening CAD)
- क्रूड में तेजी से इंपोर्ट बिल बेतहाशा भाग रहा है नतीजन करेंट अकाउंट पर दबाव है. FY27 में यह जीडीपी का 2.5% तक पहुंच सकता है. बजट का लक्ष्य 1-1.3% के दायरे में रखा गया था.
7. फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit)
- क्रूड में तेजी से इंपोर्ट बिल बढ़ेगा और सरकार को फर्टिलाइजर सब्सिडी बढ़ानी होगी जिसके कारण फिस्कल डेफिसिट का दबाव बढ़ेगा. इसके कारण कैपेक्स प्रोग्राम में कटौती करनी होगी जो ग्रोथ को झटका देगा.
8. बॉन्ड यील्ड में तेजी (Rising bond yields)
- महंगाई के बढ़ते डर के कारण इंटरेस्ट रेट लंबे समय तक मेंटेन रह सकता है और संभव है कि इसमें बढ़ोतरी भी की जाएगा. यही वजह है कि बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ रही है. नतीजन, कॉर्पोरेट और सरकार की बॉरोइंग कॉस्ट बढ़ेगी और रीटेल क्रेडिट ग्रोथ पर निगेटिव असर होगा. यह ओवरऑल हाउसिंग एंड MSME इन्वेस्टमेंट के जोश को कमजोर करेगा.
9. AI क्रांति (AI disruption)
- पूरी दुनिया में AI क्रांति देखी जा रही है. इसके कारण IT सेक्टर में शुरुआती स्तर की नौकरियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं जिसका असर ओवरऑल भारतीय आईटी सेक्टर पर दिख रहा है. इसके अलावा भारत में AI थीम के अभाव में भी बाजार पार्टिसिपेट नहीं कर पा रहा है.
10. अमेरिका के साथ ट्रेड डील (US Trade Deal)
- भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील का ऐलान जरूर हुआ है लेकिन अभी तक अनसर्टेनिटी जारी है. इसका असर भारत के निर्यात पर साफ-साफ दिख रहा है.
कुल मिलाकर चुनौतियों की बात करें तो ईरान युद्ध के कारण क्रूड में उबाल आया और भारत पर सबसे बुरा असर हुआ है. केवल क्रूड में तेजी ने रुपए पर दबाव बनाया, महंगाई का डर बढ़ाया, फिस्कल और करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ाया, सरकार के कैपेक्स प्लान पर असर दिखाया और ओवरऑल भारतीय बाजार और मैक्रो इकोनॉमिक इंडिकेटर्स को कमजोर किया है.
क्या GOLD में निवेश करने का टाइम आ गया?
HDFC Securities ने अपने नोट में कहा कि हमेशा से गोल्ड एक महत्वपूर्ण असेट्स रहा है और कठिन समय में इसकी चमक बढ़ी है. पोर्टफोलियो के लिहाज से हर किसी को 5-10% तक एलोकेशन गोल्ड में करना चाहिए. हालांकि, पिछले 1-2 सालों की सुपर रैली के बाद फिलहाल गोल्ड थोड़ा सुस्त नजर आ रहा है. ऐसे में नियर टर्म में बड़े रिटर्न की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. वैसे भी गोल्ड की पहचान हेजिंग के तौर पर है ना कि वेल्थ क्रिएशन के तौर पर. ऐसे में रिस्क को घटान के लिए गोल्ड में निवेश करना चाहिए.
रिटर्न के लिहाज से इक्विटी लग रहा बेहतर
भारतीय बाजार की बात करें तो लॉन्ग टर्म में निवेशकों को इसने 12-14% CAGR का रिटर्न दिया है. वर्तमान में वैल्युएशन के लिहाज से भारतीय बाजार काफी अट्रैक्टिव नजर आ रहा है. ऐसे में गोल्ड के मुकाबले यह लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न देने की स्थिति में है. हालांकि, नजरिया कम से कम 5 साल का होना चाहिए. शॉर्ट टर्म में ऊपर के तमाम फैक्टर्स का असर दिख सकता है लेकिन मीडियम-टू-लॉन्ग टर्म में भारत की कहानी दमदार है. ऐसे में लॉन्ग टर्म इक्विटी निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है.